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अमित शाह : बीजेपी का वो अभिमन्यु जो फंसता नहीं मीडिया के ‘चक्रव्यूह’ में

मोटा भाई, चाणक्य जैसे कई नामों से पहचाने जाने वाले भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह आज अपना जन्मदिन मना रहे हैं. 22 अक्टूबर 1964 को मुंबई में जन्मे अमित शाह बहुत थोड़े से समय में भाजपा का अहम हिस्सा बन गए हैं. 2014 में भाजपा के केन्द्र की सत्ता  में आने के बाद अमित शाह को राष्ट्रीय अध्यक्ष की ज़िम्मेदारी सौंपी गई, उस दौरान उन्होंने सदस्यता अभियान शुरू किया. अभियान को जबरदस्त समर्थन मिला और उसका नतीजा यह हुआ कि अगले एक साल के भीतर ही पार्टी सदस्यों की संख्या 10 करोड़ पार हो गई, जिसके चलते भाजपा विश्व की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी बनी.

शाह उन नेताओं में शुमार हैं, जो मीडिया से एक निश्चित दूरी बनाकर चलते हैं. उन्हें मीडियाकर्मियों के साथ हंसी-मजाक करते देखना आसान नहीं है. प्रेस कांफ्रेंस में भी उनकी मुद्रा गंभीर होती है, और उन्हें ऐसे सवाल बिलकुल भी पसंद नहीं आते जो उन्हें असहज बनाएं.

पिछले साल कर्नाटक में चले सत्ता के नाटक का पर्दा गिरने के बाद शाह पत्रकारों से मुखातिब थे, वह समझा रहे थे कि यदि कांग्रेस ‘वो’ न करती तो हम ‘ये’ कर लेते. इसी बीच एक पत्रकार ने सवाल पूछने के लिए हाथ उठाया, मोटा भाई ने उसकी इज़ाज़त तो दे दी, लेकिन सवाल सुनते ही उनका गुस्सा फूट पड़ा. कुछ देर के लिए प्रेस कांफ्रेंस में सन्नाटा छा गया, केवल एक ही आवाज़ सुनाई दे रही थी और वो अमित शाह की थी.

दरअसल, मौके पर मौजूद ‘एनडीटीवी’ के पत्रकार का सवाल था कि ‘कर्नाटक चुनाव के फ़ौरन बाद आपकी सरकार ने पेट्रोल-डीजल के दामों में इजाफा करने का फैसला क्यों लिया’? इस पर शाह ने क्रोधित होते हुए जवाब दिया ‘मैं केवल कर्नाटक के बारे में बात करूंगा, हालांकि मैं आपका एजेंडा समझता हूं. हम इस सवाल का जवाब भी देंगे, मगर आज नहीं’.

आज राजनीति के चाणक्य बन चुके अमित शाह का किसी ज़माने में राजनीति से दूर-दूर तक का नाता नहीं था. उनका जन्म प्रसिद्ध व्यापारी अनिलचंद्र शाह के घर हुआ था. हालांकि, वह बचपन में ही राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ से जुड़ गए थे. स्कूल दिनों में वो अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के नेता बन गए. जबकि ग्रेजुएशन के समय शाह संघ के आधिकारिक कार्यकर्ता थे. उन्हें पहला बड़ा राजनीतिक मौका 1991 में मिला, जब लालकृष्ण आडवाणी को गांधीनगर संसदीय क्षेत्र से चुनाव लड़ना था. उनके चुनाव प्रचार की ज़िम्मेदारी अमित शाह पर थी. इसके बाद 1996 में अटल बिहारी वाजपेयी के चुनाव प्रचार का जिम्मा भी उन्होंने ही संभाला था. मोटा भाई ने सबसे पहले 1997 में गुजरात की सरखेज विधानसभा सीट से उप चुनाव जीता. इस तरह उनके सक्रिय राजनीतिक जीवन की शुरुआत हुई. करीब छह साल बाद वो गुजरात सरकार में गृहमंत्री बन गए और नरेंद्र मोदी के राज्य की राजनीति से केंद्र की राजनीति में कदम रखने के बाद वह भाजपा के सर्वेसर्वा बन गए हैं.

अमित शाह अपने रजनीतिक संबंधों के बारे में खुलकर बात करते हैं, सियासत में ऐसा कम ही देखने को मिलता है. ‘इंडिया टुडे कॉन्क्लेव’ में जब उनसे पूछा गया कि क्या उनके राहुल-सोनिया गांधी से रिश्ते ख़राब हैं?, तो उन्हें गोलमोल जवाब देने के बजाए स्पष्ट शब्दों में कहा था कि हां ख़राब हैं. उनका जवाब था, रिश्ते ठीक नहीं हैं, मेरी ओर से तो बिल्कुल भी ठीक नहीं हैं, उनकी तरफ से हो सकता है ठीक हों’.

कुछ ऐसा ही पत्रकारों के मामले में भी है, कहा जाता है कि कुछ वक़्त पहले रांची में जब अमित शाह मीडिया से मुखातिब होने पहुंचे थे तो उन्होंने चुनिंदा प्रधान संपादकों को छोड़कर बाकी पत्रकारों को कमरे से बाहर निकलवा दिया था. मीडिया के प्रति उनका गुस्सा उस समय में नजर आया था, जब उनके बेटे जय शाह के खिलाफ एक खबर ने खूब जोर पकड़ लिया था. अपने बेटे के बचाव में उन्होंने पत्रकारों को लिखने तक की नसीहत दे डाली थी. उन्होंने कहा था कि पत्रकारो को भी लिखने में मर्यादा रखनी चाहिए.

हालांकि, ऐसी घटनाओं का उनके लोकप्रियता ग्राफ पर कोई ख़ास असर नहीं पड़ा. भाजपा की एक के बाद एक लगातार जीत के चलते जहां पार्टी के अंदर उनकी ताकत बढ़ी, वहीं सोशल मीडिया पर भी वह शक्तिशाली और लोकप्रिय नेता के रूप में सामने आए. अगर फेसबुक और ट्विटर को जोड़ दें तो अमित शाह के फॉलोअर्स की संख्या पीएम मोदी के ठीक बाद है.

 

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