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आपकी फेवरेट ‘Maggi’ है मजबूरी में हुई ईजाद, जानिए कैसे मिला ये नाम?

भारतीय बाजार में मैगी की एंट्री को 37 साल हो चुके हैं. साल 1984 में बाजार में आई मैगी ने कभी खुद भी नहीं सोचा होगा उसे इतना प्यार मिलेगा. नेस्‍ले इंडिया लिमिटेड ही वो कंपनी है, जो इसे भारत लाई. मिनटों में बनने वाली मैगी सबको पसंद है. सन 1947 में ब्रांड ‘Maggi’ का स्विट्जरलैंड की कंपनी नेस्ले के साथ विलय हुआ था, जिसके बाद से अब तक मैगी नेस्ले का सबसे फेमस ब्रांड बनी हुई है. नेस्ले इंडिया विज्ञापन पर करीब 100 करोड़ रुपए खर्च करती है, जिसमें मैगी की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा है. भारत के मोस्ट वैल्यूड ब्रांड में से एक मैगी, असल में स्विट्ज़रलैंड की मशहूर कंपनी नेस्ले का सहयोगी ब्रांड है, लेकिन अधिकतर लोग नेस्ले को कम, मैगी को ही मूल ब्रांड मानते हैं.

कैसे पड़ा मैगी का नाम?

बात तब की है, जब मैगी का जन्म मजबूरी में हुआ था. वक्त की कमी के कारण. मैगी ब्रांड असल में सन 1872 में स्विट्ज़रलैंड के एक उद्यमी जूलियस मैगी ने स्थापित किया था. स्विट्ज़रलैंड में यह औद्योगिक क्रांति का दौर था जब यहां की महिलाओं को लंबे समय तक फैक्ट्रियों में मजदूरी का काम करना होता था. काम के घंटे लंबे होने के कारण खाना बनाने के लिए बहुत कम समय बचने लगा तो स्विस पब्लिक वेलफेयर सोसायटी ने जूलियस मैगी की मदद ली. इस तरह मैगी का जन्म मजबूरी में हुआ, ताकि अपनी जरूरत को पूरा किया जा सके. जूलियस ने प्रोडक्ट का नाम अपने सरनेम पर रख दिया. वैसे उनका पूरा नाम जूलियस माइकल जोहानस मैगी था. साल 1897 में सबसे पहले जर्मनी में मैगी नूडल्स पेश किया गया था.

नेस्ले ने खरीदा और हर घर तक पहुंची मैगी

शुरुआत में जूलियस ने प्रोटीन से भरपूर खाना और रेडीमेड सूप बनाया. इस काम में उनके फिजिशियन दोस्त फ्रिडोलिन शूलर ने उनकी काफी मदद की. लेकिन दो मिनट में बनने वाली मैगी को लोगों ने खूब पसंद किया. साल 1912 तक मैगी ने अमेरिका और फ्रांस जैसे कई देशों के लोगों ने इसे हाथों हाथ लिया. मगर इसी साल जूलियस मैगी का निधन हो गया. उनकी मौत का असर मैगी पर भी पड़ा और लंबे समय तक इसका कारोबार धीरे-धीरे चलता रहा. फिर आया साल 1947, जब नेस्ले ने मैगी को खरीद लिया और उसकी ब्रांडिंग और मार्केटिंग ने मैगी को हर घर के किचन में पहुंचा दिया.

भारत में जोखिम भरे कदम

अस्सी के दशक में जब पहली बार नेस्ले ने मैगी ब्रांड के तहत नूडल्स लॉन्च किए तो वह शुद्ध रूप से उन शहरी लोगों के लिए नाश्ते का विकल्प था, जिनके पास खाने और पकाने का ज्यादा समय नहीं होता था. यह वह दौर था जब देश आपातकाल के सदमे से उबर रहा था और सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश में उठापटक वाली राजनीति जोरों पर थी. देश में केवल एक ही ब्रांडनेम टॉप पर था और वह था इन्दिरा गांधी का. बाजार और अर्थव्यवस्था उसी डर भरी डगर पर चल रहे थे, जो 35 साल पहले आजादी के समय बनी थी. ऐसे में किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी के लिए अपने नए और डिफरेंट प्रोडक्ट को एकदम नए अछूते बाजार में लॉन्च करना सिवाय जोखिम के कुछ और न था. बहरहाल, नेस्ले ने मैगी के साथ यह जोखिम उठाया.

भारतीय किचन में पहुंचा मैगी

नेस्ले ब्रांड कॉफी, चॉकलेट और मिल्क पाउडर के लिए तो मशहूर और भरोसेमन्द था, पर नूडल्स जैसी बिल्कुल अलग चीज को जमाने के लिए इसे बहुत पापड़ बेलने पड़े. शुरुआत में कंपनी ने वही नूडल्स बाजार में उतारे जो दूसरे देशों में प्रचलित थे. हालांकि, नूडल्स के कारण भारत में ऐसा कोई चमत्कार देखने को नहीं मिला जो अमेरिका में मैक्डॉनल्डस के बर्गर और डोमिनोज के पिज्जा के कारण हुआ था. धीमे-धीमे बदलती लाइफस्टाइल के साथ खाने की आदतें भी उसी अनुपात में बदल रही थीं. 1991 के बाद आए आर्थिक उदारीकरण के दौर में जब हमारे बाजारों के दरवाजे दुनिया के लिए खुलने लगे तो बदलावों की गति तेज हो गई. मैगी को भी इसका फायदा मिला. 2 मिनट में तैयार होने वाली मैगी आधुनिक मांओं के किचन की जरूरत बनने लगी.

भारतीयों को नापसंद, बदला स्वाद

नेस्ले ने बिक्री और बाज़ार हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए 1997 में मैगी नूडल्स को बनाने के फॉर्मूले में बदलाव कर नए नूडल्स पेश किए. भारतीय उपभोक्ताओं को यह बदलाव पसन्द नहीं आया और उन्होंने मैगी को नकार दिया. दो साल तक बिक्री लगातार गिरी और आखिरकार 1999 में कंपनी को पुराने फर्मूले पर लौटना पड़ा. आज भी मैगी के पारंपरिक 2 मिनट में तैयार होने के दावे वाले मैदा नूडल्स ही नंबर वन पसन्द हैं.

1000 करोड़ सालाना बिक्री का नूडल्स बाजार

मैगी ब्रांड के तहत नेस्ले ने कई दूसरे प्रोडक्ट भी लॉन्च किए. इनमें सूप, भुना मसाला, मैगी कप्पा मैनिया इंस्टैंट नूडल्स जैसे प्रोडक्ट हैं. भारत में मैगी के 90 फीसदी प्रोडक्ट खासतौर पर भारत की विविधता से भरी संस्कृति को ध्यान में रखकर बनाए गए हैं और ये बाकी दुनिया में नहीं मिलते. भारत में नेस्ले समूह के कुल मुनाफे में मैगी ब्रांड की करीब 25 फीसदी हिस्सेदारी हो चुकी है और सालाना आंकड़ा करीब 1000 करोड़ रुपए से ज्यादा पहुंच चुका है. अब इस बाजार में आधा दर्जन नए ब्रांड आ चुके हैं. इनमें से ज्यादातर रिटेल चेनों के अपने ब्रांड हैं.

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