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OPINION : बिहार चुनाव में तेजस्वी यादव क्यों दिख रहे हैं सबसे आगे ?

बिहार में विधानसभा चुनावों में तेजस्वी यादव के नेतृत्व में महागठबंधन बड़ी भारी जीत की ओर बढ़ता दिख रहा है तो उसका एक बड़ा कारण भाजपा के सारे दांव लगातार फेल होते जाना भी है.

आमतौर पर यह देखा गया है कि जब भी कोई सेना लड़ाई में हारती है तब उसका कारण उसकी कोई एक नीति का असफल होना नहीं होता बल्कि उसकी बड़ी हार के पीछे बड़ा कारण यह होता है कि उसके एक के बाद एक सारे दांवपेच नाकाम होने लगते हैं. ये एक संभावित हार का बड़ा संकेत होता है.

बिहार विधानसभा चुनावों में पिछले घटनाक्रमों पर नजर डालें तो ऐसा लगता है कि भारतीय जनता पार्टी और उनके सहयोगी जनता दल यूनाइटेड के नीतीश कुमार के एक के बाद एक सारे दांव नाकाम हो रहे हैं.

नहीं चल पाया सुशांत सिंह राजपूत की मौत का मुद्दा

जब विधानसभा चुनावों का कार्यक्रम भी घोषित नहीं हुआ ​​था तब ऐसा लग रहा था कि भारतीय जनता पार्टी और नीतीश कुमार का एनडीए विधानसभा चुनावों को बॉलीवुड के मुद्दे पर लड़ेगा. इसकी तैयारियां भी होने लगी थीं.

सुशांत सिंह राजपूत की मौत को बिहार विधानसभा चुनाव का मुद्दा बनाने की कोशिश की गई थी,  और ‘न भूले हैं, न भूलने देंगे’ का नारा दिया गया था. कोशिश काफी मजबूती से की गई लेकिन प्रवासी मजदूरों की बदहाली, कोरोना, बेरोजगारी जैसे मुद्दों के कारण इसका असर नहीं पड़ा और एनडीए का यह दांव बेकार गया.

तेजस्वी यादव की शिक्षा पर उठाए सवाल भी नहीं बने मुद्दा

एनडीए की तरफ से और महागठबंधन में शामिल ना हो सके उपेंद्र कुशवाहा की तरफ से आरजेडी नेता और मुख्यमंत्री पद के दावेदार तेजस्वी यादव की शिक्षा का मामला भी काफी जोर-शोर से उठाया गया. यह कहा गया कि तेजस्वी यादव शिक्षित नहीं हैं जबकि नीतीश कुमार इंजीनियर हैं, अनुभवी हैं और उपेंद्र कुशवाहा भी काफी उच्च शिक्षित हैं. ऐसे में मुख्यमंत्री पद का को तेजस्वी यादव को नहीं सौंपा जाना चाहिए.

नीतीश कुमार सरकार की नाकामी के कारण यह मुद्दा भी परवान नहीं चढ़ पाया. यहां तक कि सोशल मीडिया पर महागठबंधन के समर्थकों ने नीतीश कुमार सरकार के दौरान बनाए गए उन पुलों की फोटो भी डाल दी जो उद्घाटन के तुरंत बाद ढह गए थे.

10 लाख नौकरियां देने के मुद्दे का उड़ाया मजाक

तेजस्वी यादव ने बेरोजगारी को और सरकारी कंपनियां बेचे जाने निजीकरण करने और जबरन सेवानिवृत्त करने जैसे मुद्दे के महत्व को समझते हुए 10 लाख सरकारी नौकरियां देने का वादा किया तो समूचा एनडीए उनके इस वादे को अविश्वसनीय बताने लगा भाजपा और जनता दल यूनाइटेड के नेताओं ने कई बार यह कहा कि इतनी नौकरियां दे पाना संभव नहीं है.

सवाल इसके लिए आर्थिक संसाधनों की कमी का भी उठाया गया हालांकि जनता के बीच यह मुद्दा काफी लोकप्रिय हुआ जिसको देखते हुए अपनी ही बात से पलटते हुए एनडीए की तरफ से भी 19 लाख नौकरियां या रोजगार देने का वादा करना पड़ा, जिसका असर उल्टा ही रहा क्योंकि एनडीए के नेता खुद ही कह चुके थे कि 10 लाख नौकरियां भी दिया जा पाना संभव नहीं है.

बिहार के लोगों को फ्री कोरोना वायरस वैक्सीन देने का वादा भी नाकाम 

विश्वव्यापी कोरोना महामारी के प्रकोप को देखते हुए इसका भी फायदा भाजपा ने बिहार विधानसभा चुनावों में उठाने का फैसला किया. इसके तहत वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने वादा किया कि बिहार के लोगों को फ्री में कोरोना वैक्सीन दी जाएगी. भाजपा का यह वादा भी बेअसर रहा बल्कि सवाल यह भी उठने लगा कि जिन राज्यों में चुनाव नहीं है क्या वहां के लोगों को फ्री वैक्सीन नहीं मिलनी चाहिए. दांव उल्टा पड़ता देख भाजपा को इस मामले में जल्द ही चुप्पी साध लेनी पड़ी.

राष्ट्रवाद का मुद्दा भी नहीं चलने दिया तेजस्वी यादव ने

भाजपा और एनडीए के खेमे को एक उम्मीद कन्हैया कुमार के चुनाव प्रचार में सक्रियता से भाग लेने से भी बंधी हुई थी. एनडीए चाहता था कि सीपीआई के नेता और जेएनयू छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार तेजस्वी यादव के साथ मिलकर पूरे बिहार में जोर शोर से प्रचार करें और वह इसे ‘टुकड़े टुकड़े गैंग’ से जोड़कर महागठबंधन को राष्ट्र विरोधी घोषित करें, लेकिन यहां भी तेजस्वी यादव की चतुराई की आगे उसे मात खानी पड़ी.

तेजस्वी यादव ने खुद ही चुनाव प्रचार की कमान संभाली और कन्हैया कुमार को अपने से दूर रखा. मजबूरी में सीपीआई ने भी कन्हैया कुमार को केवल उन्हीं सीटों पर प्रचार करने को कहा जहां पर सीपीआई के उम्मीदवार हैं.

दोहरे गठबंधन की भाजपा की चाल पड़ी उल्टी

भारतीय जनता पार्टी ने बिहार के इन विधानसभा चुनावों में दोहरे गठबंधन की बेहद चालाक नीति अपनाई. इससे उसे उम्मीद थी कि नीतीश कुमार के खिलाफ सत्ताविरोधी लहर का उसे नुकसान नहीं होगा. इसके लिए उसने लोक जनशक्ति पार्टी को अलग से लड़ने का मौका दिया भाजपा का यह दांव भी नाकाम रहा क्योंकि जनता के बीच ऐसा संदेश गया कि भाजपा खुद ही नीतीश कुमार को हराना चाहती है.

भाजपा के इस दोहरे गेम से नाराज नीतीश कुमार के समर्थक भी अब उन सीटों पर भाजपा का वैसा समर्थन करते नहीं दिख रहे हैं जैसे कि उनसे अपेक्षा थी. उनकी नाराजगी यह है कि जिन सीटों पर जेडीयू के उम्मीदवार नहीं हैं, उन पर भाजपा के लोग लोक जनशक्ति पार्टी के उम्मीदवारों का समर्थन कर रहे हैं. लोक जनशक्ति पार्टी के टिकट पर भाजपा के कई नेताओं का उतरना भी जेडीयू की इस आशंका को बलवती करता है.

ऐसे में स्थिति यह बनी है कि जेडीयू अलग चुनाव लड़ रहा है और भाजपा अलग चुनाव लड़ रही है. जाहिर है दोनों के बीच वोटों का ट्रांसफर होने की उम्मीद काफी कम हो गई है.

प्रधानमंत्री की रैलियां भी हो रही हैं बेअसर

एनडीए को उम्मीद थी कि जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चुनाव प्रचार के लिए बिहार जाएंगे तो माहौल एकदम से बदल जाएगा जैसा कि पहले श्री मोदी की रैलियों से होता रहा है. इस मामले में भी भाजपा को निराशा हाथ लगी है क्योंकि मोदी जी ने पिछले विधानसभा चुनावों के समय बिहार को जो सवा लाख करोड़ का पैकेज देने का जोर शोर से ऐलान किया था, वह पूरा होता नहीं दिखा.

जंगलराज की याद दिलाना भी नहीं बदल पाया बिहार की जनता का मूड

एनडीए ने अपने आखिरी दांव के रूप में आरजेडी के शासन में खराब रही कानून व्यवस्था का मुद्दा भी उठाया और कथित जंगलराज की वापसी से जनता को आगाह करने की कोशिश की.

भाजपा का यह दांव भी उल्टा पड़ा क्योंकि जब से केंद्र में भाजपा की सरकार आई है, उसके बाद से देश में कई जगह जिस तरह से हत्याओं और मॉब लिंचिंग का दौर शुरू हुआ है, उससे खुद उसकी कार्यक्षमता पर और निष्ठा पर भी सवाल उठने लगे हैं.

जिन राज्यों में भाजपा की सरकारें हैं उनमें कानून और व्यवस्था इतनी ज्यादा खराब है कि लोग अब उसे ही जंगलराज कहने लगे हैं. खासतौर पर उत्तर प्रदेश में भाजपा के शासन में लगातार हत्या बलात्कार बलात्कारियों को बचाने की कोशिश और फर्जी एनकाउंटर इतने ज्यादा हो रहे हैं कि अब बिहार की जनता यह मानने को तैयार नहीं है कि भाजपा बिहार में कानून और व्यवस्था के मामले में कोई बेहतर मिसाल कायम कर पाएगी.

सारे दांव नाकाम होना कहीं एनडीए की भारी पराजय की निशानी तो नहीं

इस तरह से देखा जाए तो अब तक एनडीए अपनी तरफ से तकरीबन सारे दांव चल चुका है, लेकिन जनता के मूड को बदलने में नाकाम रहा है. ऐसे में उसके रणनीतिकारों को सचेत हो जाना चाहिए क्योंकि ये उसकी भारी पराजय का संकेत हो सकता है. हालांकि सवाल ये भी है कि अब क्या उनके पास इतना समय बचा है कि वो नुकसान की भरपाई कर पाएं.

महेंद्र यादव एक स्वतंत्र पत्रकार हैं। लेख में व्यक्त किए गए विचार उनके निजी अनुभव पर आधारित हैं।

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