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रामविलास पासवान: बनने वाले थे DSP लेकिन 6 बार केंद्र में बने मंत्री, 23 साल की उम्र में बनाए वर्ल्ड रिकॉर्ड

नई दिल्ली:   केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान (Ramvilas Paswan) का बीती शाम निधन हो गया. वे लंबे समय से बीमार चल रहे थे. पांच दशक से भी ज्यादा समय तक राजनीति करने वाले रामविलास पासवान ने 1969 में अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत की थी. तब उन्होंने संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार के तौर पर खगड़िया की अलौली विधानसभा सीट पर उपचुनाव जीता था. उन्होंने तब कांग्रेस के एक कद्दावर नेता को 700 वोटों से हराया था. उस वक्त उनकी उम्र 23 साल ही थी.

जब रामविलास पासवान ने 22 साल की उम्र में सिविल सर्विसेज की परीक्षा पास कर ली थी और अपने गांव खगड़िया के शहरबन्नो पहुंचे थे, तब उन्होंने देखा कि एक दलित की कुछ लोग पिटाई कर रहे हैं. दलित पर 150 रुपये नहीं लौटाने के आरोप थे. उस वक्त तक पासवान की नौकरी पुलिस महकमे में हो चुकी थी, तब उन्होंने भीड़ पर पुलिस का रौब दिखाकर न सिर्फ उस दलित को बचाया था बल्कि दबंग के कागजात फाड़ दए थे. इस घटना से पासवान लोगों में काफी लोकप्रिय हो गए. उनकी लोकप्रियता ऐसी बढ़ी कि लोगों ने उन्हें चुनाव लड़ने को कह दिया, फिर वो सरकारी नौकरी छोड़ राजनीति के रास्ते पर निकल पड़े. उसके बाद पासवान ने फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा.

विधायक बनने के आठ साल बाद पासवान ने जनता पार्टी के टिकट पर 1977 में हाजीपुर से लोकसभा चुनाव लड़ा. तब पासवान 4.25 लाख वोट से जीते थे. यह पासवान का वर्ल्ड रिकॉर्ड था. 1989 में रामविलास पासवान ने फिर से हाजीपुर से जीत दर्ज की थी. इस बार उन्हें 5.05 लाख वोट मिले. उन्होंने खुद अपना पुराना गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड तोड़ दिया था.

रामविलास पासवान को राजनीति का मौसम विज्ञानी कहा जाता था. शायद यही वजह है कि वो पिछले तीन दशकों में पीवी नरसिम्हा राव को छोड़कर सभी प्रधानमंत्रियों की मंत्रिपरिषद में शामिल रहे हैं. फिलहाल वो मोदी सरकार में खाद्य एवं उपभोक्ता मामलों के मंत्री थे. उन्होंने साल 2000 में लोक जनशक्ति पार्टी बनाई थी. इससे पहले वो बिहार में दलित सेना नाम का संगठन भी चला रहे थे.

2019 के लोकसभा चुनाव से पहले पासवान ने लोक जनशक्ति पार्टी की कमान बेटे चिराग पासवान को सौंप दी थी. इसके साथ ही उन्होंने चुनाव नहीं लड़ने का ऐलान कर दिया था. बाद में उन्हें राज्यसभा का सदस्य बनाया गया.

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