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UN में जिनपिंग को जो सख्त वॉर्निंग भेजे पुतिन, वो अभी तक डी-कोड नहीं पाई दुनिया भर की मीडिया

वुहान वायरस ने वैश्विक राजनीति का दृष्टिकोण पूरी तरह से बदलकर रख दिया है। अब कोई भी देश चीन से संबंध स्थापित करने से पहले दस बार सोचेगा, चाहे वह कितना ही प्रभावशाली और शक्तिशाली क्यों न हो। अमेरिका के UN राजदूत केली क्राफ्ट के शब्दों में “चीन इस पूरे महामारी का दोषी है, जिसने एक स्थानीय बीमारी को एक वैश्विक महामारी में परिवर्तित होने दिया है।” यह बयान अमेरिका, चीन और रूस के बीच यूएन की आम सभा में शुरू हुई तीखी झड़प का हिस्सा था।

UN की आम सभा में चीन, रूस और अमेरिका के बीच वुहान वायरस की उत्पत्ति को लेकर काफी तीखी बहस हुई। चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने स्वभाव अनुसार इस महामारी के लिए अमेरिका और रूस के शीत युद्ध मानसिकता को जिम्मेदार ठहराया, जो उसी पर भारी  पड़ गया और अमेरिकी राजदूत ने चीन को खरी खोटी सुनाते हुए कहा, “शर्म आनी चाहिए तुम्हें!”

लेकिन सबसे अहम बयान आया रूसी विदेश मंत्री सर्जेई लावरोव की ओर से, जिन्होंने कहा, “हम देख रहे हैं कि कई देश इस समय का फ़ायदा उठाकर अपने निजी लाभ की पूर्ति के लिए लगे हुए हैं और जो सरकार उनके विरुद्ध काम कर रही हैं, उन्हें हटाने के लिए एड़ी चोटी का ज़ोर लगा रहे हैं।” हालांकि,इस बयान के साथ सबसे हास्यास्पद बात यह है कि इसे वामपंथी मीडिया ने अमेरिकी सरकार पर रूस का निशाना जताने का प्रयास किया। दिल बहलाने को मीडिया वालों, यह ख्याल अच्छा है।

दरअसल, रूसी मंत्री का निशाना अमेरिका नहीं, चीन था, जिसके साथ मॉस्को के संबंध धीरे-धीरे रसातल में जा रहे हैं। इसमें कोई संदेह नहीं है कि राष्ट्रपति ट्रम्प द्वारा अमेरिका के लिए सत्ता संभालना रूस के लिए हितकारी सिद्ध हुआ है, और चीन के बढ़ते प्रभाव के कारण अब रूस अमेरिका के लिए पहले जितना खतरनाक नहीं है। ऐसे में अब ये प्रश्न उठता है कि यदि रूस ने UN की आम सभा में चीन को निशाने पर लिया तो आखिर क्यों लिया?

सच कहें तो वामपंथी मीडिया द्वारा यह अफवाह फैलाना कि रूसी विदेश मंत्री का बयान अमेरिका केन्द्रित था, एक बकवास वाली बात है। रूसी विदेश मंत्री ने बयान चीन के परिप्रेक्ष्य में कहा था, जिसने अपनी सनक में न केवल वुहान वायरस जैसी महामारी दुनिया पर थोप दी है, अपितु अपने आसपास के सभी देशों की भूमि पर कब्जा जमाना चाहता है, जिसके कारण भारत, रूस, जापान, ताइवान और यहाँ तक कि भूटान जैसे देशों से भी उसका सीमा विवाद चल रहा है।

परंतु रूस ने UN में चीन विरोधी बयान क्यों दिया है? दरअसल चीन रूस के तटीय शहर व्लादिवोस्टोक पर अपना दावा ठोंका है, जिससे यह सिद्ध होता है कि अपने साम्राज्यवाद की भूख को तृप्त करने के लिए चीन किसी भी हद तक जा सकता है। ऐसे में किसी को हैरानी नहीं होनी चाहिए, यदि चीन नेपाल की भांति किसी दिन पुणे, फिर बर्लिन, और ऐसे ही न्यू यॉर्क सिटी पर भी अपना दावा ठोंकने लगे।

लेकिन रूस ने भी कोई कच्ची गोलियां नहीं खेली है। अपनी सुरक्षा को मजबूत करते हुए रूस ने फार ईस्ट में नौसेना की तैनाती को बढ़ावा दिया है, और चीन को चेतावनी दी है कि रूस के साथ हेकड़ी के बहुत बुरे परिणाम भुगतने पड़ेंगे। इसी दिशा में आगे बढ़ते हुए रूस ने अपने अत्याधुनिक एस 400 मिसाइल सिस्टम की डिलिवरी चीन के लिए रोक दी। वैश्विक मीडिया का वामपंथी गुट जिस प्रकार से रूस और चीन को निकट दिखाने का प्रयास करता है, वैसी निकटता अब बिलकुल भी नहीं है।

सच कहें तो इस समय रूसी राष्ट्राध्यक्ष व्लादिमिर पुतिन यह जताना चाहते हैं कि अभी भी उनका प्रभाव कायम है, और वे ट्रम्प प्रशासन के भी समर्थक हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि ट्रम्प के चीन विरोध से रूस को कूटनीतिक तौर पर भी काफी राहत मिल सकती है। ऐसी में किसी को हैरान नहीं होना चाहिए यदि दोनों देश चीन को सबक सिखाने के लिए एकजुट हो जाएँ!

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