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छठ पर्व : खरना के दिन बनाए और खाए जाते हैं कौन-कौन से पकवान ?

छठ पर्व में नहाय-खाय के बाद दूसरे दिन खरना होता है. 1 नवंबर शुक्रवार को कार्तिक शुक्ल पंचमी है. इसी दिन छठ का खरना मनाया जाता है. खरना के दिन खीर पूड़ी बनाई जाती है. सोमवार को ज्ञान पंचमी और जया पंचमी भी है. मां सरस्वती और मां लक्ष्मी को खीर पूड़ी का भोग लगाया जाता है. इस दिन व्रती शुद्ध मन से सूर्य देव और छठ मां की पूजा करके गुड़ की खीर का भोग लगाते हैं. खीर पकाने के लिए साठी के चावल का प्रयोग किया जाता है. भोजन काफी शुद्ध तरीके से बनाया जाता है.

छठ के खरने का खाना

चार दिनों तक चलने वाले पर्व के दूसरे दिन व्रती पूरे दिन निर्जला उपवास पर रहते हैं. शाम में मिट्टी के चूल्हे और आम की लकड़ी पर खाना बनाते हैं. केले के पत्ते पर खाने का रिवाज है. खाने में रोटी और गुड़ में बनी खीर, साथ ही केला खाने का विधान है. पूजा के बाद शाम में व्रती यह प्रसाद खाते हैं. इसके बाद 36 घंटे का निर्जला व्रत रहता है. खरने के बाद पूजा के घर में ही व्रती सोते भी हैं. बिस्तर भी पूजा के लिए खास तौर पर धोया जाता है.

आम की लकड़ी पर बनता है खरने का प्रसाद

देवता को चढ़ाए जाने वाले खीर को व्रती खुद पकाते हैं. खरना के दिन जो प्रसाद बनता है, उसे नए चूल्हे पर बनाया जाता है. व्रती खीर अपने हाथों से पकाते हैं. इसमें ईंधन के लिए सिर्फ आम की लकड़ी का इस्तेमाल किया जाता है. इसे उत्तम माना जाता है. अलग चूल्हे और अलग स्थान पर खरना बनाया जाता है. जबकि शहरों में लोग नए गैस स्टोव पर खरना का प्रसाद बनाते हैं क्योंकि वहां आम की लकड़ी और चूल्हा नहीं होता है. हां, लेकिन यह प्रसाद किचन में नहीं बल्कि किसी साफ-सुथरे स्थान पर बनाया जाता है.

सबसे पहले इन्हें दिया जाता है प्रसाद

अगले दिन डूबते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है. सुबह 3 बजे से ठेकुआ और छठ का अन्य प्रसाद बनना शुरू होता है जो खरने के लिए बने मिट्टी के चूल्हे पर भी बनता है. इस प्रसाद को किसी को छूने नहीं दिया जाता है जब तक कि दोनों दिनों का अर्घ्य दिया न जाए. आखिरी दिन उगते सूर्य को अर्घ्य देने के बाद ठेकुआ, फल, गन्ना, केला समेत सभी प्रसाद सबसे पहले पूजारी को दिया जाता है फिर व्रती ग्रहण करते हैं उसके बाद बाकी लोगों को दिया जाता है. इसी के साथ 4 दिन का छठ पर्व संपन्न हो जाता है.

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