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यूपी चुनाव में सत्ता विरोधी लहर की काट खोज ली बीजेपी, अपनी पुरानी रणनीति अपनाएगी

उत्तर प्रदेश की राजनीति में मुख्यमंत्रियों का सत्ता के मैदान पर लंबा टिकना उनके लिए किसी उपलब्धि से कम नहीं है। स्वतंत्रता बाद से देश के सबसे बड़े सूबे में स्थिर सरकार और कार्यकाल पूरा करने वाले मुख्यमंत्रियों की संख्या कम रही है। उत्तर प्रदेश में स्वतंत्रता के बाद सबसे पहले मुख्यमंत्री पंडित गोविंद बल्लभ पंत रहे, जो 2007 से पूर्व अपना कार्यकाल पूरा करने वाले एकमात्र मुख्यमंत्री थे। उनके बाद 2007 में सत्ता पर काबिज हुई बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती ने अपने कार्यकाल को पूरा किया था। वहीं, 2022 के विधानसभा चुनावों की आहट होते ही वर्तमान सत्ताधारी दल भारतीय जनता पार्टी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में अपने वोट को चिन्हित कर और 2017 उत्तर प्रदेश चुनावों के अनुरूप ही प्रदर्शन को दोहराने की तैयारी में जुट चुकी है। इसके लिए भाजपा सुस्त विधायकों का पत्ता साफ करने की तैयारी भी कर रही है।

2017 उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में एक ओर भाजपा ने स्वयं 403 सीटों में कुल 312 सीटें प्राप्त कर सबको चौंका दिया था, वहीं अपने गठबंधन साथियों को मिश्रित कर एनडीए गठबंधन को कुल 322 सीटें हासिल हुईं थी। इस प्रदर्शन को बरकरार रखने के ध्येय से बीजेपी उत्तर प्रदेश में अपने विधायकों के काम का REPORT CARD बनाकर यह तय करेगी कि उस विधायक कि कार्यशैली उस क्षेत्र की जनता को पसंद आई है, या उसका विरोध चरम पर है। यदि किसी भी विधायक के काम से वहां की जनताखश नहीं दिखी तो भाजपा उसका टिकट काटने के लिए अभी से कमर कस चुकी है।

बीजेपी के हित में मिले 2014 चुनाव परिणामों के बाद उसके हौसलों में हुई वृद्धि ने उसके रणनीतिगत फैसलों पर अहंकार का चश्मा नहीं आने दिया। तभी वो उन सभी राज्यों में सरकार बनाने में सफल होती गयी, जहां उसका खाता खुलना बड़ी बात होती थी। अपने परिणामों को दोहराने के बीच जब भी कोई रोड़ा बीजेपी के समक्ष आया, उसको हटाने में शीर्ष नेताओं ने देर नहीं लगाई। फिर चाहे मौजूदा प्रतिनिधियों के प्रति जनता का असंतोष या आक्रोश हो या उसकी कार्यशैली कमजोर हो, पार्टी ने उस व्यक्ति का टिकट काटने में क्षण भर नहीं सोचा। फिर चाहे कोई भी बड़ा नेता या राजनीतिक धुरंधर ही क्यों न उस सूची में शामिल रहा हो।

ऐसा बहुत बार हुआ जब, ANTI-INCUMBENCY पार्टी की छवि और राजनीतिक परिणामों पर हावी होती नज़र आई, पर सही समय पर सही निर्णय लेते हुए भाजपा ने हर जगह अपनी साख बचा ली। गुजरात में 20 साल से बीजेपी सत्ता में है, हर चुनाव में विरोधी लहर उग्र होते हुए भी बीजेपी सत्ता पर विराजमान होने में सफल रही है। जब-जब चुनाव नजदीक आते थे, गुजरात में ANTI INCUMBENCY चरम पर दिखाई पड़ता था, जिसका प्रमुख कारण जनता की उनके क्षेत्र के विधायक के प्रति खिन्नता और असंतुष्टि वाला व्यवहार था। बीजेपी इसको भुनाने के लिए एक ही चाल चलती थी, उन सभी विधायकों को घर बैठाकर नए कार्यकर्ता को चुनाव लड़ने का मौका प्रदान करती थी जिससे विरोधी दलों का ANTI INCUMBENCY फॉर्मूला ध्वस्त हो जाता था।

गुजरात से ऊंची छलांग भाजपा ने दिल्ली में 2017 नगर निगम चुनावों में लगाई थी। जब उसने भ्रष्टाचार में लिप्त होने के आरोपों और क्षेत्र में बढ़ रहे रोष का सामना कर रहे निगम पार्षदों के टिकट काट, राज्य के सभी 272 वार्डों पर नए चेहरे उतार दिए थे। इस चुनाव में बीजेपी ने नारा भी ऐसा दिया था कि दिल्ली की जनता ने उसे तीसरी बार तीनों निगमों में पूर्ण बहुमत दिया, वो नारा जो भाजपा को इतने विरोध के बाद भी निगम की सत्ता पुनः दिलाने में कामयाब रहा था, वो नारा था- “नए चेहरे नयी उड़ान, दिल्ली मांगे कमल निशान।” इसके फलस्वरूप बीजेपी को 272 सीटों में कुल 181 सीटों पर विजय प्राप्त हुई थी।

मोदी सरकार के लिए 2019 लोकसभा चुनाव उसके कार्यों पर जनता का मत प्राप्त करने की परीक्षा थ। तो वहीं भाजपा को कम प्रदर्शन करने वाले सांसदों को बाहर करना था, जिसके लिए उसे यहाँ भी गुजरात और दिल्ली के फॉर्मूला को आज़माना पड़ा। इस चुनाव में भी भाजपा ने कई मौजूदा सांसदों के टिकट काट दिए थे, भाजपा ने 2014 के मुकाबले 90 सांसदों के टिकट काटे थे, जिनमें 5 सांसद पार्टी छोड़ गए थे तो कुछ सांसद 75+ उम्र के CRITERIA की वजह से पिछड़ गए थे।

अब ये गणित भाजपा के लिए उत्तर प्रदेश में सत्ता वापसी का TRUMP CARD  बनता है या  नहीं वो आने वाला 2022 बताएगा। दरअसल, उत्तर प्रदेश में फिलहाल 100 विधायकों को उनकी आलसी और सुस्त कार्यशैली के चलते घर बैठना पड़ सकता है, और संगठन इन सबकी टिकट काट नए चेहरों पर दाँव लगाने की योजना बनाने में जुट चुका है।

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