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कॉलेजों-विश्वविद्यालयों में मचा है गदर, HRD मंत्री की नहीं है कोई खबर !

जब वर्ष 2014 में नरेंद्र मोदी की सरकार बनी तो ऐसा लगा कि कुछ परिवर्तन होगा और शिक्षा के क्षेत्र में सुधार किया जाएगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ। अभी तक किसी भी प्रकार का बड़ा रिफॉर्म नहीं देखने को मिला। HRD मंत्रालय ने भी किसी प्रकार की रुचि नहीं दिखाई। हाल में हुई कई यूनिवर्सिटियों में हिंसा ने भी HRD मंत्रालय पर सवाल खड़ा कर दिया है। इन हिंसा में JNU में हुई हिंसा सबसे ऊपर रही है। हालांकि, JNU वर्ष 2016 से ही लाइमलाइट में है। उसके बाद इसी तरह से संस्थान जैसे जामिया मिलिया, जाधवपुर और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय JNU की राह पर चल पड़े।

जब इन यूनिवर्सिटियों में अराजकता बढ़ी, तब देश के HRD मिनिस्टर से यह उम्मीद की जाती है कि वह कुछ कड़े निर्णय लेकर इन अराजक तत्वो से निपटे। परंतु देश में जब से यूनिवर्सिटियों में हिंसा बढ़ी तब हमारे देश के HRD मिनिस्टर ने किसी प्रकार का कड़ा निर्णय नहीं लिया।अक्सर किसी शांत व्यक्ति को अक्षम मान लिया जाता है इसलिए यह जरूरी है कि व्यक्ति समय-समय पर कड़े रुख अपनाता रहे जिसे सभी उसे गंभीरता से ले।

हमारे देश में तो कई लोगों को यह पता भी नहीं होगा कि हमरे देश का HRD मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक हैं। हरिद्वार से सांसद रमेश पोखरियाल निशंक को वर्ष 2019 के चुनावों के बाद पीएम मोदी द्वारा शिक्षा मंत्री के रूप में नियुक्त किया गया था। तब कई लोगों ने पीएम मोदी के इस फैसले पर संदेह प्रकट किया था। आज वह सभी आशंका सही साबित होती दिख रही है क्योंकि इतनी हिंसा होने के बाद भी पोखरियाल का कहीं अता-पता नहीं है।

गायब कहने का यह अर्थ नहीं है कि उन्होंने इस मुद्दे और मौजूदा स्थिति पर बात नहीं की है, बल्कि यह अर्थ है कि वह इस पोर्टफोलियो को संभालने के लिए सही व्यक्ति नहीं हैं जिसे भारत का छात्र समुदाय चाहता हो। आज युवा अपने देश के प्रति जागृत हो रहा है और अपने समृद्ध जड़ो से जुड़ना चाहता है। वो छात्र राजनीति की बकवास में कोई दिलचस्पी नहीं रखते हैं और अपने यूनिवर्सिटियों को ऊपर ले जाना चाहते है। वही दूसरी तरफ अराजक तत्व भी है जो छात्र राजनीति के नाम पर हिंसा कर अपना वर्चस्व कायम करना चाहते हैं।

इन्हें रोकने के लिए ही HRD मंत्री को कुछ निर्णय लेने होंगे ताकि पढ़ने वाला छात्र समूह अपनी और अपने देश की आकांक्षाओं को पूरा कर सके। जेएनयू हिंसा पर, पोखरियाल ने कहा था, “मैंने पहले भी यह कहा है कि इन स्वायत्त संस्थानों को ‘राजनीतिक‘ अडा बनने की अनुमति नहीं दी जा सकती है। इस तरह के हमले में शामिल लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई शुरू की जाएगी। ”

यहां यह याद रखना चाहिए कि इस तरह के बयान दिये जाते है ताकि किसी को यह न लगे कि उनकी नजर इस तरह की घटनाओं पर नहीं है। उनके इस बयान से जमीनी स्तर पर कोई बदलाव नहीं हुआ है। अगर होता तो जेएनयू में दोबारा हिंसा नहीं होती। हम अकेले रमेश पोखरियाल निशंक को दोष नहीं दे सकते, उनके पूर्ववर्ती को भी उसी के लिए जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए।

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