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चीन के लिए खौफ का दूसरा नाम हैं व्लादिमिर पुतिन, आग का वो दरिया जो डुबाकर मारेगा !

जहां एक ओर चीन अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव में बाइडन की संभावित विजय से अमेरिका के प्रभाव को कमतर आँकने लगा है, तो वहीं अब उसे एक नई चिंता सता रही है, और ये चिंता किसी और देश से नहीं, बल्कि एक समय पर उसका अघोषित साझेदार माने जाने वाला रूस ही है।

पिछले कुछ महीनों में जिस प्रकार से रूस और चीन के संबंधों में दरार आई है, और जिस प्रकार से चीन अपनी औपनिवेशिक मानसिकताओं की पूर्ति के लिए रूस को निशाना बना रहा है, उससे ये कहना गलत नहीं होगा कि चीन ने जाने अनजाने रूस को अपना दुश्मन बना लिया है, और अब इस बात को मजबूरी में ही सही, पर चीनी मीडिया को भी स्वीकारना पड़ा है।

ये सब पिछले माह शुरू हुआ, जब रूसी राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन ने बीजिंग को करारा झटका देते हुए कहा था कि रूस और चीन में सैन्य संबंधों की कोई आवश्यकता नहीं है। इसके पीछे का प्रमुख कारण बताते हुए इटार टास से बातचीत के दौरान कार्नेजी मास्को सेंटर के निदेशक दिमित्री ट्रेनिन ने कहा, “रूस को चीन के साथ एक आधिकारिक सैन्य सहायता करने की जरूरत नहीं है, क्योंकि इससे न केवल दोनों देशों को काफी नुकसान होगा, बल्कि भारत भी रूस का साथ छोड़ अमेरिका का हाथ थामने को विवश हो जाएगा।”

ये संभवत: पहली बार था इतने वर्षों में जब रूस के राष्ट्राध्यक्ष ने खुलेआम चीन को ठेंगा दिखाया हो, और ऐसे में जब पुतिन ने स्पष्ट कहा कि चीन के साथ रूस को किसी सैन्य सहायता की आवश्यकता नहीं, तो निस्संदेह चीनी खेमे में खलबली तो मचनी ही थी। स्वयं चीन की चाटुकार मीडिया नहीं समझ पा रही है कि इस निर्णय पर कैसी प्रतिक्रिया देनी है।

फिर भी चीन के मुखपत्र ग्लोबल टाइम्स ने अपने एक लेख में लिखा कि यदि रूस को चीन की सैन्य सहायता की जरूरत नहीं है, तो चीन को भी नहीं है। लेकिन जब इस तर्क से बात नहीं बनी, तो CGTN ने इस विषय पर किर्गिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री जूमार्ट ओटोरबाएव की राय मांगी, जिन्होंने स्पष्ट कहा कि चीन और रूस के बीच सैन्य सहायता होना लगभग असंभव है।”

सच तो यह है कि चीन के रणनीतिक क्षेत्रों में रूस द्वारा चीन को लात मारने के निर्णय से काफी खलबली मची हुई है।  लेकिन बीजिंग ये जताना नहीं चाहता कि वह इस स्थिति से भयभीत है, इसीलिए वह पुतिन के बयानों को कमतर आँकने का प्रयास कर रहा है।

रूस अपने आप को China से दूर रखना चाहता है, क्योंकि वह न सिर्फ रूस द्वारा मध्य एशिया पर वर्चस्व के लिए खतरा समान है, बल्कि उसके साम्राज्यवादी नीतियों से अब उसके अपने देश को भी खतरा उत्पन्न हो रहा है। चीन की व्लादिवॉस्टोक पर कुदृष्टि से कोई भी अनभिज्ञ नहीं है, और रूस तो बिल्कुल नहीं। ऐसे में यदि रूस ने China को अपने लिए खतरा मान लिया, जो कि हो भी रहा है, तो चीन के लिए अब व्लादिमिर पुतिन का क्रोध झेल पाना लगभग असंभव होगा। चीन भले ही इसे स्वीकारना न चाहता हो, पर वह भली-भांति जानता है कि रूसी नागरिक अपने देश की रक्षा के लिए किस हद तक जा सकते हैं।

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