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क्या पुत्र-प्रेम में उद्धव मिलाएंगे उनसे हाथ, बालासाहेब हमेशा रहे जिनके खिलाफ ?

24 अक्टूबर को महाराष्ट्र चुनाव के नतीजे आए. शिवसेना और भाजपा ने चुनाव गठबंधन में लड़ा था और इसमें उन्हें क्रमश: 56 तथा 105 सीटों पर जीत मिली. लेकिन राज्य में नयी सरकार के गठन के लिये दोनों दल अपने रूख में नरमी के संकेत नहीं दे रहे हैं. इस सबके बीच अब महाराष्ट्र की राजनीति में बड़े उलटफेर की संभावनाओं से भी इंकार नहीं किया जा सकता. लोकसभा चुनावों से लेकर अब तक शिव सेना और भाजपा में तनातनी और शिवसेना में आदित्य ठाकरे को मुख्यमंत्री बनाने की लालसा की वजह से शिवसेना एनसीपी और कांग्रेस के साथ मिलकर भी सत्ता पर कब्जा कर सकती है.

दरअसल महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पृथ्वीराज चव्हाण ने मंगलवार को कहा कि उनकी पार्टी राज्य में सरकार गठन के लिये शिवसेना से कोई ‘‘ठोस’’ प्रस्ताव मिलने पर ‘‘विचार’’ करेगी. चव्हाण के शब्द थे- ‘‘हमें शिवसेना से कोई ठोस प्रस्ताव नहीं मिला है. हम इस पर पहल नहीं कर सकते. लेकिन यदि शिवेसना की ओर से कोई ठोस प्रस्ताव आता है तो हम उस पर विचार करेंगे और इस पर पार्टी आलाकमान के साथ चर्चा करेंगे.’’

कांग्रेस के पूर्व केंद्रीय मंत्री ने इसके अलावा एक बात और बोली. वो ये कि शिवसेना का कोई भी प्रस्ताव दोनों दलों याने कांग्रेस और एनसीपी के लिये होना चाहिए, जिन्होंने 21 अक्टूबर का चुनाव साथ मिल कर लड़ा था और क्रमश: 44 और 54 सीटें हासिल कीं.

अब एक तरफ जहां शिव सेना किसी भी सूरत में राज्य में अपना मुख्यमंत्री चाहती है, तो वहीं दूसरी तरफ है कांग्रेस और एनसीपी का भी सत्ता में हिस्सेदार बनने का लालच है. पिछले कुछ महीनों में शिवसेना और भाजपा की तनातनी किसी से छुपी नहीं है. शिवसेना ठाकरे परिवार के सबसे युवा नेता आदित्य ठाकरे को भावी मुख्यमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट करने की कोशिश करती नज़र आ रही है. शिव सेना के प्रवक्ता संजय राउत भी यह कह चुके हैं कि आदित्य ठाकरे को महाराष्ट्र की कमान संभालनी चाहिए. हालांकि, भाजपा का भी यह साफ कहना है कि देवेन्द्र फडणवीस ही एनडीए के सीएम चेहरा होंगे. ऐसे में अगर शिव सेना को अपना सीएम बनाना है तो उसके पास एक ही विकल्प बचता है, और वह है भाजपा से अलग होकर सरकार बनाना.

वहीं एनसीपी और कांग्रेस तो किसी भी तरह सरकार का हिस्सा बनने को बेताब हैं. कर्नाटका में तो कांग्रेस ने जेडीएस से बड़ी पार्टी होते हुए भी खुशी-खुशी सीएम की कुर्सी जेडीएस को सौंप दी थी. वर्ष 2018 के कर्नाटका विधानसभा चुनावों में जहां कांग्रेस को 78 सीटों पर जीत हासिल हुई थी, तो वहीं जेडीएस को सिर्फ 37 सीटों पर जीत में मिली थी. फिर भी कांग्रेस ने एचडी कुमारास्वामी को सीएम बनाने के समर्थन किया था. ऐसे में कांग्रेस अब महाराष्ट्र में भी शिवसेना का समर्थन करने से पीछे नहीं हटेगी, वहीं एनसीपी तो कांग्रेस के साथ है ही.

साफ है कि अगर शिव सेना यहाँ अपना मन बदलती है और सीएम की कुर्सी के लिए अपने साथी भाजपा को डंप करने की योजना पर काम करती है, तो वह इसमें कामयाब हो सकती है. वैसे भी इस बार शिवसेना ने वर्ली विधानसभा सीट से आदित्य ठाकरे को मैदान में उतारा हुआ है और वे अपनी सीट पर जीत दर्ज करने की पूरी संभावना है.

बता दें कि साल 2010 की सालाना दशहरा रैली में आदित्य के दादा बाल ठाकरे ने उनके हाथ में तलवार थमाते हुए शिवसेना में उनकी औपचारिक एंट्री करवाई थी. उसके बाद उन्हें पार्टी की युवा इकाई युवा सेना का प्रमुख बना दिया गया. जल्द ही पार्टी से जुड़े अहम मामलों में आदित्य को शामिल किया जाने लगा, और इन चुनावों में शिव सेना ने 60 साल पुरानी परंपरा को तोड़ते हुए आदित्य ठाकरे को चुनावी मैदान में उतारा है, जो कि ठाकरे परिवार में चुनाव लड़ने वाले पहले सदस्य हैं. ऐसे में शिवसेना उन्हें सीएम बनाने के लिए किसी भी हद तक जा सकती है. अब ये देखना दिलचस्प होगा कि शिव सेना भाजपा के साथ बनी रहती है या एनसीपी और कांग्रेस के साथ जाती है.

 

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