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CAA-NRC विरोध में PK तो महज मुखौटा, उनके कंधे पर रखी बंदूक का ट्रिगर किसने पकड़ रखा ?

चुनावी रणनीतिकार और जेडीयू नेता प्रशांत किशोर इन दिनों CAA-NRC के खिलाफ विपक्षी विरोध की धुरी बनने की कोशिश करते नजर आ रहे हैं. लेकिन किसी को भी शक नहीं कि वो सिर्फ एक कंधा बने हुए हैं जिस बंदूक रख कर कोई और चला रहा है. जी, सवाल यही है कि पीके जो कर रहे हैं, ये सब किसके दिमाग की उपज है या कौन मजबूती से परदे के पीछे से हवा दे रहा है? चुनावी फायदे के हिसाब से देखें तो सबसे आगे नीतीश कुमार और ममता बनर्जी ही खड़े लगते हैं. कयास ये भी हैं कि प्रशांत किशोर NRC पर कांग्रेस की आलोचना करके दिल्‍ली में अरविंद केजरीवाल के पक्ष में हवा बना रहे हैं. ताकि दिल्‍ली में लोकसभा चुनाव की तरह मुकाबला त्रिकोणीय न होकर, बीजेपी और आप के बीच रहे. आखिर उन पर केजरीवाल के चुनावी रणनीतिकार होने की भी तो जिम्‍मेदारी है.

अभी तक प्रशांत किशोर राहुल गांधी सहित कांग्रेस नेतृत्व को सलाह देते रहे कि पार्टी की राज्य सरकारों से औपचारिक तौर पर कहें कि वो ऐलान करें कि कांग्रेस शासित राज्यों में CAA-NRC नहीं लागू होगा. अब तो प्रशांत किशोर राहुल गांधी से ये भी कह सकते हैं कि कांग्रेस शासन वाली राज्य सरकारें केरल को फॉलो करें, जहां इसके खिलाफ बाकाएदा विधानसभा में प्रस्ताव भी पारित कर दिया गया है.

जनता दल यूनाइटेड में उपाध्यक्ष का पदभार ग्रहण करने से पहले तक प्रशांत किशोर, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के चुनावी रणनीतिकार हुआ करते थे. लेकिन जेडीयू नेता बनने के बाद तो प्रशांत किशोर सिर्फ पटना यूनिवर्सिटी छात्र संघ चुनाव में भी छोटी सी भूमिका निभा पाये. इसके बावजूद नीतीश कुमार के लिए अच्छी खबर ये रही कि युवाओं के बीच भी जेडीयू चमकने लगा. पटना यूनिवर्सिटी छात्रसंघ चुनाव में जेडीयू की ये पहली जीत रही और प्रशांत किशोर की आखिरी चुनावी रणनीति.

प्रशांत किशोर अब नीतीश कुमार के लिए चुनावी रणनीति नहीं तैयार करते, क्योंकि ये काम जेडीयू के सीनियर नेता करते हैं और वो ट्वीट कर कहते हैं कि वो वरिष्ठों से सीख रहे हैं. दरअसल, प्रशांत किशोर फिलहाल ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस और अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी की चुनावी मुहिम देख रहे हैं. हां, आम चुनाव में जगनमोहन रेड्डी की आंध्र प्रदेश में जीत और महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे के मुख्यमंत्री बनने में भी प्रशांत किशोर की भूमिका की काफी चर्चा रही.

हो सकता है प्रशांत किशोर की पैराशूट एंट्री से नाराज नेताओं को शांत करने के लिए नीतीश ने उन्हें चुनावी राजनीति से दूर कर ये रास्ता निकाला हो. लेकिन फिलहाल तो प्रशांत किशोर वो काम कर रहे हैं जो न तो जेडीयू में कोई कर सकता है और न ही खुद नीतीश कुमार. वो काम है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह से CAA-NRC पर दो-दो हाथ करने का.

इस सबके बीच नीतीश कुमार ने ये कहते हुए बात संभालने की कोशिश की है कि बीजेपी और जेडीयू के बीच सब ठीक ठाक चल रहा है. देखा जाये तो प्रशांत किशोर ने भी रिश्तों में खटास जैसी कोई बात अभी तो नहीं की है, भले ही आगे को लेकर जो भी इरादा हो. प्रशांत किशोर कहते हैं, ‘मेरे अनुसार लोकसभा चुनाव का फॉर्मूला विधानसभा चुनाव में दोहराया नहीं जा सकता.’

हो सकता है कि CAA-NRC के व्यापक विरोध के लिए प्रशांत किशोर मजबूत जमीन तैयार कर रहे हों, लेकिन उसके मूल में बिहार विधानसभा चुनाव में सीटों को लेकर दबाव बनाने के लिए कोई खास रणनीति भी तो हो सकती है.

वैसे प्रशांत किशोर के CAA विरोध से फायदा उन सभी को हो रहा है जो बीजेपी के खिलाफ अस्तित्व बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं. अभी तो आम राय यही बनी है कि प्रशांत किशोर को नीतीश कुमार का पूरा सपोर्ट हासिल है और वो जो कुछ भी कह रहे हैं वो एक तरीरके से नीतीश कुमार की ही जबान है.

अगर ऐसी स्थिति खत्म हो जाये तो प्रशांत किशोर वही कर रहे हैं जो उनके सभी क्लाइंट्स को सूट करता है, ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल से लेकर उद्धव ठाकरे तक. जब तक फिर से बीजेपी को प्रशांत किशोर की सेवाएं लेने की जरूरत नहीं पड़ती, वो अपने मूल बिजनेस को कायम रखने की कोशिश तो करेंगे ही. इसका सीधा फायदा ये होगा कि प्रशांत किशोर को ममता और केजरीवाल के बाद भी लंबा इंतजार नहीं करना होगा – चुनावी मुहिम की जिम्मेदारी मिल ही जाएगी.

तात्कालिक रूप से देखें तो प्रशांत किशोर की CAA-NRC विरोधी मुहिम का सीधा फायदा नीतीश कुमार और ममता बनर्जी के साथ साथ अरविंद केजरीवाल को भी मिलने वाला है. बल्कि, ऐसे कह सकते हैं कि ममता बनर्जी से भी पहले नीतीश कुमार को ही फायदा होगा – क्योंकि बिहार में चुनाव 2020 में है जबकि पश्चिम बंगाल में 2021 में.

ऐसी उलझन इसलिए भी पैदा हो रही है क्योंकि CAA के विरोध में नीतीश कुमार नहीं हैं, उनका विरोध बस NRC तक सीमित है. अब तक यही पता चला है कि नीतीश कुमार की नजर में CAA में कोई गलत बात नहीं है. हां, ममता बनर्जी जरूर दोनों ही चीजों का बराबर विरोध कर रही हैं.

ऐसे में सवाल यही है कि CAA-NRC विरोध को लेकर प्रशांत किशोर ने अपना जो कंधा मुहैया कराया है उस पर रखी बंदूक का ट्रिगर किसने पकड़ रखा है? नीतीश कुमार ने या फिर ममता बनर्जी ने?

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