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चीनियों की सुअरों की भूख तबाह कर देगी दुनिया, बहुत गंभीर है ये मामला

चिंग राजवंश में अपने साथी से बेवफाई करने वालों को डुबोकर मारने की सजा मिलती। दोषी को सुअर के पिंजरे में बंद कर दिया जाता और किसी तालाब, नदी या कुएं में डुबो देते। तब यह पिंजरा खौफ का दूसरा रूप था। लेकिन सौ साल से कुछ अधिक बरस हुए चिंग राजवंश को गए। समय बदला, चीन बदला और आज जब कोई कहता है, ‘जू लॉन्ग रू सुई’ तो इसका शाब्दिक अर्थ हुआ पानी में जाता सुअर का पिंजरा और गूढ़ अर्थ है ढेर सारा धन। जैसे इसमें पानी भरने के लिए तमाम रास्ते होते हैं, वैसे ही चारों तरफ से मुनाफा आने के भी।

पिछले चार दशकों में दुनिया ने चीन को तेज़ी से भागते देखा है। उसके औद्योगिक विकास की अचरज भरी रफ्तार को देखा है। यही वृद्धि वहां की पोर्क इंडस्ट्री में भी आई और हक़ीक़त में आज फायदे का बड़ा सौदा बन गया चीन का सुअर उद्योग।

रिपोर्ट बताती हैं कि दुनिया में पोर्क यानी सुअर के मांस की आधी खपत केवल चीन में है। चीनी जनता न केवल पोर्क का स्वाद ले रही है, बल्कि प्रोडक्शन के मामले में भी आगे निकलती जा रही है। अमेरिका और यूरोपीय यूनियन के बाद फिलहाल तीसरा नंबर है उसका। पिछले साल सितंबर में जब अफ्रीकन स्वाइन फीवर और कोरोना के ख़तरे के बीच भी चीन से विश्व के सबसे बड़े पिग फार्म की तस्वीर आई तो किसी को आश्चर्य नहीं हुआ। खपत और उपभोग की ऐसी चेन तैयार कर ली है चीन ने, जहां उसके पास चारों तरफ से मुनाफा आ रहा है, जैसे सुअर के बाड़े में पानी।

लेकिन चीन के हर कारोबार की तरह यहां भी एक ट्विस्ट है। इस मुनाफे की एक बड़ी क़ीमत चुका रही है हमारी धरती। इसे देखने के लिए चलना होगा ब्राजील। दुनिया के सबसे बड़े रेन फॉरेस्ट अमेज़न के अंदर। पृथ्वी का फेफड़ा कहते हैं इन जंगलों को। हमारे वायुमंडल को करीब 20 फ़ीसदी ऑक्सीजन यहीं से मिलती है। हाल के दिनों में इन जंगलों में आग लगने की घटनाएं कुछ ज़्यादा ही बढ़ गईं और इसकी वजह है चीन।

थोड़ा विस्तार से समझते हैं। पोर्क इंडस्ट्री को बढ़ाने के लिए चाहिए सुअर और सुअरों को खिलाने के लिए ज़रूरत है प्रोटीन से भरपूर सोयाबीन की ताकि उनसे मोटा मांस मिल सके। अमेज़न के जंगलों को साफ़ कर इसी सोयाबीन की खेती हो रही है।

वॉशिंगटन के साथ शीत युद्ध के हालात बनने से पहले तक बीजिंग के लिए सोया का सबसे बड़ा आयातक अमेरिका ही था। तनाव बढ़ने से व्यापार कम हुआ तो चीन ने ब्राजील में विकल्प देखना शुरू कर दिया।

सोयाबीन की खेती के लिए ढेर सारी ज़मीन और पानी चाहिए। एक अंदाज़े के मुताबिक, एक टन सोयाबीन उगाने में करीब 15 सौ टन पानी की खपत होती है। चीन ज़मीन का जुगाड़ कर भी ले तो पानी का इंतज़ाम मुश्किल है। उसके सामने पहले ही अपनी इतनी बड़ी आबादी को साफ़ पेयजल उपलब्ध कराने की चुनौती है। ऐसे में सोयाबीन चीनी पोर्क इंडस्ट्री की सबसे कमजोर कड़ी थी। उसने इसका हल तलाशा ब्राजील में।

चीन की कई सरकारी कंपनियों ने ब्राजील में सीधे निवेश किया है ताकि वह सोयाबीन का उत्पादन बढ़ा सके। इन कंपनियों के उकसावे पर बड़े पैमाने पर अमेज़न के जंगलों को काटकर खेती लायक बनाने का अभियान-सा चल पड़ा है। जब चीन ने अमेरिका से व्यापार घटाकर ब्राजील की ओर रुख करने का संकेत दिया था तो इसे वहां के राष्ट्रपति जैर बोल्सनारो ने एक बड़े मौके की तरह लिया। उन्होंने जनता से वादा किया कि करीब 20 लाख वर्गमील जंगल का इस्तेमाल खेती और खनन के लिए होगा। जब ब्राजील के ही कुछ एनजीओ और पर्यावरण के लिए काम करने वाली संस्थाओं ने विरोध किया तो बोल्सनारो का तर्क था कि देश को अपनी आर्थिक तरक्की को तवज्जो देनी चाहिए। भले ही यह जंगलों की क़ीमत पर आए।

बोल्सनारो सरकार अपनी इस नीति पर पहले ही दिन से लगी हुई है। ब्राजील के पर्यावरण क़ानूनों को ख़त्म या कमजोर कर दिया गया, इन्वाइरनमेंटल मिनिस्ट्री में अफ़सरों की जगह बोल्सनारो के वफादार नेताओं ने ले ली और जंगलों की सुरक्षा का बजट कम कर दिया गया। अमेज़न में सदियों से बसी जनजातियों और जंगलों की रक्षा के लिए काम करने वालों को सरकार ने संपन्नता में टांग अड़ाने वाले करार दे दिया है। यह सब इसलिए ताकि जंगल तेज़ी से साफ़ किए जा सकें।

बोल्सनारो के लिए बजट एक समस्या बन सकता था, लेकिन चीन ने निवेश या यूं कहें कि कर्ज़ के ज़रिए उसे दूर कर दिया है। बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव शी जिनपिंग की महत्वाकांक्षी परियोजना है। उनका लक्ष्य है सड़क, रेल और बंदरगाह के मार्फत एक ऐसा नेटवर्क तैयार करना, जिस पर चीनी अर्थव्यवस्था सरपट दौड़ सके, आज से भी तेज़। 60 से भी अधिक देश इस परियोजना का हिस्सा बन चुके हैं। यहां के कई प्रोजेक्ट की फाइनैंसिंग चीन के सरकारी बैंकों से हो रही है। अमेज़न में भी ऐसे दो प्रोजेक्ट हैं। एक से बिजली मिलेगी और दूसरा साओ लुईस पोर्ट का विस्तार।

इसके अलावा भी जंगल के अंदर खेती करने और वहां से माल बंदरगाह तक पहुंचाने के लिए सड़कों का जाल तैयार किया जा रहा है। इसकी एक बानगी दिखती है करीब साढ़े तीन हज़ार किमी लंबे हाईवे बीआर-163 के रूप में। इस हाईवे का बड़ा हिस्सा जंगल के बीच से गुजरता है। धूल और कीचड़ से भरे रास्ते का कायापलट करने के लिए बोल्सनारो ने सेना उतार दी। इसे भी बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव का ही कमाल माना जा रहा है।

इस सड़क के साथ ही रेलवे लाइन पर भी काम चल रहा है। यह लाइन तैयार हुई तो खेतों से कंपनियों तक सोयाबीन पहुंचाने की लागत 40 प्रतिशत तक कम हो जाएगी। समय भी बहुत कम लगेगा। ब्राजील की सरकार एक बार इस परियोजना से हाथ खड़े कर चुकी है। तब उसके पास पैसा नहीं था और न ही कोई निवेशक। लेकिन अब जिस तरह काम चल रहा है, उससे संकेत मिलते हैं कि बीजिंग की मेहरबानी यहां भी हुई है।

अमेज़न के घने जंगलों से नदियों, रेल और सड़क के रास्ते सोयाबीन बंदरगाहों तक पहुंचाने की योजना है। खेती के अलावा पिग फार्मिंग के लिए भी पेड़ों पर कुल्हाड़ी चल रही है। बताया जा रहा है कि एक साल के दौरान जंगलों की कटाई की रफ्तार करीब दोगुनी हो चुकी है और जिस तरह ब्राजील सोयाबीन के मामले में चीन का सबसे बड़ा साथी बनकर खुश है, उससे लगता नहीं कि यह कम होने जा रही।

इसी तरह की मार अर्जेंटीना पर भी पड़ी है। यहां हज़ारों एकड़ हरियाली ख़त्म कर खेत तैयार किए गए और इनमें उगने वाला ज़्यादातर सोयाबीन चीन जाता है। उत्पादन बढ़ाने के लिए कुछ इलाक़ों में किसानों ने भारी मात्रा में रासायनिक खाद इस्तेमाल की, जिससे कैंसर के मामले बढ़ने की ख़बरें भी आई हैं।

पेरिस समझौता देशों को कार्बन उत्सर्जन कम करने के लिए कहता है, लेकिन अगर कोई देश किसी दूसरे मुल्क में पर्यावरण की तबाही की वजह बने तो कुछ नहीं किया जा सकता। इसी का फायदा उठा रहा है चीन। इंटरनैशनल इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल स्टडीज का एक अनुमान है, जिसके मुताबिक इस दशक तक दुनिया का आधा चारा चीन के सुअर खा जाएंगे। चीन की यह भूख वाकई सबको खाने पर तुली है।

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