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गायों के पैरों तले रौंदा कर होता है सूअर वध, फिर खेली जाती है लट्ठमार दीपावली

दीपावली के पर्व को जहां प्रकाश पर्व के रूप में मनाये जाने की परम्परा हैं वहीं वीरभूमि बुन्देलखण्ड क्षेत्र के सभी जनपदों में दिवाली के अगले दिन परेवा को सूअर वध के साथ दिवाली खेलने की प्रथा कायम हैं. ये परम्परा हजारों साल पुरानी हैं जिसमें तमाम इलाकों में सूअर को रस्सी से बांधकर गायों के पैरों तले फेंका जाता हैं.

दिवाली के ढोल बजने पर सूअर को सींग से मारते हुये गायें मैदान से निकलने की कोशिश करती हैं मगर गायें भी रस्सी से बांधकर दिवाली नृत्य स्थल पर लायी जाती हैं. इस तरह की परम्परा की दिवाली देखने के लिये लोगों की भारी भीड़ भी उमड़ती हैं.

शहरी इलाकों में इस तरह की दिवाली दोपहर के समय होती हैं लेकिन ग्रामीण इलाकों में दिवाली नृत्य की टोलियां शाम को सूअर वध के साथ लट्ठमार दिवाली खेलते हैं. सूअर वध गाये अपनी सींग से करती हैं. ये खेल तब तक चलता है जब तक सूअर का काम तमाम नहीं हो जाता हैं.

यदि दिवाली के दौरान गायों के रौंदने के बाद भी सूअर बच जाता हैं तो उसे बाद में छोड़ दिया जाता हैं. सूअर वध के साथ दिवाली खेलने वाले पूरी रात ढोल बजाते हुये नगर का भ्रमण भी करते हैं. इसके लिये तैयारियां शुरू कर दी गई हैं.

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