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दिल्ली चुनाव को तय करने वाला सवाल- केजरीवाल के मुकाबले कौन ?

बीजेपी दिल्ली की सत्ता से पिछले 21 साल से दूर है और पार्टी इस बार अपने सियासी वनवास को ख़त्म करने के लिए एड़ी चोटी की ज़ोर लगा रही है. बीजेपी केंद्र सरकार के काम और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चेहरे को भुनाने की क़वायद में है क्योंकि दिल्ली में 6 महीने पहले ही लोकसभा चुनाव की जंग केजरीवाल बनाम मोदी की हुई थी, जिसमें आप को काफी नुक़सान हुआ था. ऐसे में दिल्ली विधानसभा चुनाव 2020 में सबसे बड़ा सवाल यही है कि अरविंद केजरीवाल के सामने कौन है? आम आदमी पार्टी भी बीजेपी से यही सवाल पूछ रही है कि दिल्ली में उसका मुख्यमंत्री पद का दावेदार कौन है?

बीजेपी ने इस पर कुछ नहीं कहा है. हालांकि, बीजेपी चाहेगी कि ये चुनाव मोदी बनाम केजरीवाल हो लेकिन सबको मालूम है कि प्रधानमंत्री नरेंद मोदी या गृह मंत्री अमित शाह दिल्ली के मुख्यमंत्री तो बन नहीं सकते. जब तक बीजेपी, अरविंद केजरीवाल के ख़िलाफ़ किसी को खड़ा नहीं करती केजरीवाल बनाम कौन का सवाल बना रहेगा. सच तो यह है कि ये चुनाव 2015 के केजरीवाल बनाम 2020 के केजरीवाल के बीच है. क्योंकि 2015 का केजरीवाल एक बाग़ी था, एक विद्रोही था, सड़क पर बैठने वाला एक प्रदर्शनकारी था, मुख्यमंत्री कम आंदोलनकारी ज़्यादा था. आज का केजरीवाल एक यथास्थितिवादी है, अपने काम के आधार पर चुनाव लड़ रहा है. आज का केजरीवाल समझदार है.

गौरतलब है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2015 के चुनाव में दिल्ली में कई चुनावी रैलियां कीं थीं लेकिन इसके बावजूद उनकी पार्टी को 70 में से केवल 3 सीटें मिली थीं. इस बार उन्होंने अब तक एक बड़ी रैली की है और कई रैलियां करने वाले हैं. मार्के की बात तो यह है कि 2015 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में बीजेपी को 32 प्रतिशत वोट पड़े थे जो 2013 के विधानसभा चुनाव से एक प्रतिशत ही कम था. लेकिन उसे 2013 में 31 सीटें मिली थीं जबकि 2015 में केवल 3. दरअसल दिल्ली के वोटरों को पता है कि वो (मोदी) दिल्ली के मुख्यमंत्री नहीं हो सकते.

खासकर दिल्ली सहित देश के वोटरों को लगता है कि केंद्र में मोदी का कोई विकल्प नहीं है. उसी तरह से दिल्ली के वोटरों को लगता है कि फिलहाल केजरीवाल का कोई विकल्प नहीं है. आज की तारीख में केजरीवाल के सामने कांग्रेस या बीजेपी का कोई बड़ा नेता उनके क़द का नज़र नहीं आता है. इस चुनाव का सबसे बड़ा मुद्दा ख़ुद अरविंद केजरीवाल हैं और उनके मुक़ाबले में कोई विपक्ष का नेता है ही नहीं. बीजेपी के अंदर इस बात पर चिंता है कि मुख्यमंत्री का उम्मीदवार कौन हो? किसे इस पद के लिए चुनावी मुहिम से पहले आगे किया जाए? कुछ नाम सामने भी आये हैं जैसे मनोज तिवारी, हर्षवर्धन, विजय गोयल, प्रवेश वर्मा और मीनाक्षी लेखी. लेकिन इनमें से कोई भी केजरीवाल का मुक़ाबला कर नहीं सकता.

एक चेहरा हो सकता था केंद्रीय मंत्री स्मृति इरानी का. स्मृति इरानी का क़द बड़ा है, उनकी छवि भी ठीक है और ये कि वो एक दबंग महिला के रूप में देखी जाती हैं लेकिन अब बहुत देर हो चुकी है. अगर लोकसभा चुनाव के तत्काल बाद उन्हें मुख्यमंत्री के चेहरे के रूप में लाया जाता तो कोई बात बनती. दूसरी तरफ कांग्रेस के खेमें में भी केजरीवाल का मुक़ाबला करने वाला कोई नेता नहीं नज़र आता. शायद इसलिए इस बार भी पार्टी शीला दीक्षित के नाम पर चुनाव लड़ रही है. दोनों पार्टियों में लीडरशिप के संकट को देखते हुए विशेषज्ञ ये कह रहे हैं कि ये चुनाव केजरीवाल बनाम मोदी नहीं है बल्कि केजरीवाल बनाम कोई नहीं है.

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