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अचानक फिल्मी दुनिया छोड़ गया था ये हिट हीरो, विदेश जाकर आश्रम में बन गया माली !

आज कहानी विनोद खन्ना की। सुनील दत्त ने पहली बार विनोद खन्ना को देखा तो वे उनसे काफी इम्प्रेस हो गए क्योंकि वे पेशावर से थे। दत्त ने अपने होम प्रोडक्शन मन का मीत (1968) में खन्ना और अपने छोटे भाई सोम दत्त को लॉन्च करने का फैसला किया। शुरुआत में, विनोद खन्ना सिर्फ एक अच्छे दिखने वाले खलनायक थे। लेकिन स्क्रीन पर उनके जादू से लोगों को उनके हर तरह रोल पसंद आए और हर फिल्म में उनपर नजर रही। फिर चाहे वह मनोज कुमार के साथ पूरब और पश्चिम हों या राजेश खन्ना (1970) के साथ आन मिलो सजना और सच्चा झूठा।

साल 1971 खन्ना के करियर में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ। तीन फिल्मों में वे तीन अलग-अलग तरह के रोल में पेश हुए। सुनील दत्त की रेशमा और शेरा, गुलजार की मेरे अपने, राज खोसला की मेरा गांव मेरा देश में वे नजर आए।  पर्सनल लाइफ की बात करें तो विनोद खन्ना ने अपने बचपन की दोस्त गीतांजलि से शादी की। दोनों के दो बेटे हुए अक्षय और राहुल खन्ना।

70 का दशक मल्टी-स्टारर फिल्मों का दशक था और विनोद खन्ना एक प्रमुख खिलाड़ी थे, जिनकी जोड़ी अमिताभ बच्चन और अन्य अभिनेताओं के साथ थी। उन्होंने रणथ कपूर के साथ हाथ की सफाई और अमिताभ बच्चन के साथ ख़ून पसीना, परवरिश और अमर अकबर एंथनी में काम किया।

1978 से पहले ही विनोद खन्ना ओशो रजनीश के संपर्क में रहने लगे थे। वे एक नारंगी काफ्तान और मनके की माला को शूटिंग के वक्त पहन कर आते थे। इस फेज के दौरान उनसे इंटरव्यू में कोई भी सवाल पूछो उस सवाल का जवाब वे रजनीश आशो के दर्शन से संबंधित ही देते थे। जब मुंबई (तब बॉम्बे) में थे तो वे सोमवार से शुक्रवार तक शूटिंग करते थे। पैक-अप के बाद वे रजनीश के साथ अपना वीकएंड बीताने के लिए पुणे (तब पूना) का रुख करते थे।

निर्माता रजनीश के लिए उनके जुनून को लेकर चिंतित थे लेकिन विनोद खन्ना को इस चिंता से कोई फर्क नहीं पड़ता था। जैसे-जैसे महीनों बीतते गए, काम में उनकी दिलचस्पी काफी घटती दिखी। और अधिक स्पष्ट होती गई। रजनीश के पूना रिसॉर्ट में कुछ समस्या थी, जिसके कारण ओशो रातोंरात ओरेगन में शिफ्ट हो गए और चाहते थे कि उनके पसंदीदा शिष्य विनोद खन्ना उनको फोलो करे।

1980 में एक समय था जब विनोद खन्ना को पूरा देश पसंद करता था। द बर्निंग ट्रेन के एक्शन हीरो और बहुत लोकप्रिय कुरबानी के रोमेंटिक हीरो। क्या विनोद खन्ना ने अपने गुरु के लिए अपना करियर दांव पर लगा दिया?

जब यह खबर सबसे पहले हमारे कानों तक पहुंची, तो किसी ने भी इसे गंभीरता से नहीं लिया और इसे एक अफवाह के रूप में खारिज कर दिया गया। लेकिन धीरे-धीरे, जैसे-जैसे दिन बीतते गए, निर्देशकों ने यह स्वीकार किया कि खन्ना ने अपने सभी नए प्रोजेक्ट्स को रोक दिया। निर्माताओं ने पुष्टि की कि विनोद खन्ना साइनिंग अमाउंट वापस कर रहे थे। यह गंभीर था।

उनके सह-कलाकार चिंतित थे और उनके डिस्ट्रिब्यूटर नाराज थे। मीडिया जानना चाहता था कि क्या चल रहा है। इसलिए अंत में अपने मेनेजर (तत्कालीन सचिव) की सलाह पर, विनोद खन्ना ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई। प्रोग्राम नए लांच किए गए सेंटूर (आज ट्यूलिप स्टार) होटल में था। उनकी पहली पत्नी गीतांजलि और उनके बेटे सम्मेलन का हिस्सा थे।

उन दिनों, प्रेस कॉन्फ्रेंस उतनी आम नहीं थीं जितनी आज हैं। हर कोई हैरान था कि विनोद खन्ना के साथ क्या चल रहा है। उन्होंने कोई बड़ी स्पीच नहीं दी। उन्होंने कहा कि उन्होंने फिल्मों को छोड़ने और आधार को बदलने का मन बना लिया था और वह अपने दिल को फोलो करना चाहते थे। उनकी पत्नी गीतांजलि उनके पास बैठी थीं, जो उनके फैसले का समर्थन कर रही थीं।

बाद के हफ्तों में, विनोद खन्ना ओरेगन के लिए रवाना हो गए। अगर कहानियों पर विश्वास किया जाए, तो वह रजनीशपुरम आश्रम में एक माली बन गए। हर सुबह, वह उठते थे और पौधों को पानी देते थे। अपने इन सालों के दौरान विनोद खन्ना शायद ही भारत आए। 1985 में उनके तलाक की खबर तक मीडिया ने उनके साथ संपर्क खो दिया।

अपने लंबे ब्रेक के बाद विनोद खन्ना को पहली बार सफेद दाढ़ी के साथ एक फेमस मैग्जीन कवर पर देखा गया था। यह फिल्म इंडस्ट्री के लिए एक संकेत था कि विनोद खन्ना वापस आ गए हैं और निर्माता उनके घर के बाहर लाइन में लग गए। अपने इस फेज से बाहर आने के बाद डिंपल कपाड़िया के साथ और मुकुल आनंद निर्देशित इंसाफ में वे पहली बार नजर आए। उसके बाद फिरोज खान की दयावान थी।

यश चोपड़ा ने उन्हें चांदनी के लिए साइन किया, जबकि महेश भट्ट ने उन्हें जुर्म के लिए चुना। 90 के दशक में उन्हें प्रोफेशनल नुकसान हुआ। लेकिन व्यक्तिगत स्तर पर, खन्ना ने कविता से अपनी शादी की घोषणा की। 1997 में, उन्होंने अपने बेटे अक्षय खन्ना को अपने होम प्रोडक्शन हिमालयपुत्र में लॉन्च किया। फिल्म नुकसान में गई।

वर्ष 1997 में उन्हें भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में शामिल होने और लोकसभा चुनाव में गुरदासपुर निर्वाचन क्षेत्र, पंजाब से जीतने का मौका मिला। 1999 में उन्हें उसी निर्वाचन क्षेत्र से लोकसभा के लिए फिर से चुना गया। इस समय तक, खन्ना ने बॉलीवुड और राजनीति दोनों को संतुलित करना सीख लिया था। 2009 के लोकसभा चुनाव में हारने के बाद, खन्ना ने 2014 के आम चुनावों में वापसी की। 27 अप्रैल 2017 को उनका निधन हो गया।

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