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FB-Google को औकात दिखाने की सोचे मोदी, TikTok बैन और PubG के खौफ से अपने आप हो गया

केंद्र सरकार के चीनी एप्स पर कड़े रुख का असर केवल चीन तक ही सीमित नहीं है। जो कंपनियाँ कल तक भारत के हितों को ताक पर रखकर अपना काम करती थी, अब वे भी भारत के अनुकूल नीतियां बनाकर अपना अस्तित्व कायम रखना चाहती हैं। चाहे गूगल द्वारा भारत में भारी निवेश हो, या फिर PUBG द्वारा भारत के परिप्रेक्ष्य में डेटा पॉलिसी में बदलाव हो, अधिकांश टेक कंपनियां अब भारत को हल्के में लेने की भूल नहीं करना चाहती।

परंतु ये बदलाव कैसे आया? इसके पीछे प्रमुख कारण केंद्र सरकार का विदेशी एप्स, विशेषकर चीनी एप्स पर कड़ा रुख है। जून के अंत में भारत ने एक अहम निर्णय में टिक टॉक सहित 59 चीनी एप्स पर प्रतिबंध लगा दिया था। इन एप्स पर प्रमुख आरोप थे कि वह चीन को भारतीय यूज़र्स का डेटा साझा करते थे, जो भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा और क्षेत्रीय अखंडता के लिए बहुत बड़ा खतरा था। परंतु भारत यहीं पर नहीं रुका। केंद्र सरकार ने फिर कुछ ही दिनों पहले 47 ऐसे एप्स प्रतिबंधित किए, जो या तो इन चीनी एप के क्लोन थे या फिर चीन से इनका प्रत्यक्ष संबंध था।

अब इसी दिशा में दो कदम आगे बढ़ाते हुए भारत ने डेटा लोकलाइज़ेशन के अपने अभियान को और धार देने का काम प्रारम्भ किया है। डेटा लोकलाइज़ेशन का अर्थ डेटा को प्रोसैस करके उसी देश में स्टोर करना, जहां से वह उत्पन्न हुआ था। जैसे कहा जाता है, आज के युग में डेटा इज़ द न्यू ऑयल, यानि अब डेटा बहुत ही बहुमूल्य संसाधन बन चुका है। इसीलिए भारत ऐसा कुछ भी नहीं चाहेगा, जिसके कारण उसके डेटा के साथ-साथ उसके मान सम्मान में कोई कमी आए। इसीलिए केंद्र सरकार ने उक्त एप प्रतिबंधित करने के साथ 275 एप्स की सूची भी तैयार की है, जिसमें प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से चीन का निवेश शामिल है।

शायद इसीलिए अब कुछ टेक कंपनियों ने भारत को हल्के में न लेते कोर्स करेक्शन का काम प्रारम्भ कर दिया है। उदाहरण के लिए PUBG ने अपनी डेटा पॉलिसी को भारत के अनुकूल बनाने हेतु काम करना प्रारम्भ कर दिया हैऔर इसके बारे में एक प्रेस वार्ता के जरिये इस कंपनी ने भारत को सूचित भी किया है। PUBG मोबाइल कंपनी के अनुसार उनके यूजर्स का डेटा भारतसिंगापुरअमेरिका सहित कई देशों में स्टोर होता हैलेकिन अब से भारतीय उपभोक्ताओं का जो भी डेटा होगावो भारत में स्थित सर्वर पर ही स्टोर होगाऔर उसे कहीं भी किसी और देश के साथ साझा नहीं किया जाएगा।

परंतु पीएम मोदी यहीं पर नहीं रुकने वाले। केंद्र सरकार ने पिछले वर्ष ही डेटा प्रोटेक्शन बिल को लोकसभा में पेश कर अपने इरादे जगजाहिर कर दिये थे। इस बिल के कारण फेसबुक, गूगल और एमेज़ोन जैसे बड़ी टेक कंपनियों के प्रशासकों के चेहरों पर हवाइयाँ उड़ने लगी हैं। मार्क जुकरबर्ग को इस बात का भय है कि कहीं भारत फेसबुक को भी प्रतिबंधित न कर दे, जिसके कारण वे अप्रत्यक्ष रूप से इस बिल का विरोध कर रहे हैं। शायद उन्होंने कैंब्रिज एनालिटिका के घपले से कोई सीख नहीं ली है।

सच कहें तो पीएम मोदी के इन कदमों से एक बात तो साफ है, कि अब केंद्र सरकार ऐसी कंपनियों का डेटा पर एकाधिकार नहीं चलने देंगी। फेसबुक हो, गूगल हो, या फिर ट्विटर, इनपर अक्सर भारत के हितों के साथ समझौता करने का आरोप लगाया जाता है। इसी नीति के कारण चीन द्वारा हमारे देश के उपभोक्ताओं के डेटा का दुरुपयोग करने का खतरा भी बढ़ जाता है, और इसीलिए डेटा प्रोटेक्शन और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है।

इसीलिए PUBG फिलहाल के लिए केंद्र सरकार की कार्रवाई से बचा हुआ है, क्योंकि उसका मूल स्वामी दक्षिण कोरिया है। परंतु यदि उसे भारत में बने रहना है, तो उसे अपने मूल नीतियों में कुछ अहम बदलाव भी करने पड़ेंगे, और डेटा स्टोरेज को लोकलाइज़ करने मात्र से काम नहीं बनेगा। ऐसे में फेसबुक, गूगल जैसी कंपनियों का भारत की नीतियों को लेकर डर स्वाभाविक भी है और उचित भी, अन्यथा इन कंपनियों की हेकड़ी यदि ऐसे ही चलती रहती, तो न जाने भारत को आगे किन-किन मुसीबतों का सामना करना पड़ता।

भारत डेटा लोकलाइज़ेशन के लिए कितना प्रतिबद्ध है, इसका अंदाज़ा आप इसी बात से लगा सकते है कि भारत के प्रस्तावित डेटा सेंटर्स के निर्माण हेतु अडानी और अंबानी जैसे बड़े भारतीय उद्योगपति भी सामने आए हैं। अडानी समूह ने तो पिछले वर्ष ही अगले दो दशकों में दक्षिण भारत में डेटा पार्क्स के निर्माण का ब्लूप्रिंट भी तैयार कर लिया। इतना ही नहीं, मुकेश अंबानी की रिलायंस ग्रुप ने यह घोषणा की है कि वह माइक्रोसॉफ्ट के Azure Cloud के साथ मिलकर भारत के कोने -कोने में डेटा सेंटर्स का निर्माण सुनिश्चित कराएगा।

जिस तरह से पीएम मोदी ने टिकटॉक और PUBG के जरिये बड़े टेक कंपनियों, विशेषकर सोशल मीडिया कंपनियों को स्पष्ट संदेश भेजा है, वो अपने आप में सराहनीय है और सही समय पर लिया गया एक उचित निर्णय है, जिससे सोशल मीडिया कंपनियों को भी पता चल जाएगा कि वे अब भारत पर अपनी दादागिरी और नहीं चला सकते हैं।

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