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225 बीघा खेत को बनाये बकराशाला, कटने से पहले खरीद लेते हैं बकरे, अब तक 400 की बचाई जान

आपने अभी तक गोशाला या दूसरे पशुओं के लिए बाड़े के बारे में सुना होगा, लेकिन बकरों के लिए धर्मशाला यह पहली बार। पाली जिले के खौड़ गांव के निकट एक व्यापारी ने बकरों की जान बचाने के लिए अपने 225 बीघा खेत में बकराशाला यानी बकरों के लिए धर्मशाला बना दी। जहां इनकी देखरेख की जाती है। इसमें करीब 400 बकरे हैं। ये वो बकरे हैं जो कटने के लिए ले जाए जा रहे थे, लेकिन इन्हें बचाकर इस बकरशाला में लाया गया।

खेत में बकरों के लिए बनाया गया टीन शेड।

खेत में बकरों के लिए बनाया गया टीन शेड।

दरअसल, जैन धर्म में जीव दया को सबसे बड़ा माना गया है और इसी को साकार करने के लिए पाली के ज्ञानचंद लुंकड़ ने जैन संतों की प्रेरणा से अपने 225 बीघा खेत में बकराशाला को तीन साल पहले तैयार किया था। इनमें दानदाताओं के सहयोग से जोधपुर बकरामंडी से बकरों को खरीदकर रखा जाता है। वर्तमान में यहां करीब 400 बकरे हैं, जिनके खाने-पीने, रहने की सारी व्यवस्था शाह धुलचंद अचलचंद लुकड़ ट्रस्ट की ओर से की जा रही है और इन्होंने मरते दम तक इनकी सुरक्षा और देखभाल का प्रण लिया है।

खेत में बने अवाले पर पानी पीते बकरे।

खेत में बने अवाले पर पानी पीते बकरे।

जैन संतों से मिली प्रेरणा

ज्ञानचंद लुंकड़ ने बताया कि लोकमान्य जैन संत रूपमुनि व साध्वी अमित गुणा की प्रेरणा से उन्होंने इसका संचालन शुरू किया। करीब चार साल पहले खौड़ गांव में साध्वी अमितगुणा का चातुर्मास था। इस दौरान उनसे मिले तो उन्होंने कहा कि गायों के प्राण बचाने एवं उनके संरक्षण के लिए तो काफी गोशालाएं संचालित हो रही हैं, लेकिन अकाल मौत का शिकार हो रहे बकरों को बचाने के लिए कुछ नहीं किया जा रहा। तुम एक बकराशाला खोलना जिसमें कटने जा रहे बकरों को रखकर उनकी मरते दम तक प्राणों की रक्षा करो। क्योंकि किसी मरते हुए जीव को बचाकर उसकी सेवा करने से बड़ा धर्म या पुण्य का काम इस दुनिया में नहीं है। उनकी बात ज्ञानचंद लुंकड़ के मन में बैठ गई। इसके बाद खौड़ गांव के निकट अपने 225 बीघा खेत को बकराशाला का रूप देने के लिए उन्होंने तैयारी शुरू कर दी। खेत की चारदीवारी, बकरों के लिए टीन शेड का हॉल, पीने के पानी के लिए कुआं खुदवाने, अवाला बनाने, चारा व धान गोदाम बनाने के साथ ही बकरों की देखभाल के लिए वहां कर्मचारियों को रखने के लिए कमरों का निर्माण करवाया। इसमें करीब 75 लाख रुपए का खर्च आया। शुरुआत में ट्रस्ट खुद राशि खर्च कर जोधपुर मंडी से बकरे खरीद कर लाने लगी। बाद में दानदाता भी इस नेक काम में बकरे खरीदने में आर्थिक सहयोग देने लगे। बकरा शाला को संचालन को करीब 3 साल हो गए।

बकराशाला संचालित करने वाले पाली के ज्ञानचंद लुंकड़।

बकराशाला संचालित करने वाले पाली के ज्ञानचंद लुंकड़।

सालाना 30 लाख रुपए का खर्च

यहां करीब 400 बकरों का पालन-पोषण हो रहा है। बकरों को खाने में सुबह-शाम जौ दिया जाता है और इनके पानी पाने के लिए बकरा शाला में तीन अलग-अलग जगह पर पानी के अवालें बनाए गए हैं। सर्दी में इनको खाने में बाजरी दी जाती है। इसके साथ ही ट्रस्ट की ओर से बीमारियों से बचाने के लिए इनका टीकाकरण करवाने, मौसम परिवर्तन होने पर स्नान भी करवाया जाता है। इन पर सालाना 30 लाख रुपए खर्च किया जाता है।

खेत में चरते बकरे।

खेत में चरते बकरे।

शुरुआत में आई परेशानी

लुंकड़ ने बताया कि शुरुआत में बकराशाला संचालन में उन्हें आर्थिक रूप से परेशानी का सामना करना पड़ा, लेकिन इस नेक काम में बाद में कई दानदाता जुड़े। जो कटने जा रहे बकरे खरीदने के लिए ट्रस्ट को 7 हजार रुपए प्रति बकरे की सहयोग राशि देने लगे।

 

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