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राउत को अनदेखा कर जो भूल किए उद्धव, सत्ता गंवाकर न चुकानी पड़े उसकी कीमत !

घर फूँक कर तमाशा देखने के उदाहरण का प्रत्यक्ष प्रमाण चाहिए तो संजय राउत को ही देख लीजिये. पिछले कुछ दिनों से वे एक के बाद एक ऐसे ऊटपटाँग बयान दे रहे हैं, जिनमें लगभग हर बार निशाने पर उसी के गठबंधन की साथी दल काँग्रेस होती है. इन्दिरा गांधी के अंडरवर्ल्ड सरगना करीम लाला के साथ कथित संबंध पर प्रकाश डालते हुए संजय राउत ने बड़ा विवाद खड़ा कर दिया था, जिससे काँग्रेस बुरी तरह तिलमिला गयी थी.

राउत ने एक इंटरव्यू में कहा था, “एक दौर था जब दाउद इब्राहिम, छोटा शकील और शरद शेट्टी मुंबई के पुलिस कमिश्नर तय किया करते थे. इतना ही नहीं, वो यह भी तय करते थे कि सरकार के किस मंत्रालय में कौन बैठेगा. हमने अंडरवर्ल्ड का वो दौर देखा है, लेकिन अब वो यहां सिर्फ चिल्लर हैं.” इस बयान के पीछे काँग्रेस ने संजय राउत को खूब खरी खोटी सुनाई, और उन्हें देख लेने की धमकी भी दी. हालांकि, संजय राउत ने इन्दिरा गांधी संबंधी बयान वापिस ले लिया थ, परंतु सावरकर के विषय पर उन्होंने अपने सुर तनिक भी नहीं बदले.

लेकिन ऐसा क्या हुआ, कि जिस संजय राउत ने एड़ी चोटी का ज़ोर लगा कर शिवसेना का काँग्रेस और एनसीपी के साथ गठबंधन करवाया, आज वे उसी गठबंधन को तोड़ने पर तुले हुए हैं? बता दें कि 2019 के विधानसभा चुनाव के दौरान महाराष्ट्र में भाजपा और शिवसेना 288 में से 160 से ज़्यादा सीटों पर जीत दर्ज करने में सफल रही थी. परंतु संजय राउत की ज़िद और उद्धव ठाकरे के सत्ता की लालसा में शिवसेना ने भाजपा से नाता तोड़कर काँग्रेस और एनसीपी के साथ सरकार बनाई.

परंतु संजय राउत को इस पूरी प्रक्रिया को सुनिश्चित कराने के लिए कुछ नहीं दिया गया. इतना ही नहीं, उनके छोटे भाई सुनील राउत को भी उद्धव के मंत्रिमंडल में कोई स्थान नहीं दिया गया. शायद यही कारण है जिसकी वजह से संजय राउत आजकल गठबंधन पर उग्र हुए हैं और वे काँग्रेस को नीचा दिखाने का कोई अवसर हाथ से नहीं जाने देते.

अभी उदाहरण के लिए संजय राउत पार्टी के मुखपत्र सामना को अपना हथियार बना पार्टी और काँग्रेस दोनों की बैंड बजाने पर तुले हुए हैं. अभी कुछ दिनों पहले ही सामना ने एक लेख लिखा था जिसमें लिखा था कि शिवसेना हाल ही में जुड़े सदस्यों को ज़्यादा तरजीह दे रही है, जबकि पुराने सदस्यों को नकारा जा रहा है. एक लेख के अनुसार, “कैबिनेट में पदों का बंटवारा देरी से हुआ, लेकिन हुआ. जिन लोगों को सूची में जगह नहीं मिली, वे निराश जरूर हुए लेकिन ऐसे लोगों की लिस्ट बहुत लंबी थी जो कैबिनेट में जगह पाना चाहते थे”. इससे स्पष्ट होता है कि संजय राउत का वही हाल हुआ है, जहां न माया मिली न राम.

परंतु बात यहीं पर खत्म नहीं होती. वीर सावरकर पर जब से राहुल गांधी ने दिल्ली में एक रैली के दौरान उनका मज़ाक उड़ाया था, तब से संजय राउत सामना के जरिये काँग्रेस की खिल्ली उड़ाने और उन्हें आड़े हाथों लेने का कोई मौका हाथ से नहीं जाने देते. सामना में लिखे उनके लेख के अनुसार, “उन्होंने कहा, वीर सावरकर को कारागार में 14 वर्ष बिताने पड़े थे. जो उन्हें कथित रूप से माफी मांगने के लिए आलोचना का शिकार बनाते हैं, क्या वे 72 घंटे भी अंडमान की उस कोठरी में बिता सकते हैं?”

वो कहते हैं न, मधुमक्खी के छत्ते में हाथ डालना अच्छी बात नहीं है. सत्ता की लालसा में संजय राउत को अनदेखा कर उद्धव ठाकरे की सरकार ने वो भूल की है, जो उनके सरकार के लिए आने वाले समय में घातक भी सिद्ध हो सकती है. ये संजय राउत ही थे, जिनके कारण दशकों से चल रहे भाजपा और शिवसेना का गठबंधन टूट गया, और यदि वे ऐसे ही काँग्रेस को चुनौती देते रहे, तो काँग्रेस एनसीपी और शिवसेना के इस खिचड़ी गठबंधन को टूटते देर नहीं लगेगी.

 

 

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