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दिल्ली, कर्नाटक, बिहार, यूपी.. कोरोना पर इनकी वो एक गलती जो आज ‘कातिल’ साबित हो रही

 

नई दिल्ली
योजनाओं के नाम पर करोड़ों-अरबों रुपये का बंदरबांट होता रहे, रसूखदार नाजायज सुविधाएं लेते रहें, नेताओं और सरकारी अमलों के तामझाम में पैसे पानी की तरह बहाए जाएं, लेकिन संकट काल में तैयार अस्थाई अस्पताल को जितना जल्दी हो सके, बंद कर दो- ये है हमारे देश में सरकारी तंत्र की मानसिकता। कोरोना वायरस की पहली लहर से निपटने के लिए अलग-अलग राज्यों ने कोविड मरीजों की देखभाल और उनके इलाज के लिए जो टेंपररी इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयार किया गया था, वो जनवरी-फरवरी में महामारी के मद्धम पड़ते ही ध्वस्त कर दिए गए। आज कोरोना किस रूप में हमारे सामने मुंह बाए खड़ा नहीं बल्कि डटा है, यह हम ही नहीं, पूरी दुनिया महसूस कर रही है।

महामारी के कहर के बीच मूकदर्शक बना सरकारी सिस्टम

अब जब महामारी हर दिन और भयावह हो रही है तो सिस्टम के हांथ-पांव फूल रहे हैं। इसी सिस्टम ने थोड़ी सी राहत दिखते ही अस्थाई अस्पताल बंद कर दिए, कॉन्ट्रैक्ट पर रखे गए स्वास्थ्यकर्मियों की छुट्टी कर दी और ऑक्सिजन, वेंटिलेटर, बेड जैसी बिल्कुल अनिवार्य आवश्यकताओं की पूर्ति पर विचार तक नहीं किया। आज इन सुविधाओं के अभाव में लाशें बिछ रही हैं और ये सिस्टम मूकदर्शक बना हुआ है।

दिल्ली ने बंद किए चार अस्थाई कोविड केंद्र

बात पहले राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की कर लेते हैं। पिछले साल जब दिल्ली में कोरोना से हाहाकार मचलने लगा था तो जून-जुलाई के महीनों में चार अस्थाई अस्पताल बनाए गए। आईटीबीपी ने छतरपुर में 10 हजार मरीजों को संभालने की क्षमता वाला इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयार किया जिसमें कम-से-कम 1,000 ऑक्सिजन बेड थे। धौला कुआं और कॉमनवेल्थ गेम्स विलेज में भी कमोबेश इसी तरह की व्यवस्था की गई थी। लेकिन फरवरी आते-आते कोरोना की रफ्तार सुस्त पड़ी तो इन अस्थाई केंद्रों को भी बंद कर दिया गया। अब दिल्ली में हर दिन 25,000 के आसपास नए कोविड केस आ रहे हैं। हालत यह है कि पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था चरमरा गई है। मरीजों को ऑक्सिजन और वेंटिलटर क्या, बेड तक नहीं मिल पा रहे हैं।

उत्तर प्रदेश सरकार को भी इस बात की बड़ी चिंता सता रही थी कि अस्पतालों पर बहुत पैसे खर्च हो रहे हैं। तभी तो उसने 500 अस्पतालों में कोविड महामारी के मद्देनजर सुविधाएं बढ़ाने के फैसले को वापस ले लिया। पिछले साल यूपी सरकार ने अस्पतालों को सुविधाओं के नजरिए से तीन स्तर में बांटा। लेवल 1 में 400, लेवल 2 में 75 जबकि लेवल 3 में 25 अस्पतालों को रखा गया। लेवल 1 के अस्पतालों में वेंटिलेटर, आईसीयू, डायलेसिस जैसी अत्याधुनिक सुविधाएं मुहैया कराने की बात तय हुई थी। साथ ही कहा गया था कि इन 400 अस्पतालों में कम-से-कम 48 घंटे का मेडिकल ऑक्सिजन का भंडार रहेगा।

लेकिन जैसे ही कोरोना केस घटने शुरू हुए, सरकार को सबसे पहले अस्पतालों की सुविधाओं में कटौती का ख्याल आया। उसने तीनों स्तरों के सिर्फ 83 अस्पतालों में ही सुविधाएं बढ़ाईं और बाकी काम ठंडे बस्ते में डाल दिया। इन 83 अस्पतालों में 17,235 बेड हैं जिनमें 7,023 में ऑक्सिजन जबकि 1,342 में वेंटिलेटर सपॉर्ट है। 31 मार्च से जब प्रदेश में कोरोना केस दोबारा तेजी से बढ़ने लगे तो 45 और अस्पतालों में सुविधाएं बढ़ाने का फरमान जारी किया गया। इन्हें मिलाकर कुल बेड कपैसिटी 2,5000 की होगी। यूपी सरकार को लगता है कि इतने बेड काफी हैं जबकि हकीकत यह है कि उत्तर प्रदेश सबसे ज्यादा डेली केस वाले राज्यों की लिस्ट में महाराष्ट्र के बाद दूसरे नंबर पर है। वहां अभी एक दिन में करीब 40 हजार नए केस सामने आ रहे हैं।

झारखंड में स्वास्थ्य सुविधाओं के जर्जर हालात

बहरहाल, यह भी जान लें कि राज्य सरकार ने हर जिले में एक अस्पताल को कोविड मरीजों के लिए समर्पित करने का लक्ष्य रखा। रांची, धनबाद, बोकारो, जमशेदपुर जैसे बड़े शहरों के 12 प्राइवेट अस्पतालों को भी कोविड हॉस्पिटल घोषित कर दिया गया, लेकिन इनकी शिकायत है कि सरकार उनके खर्चे उठाने में आनाकानी कर रही है। इस साल महामारी की रफ्तार इतनी तेज है, लेकिन झारखंड के अस्पतालों में कोविड मरीजों के लिए बेड बढ़ाने को लेकर उदासीनता बरकरार है।

सुशासन बाबू के बिहार का शर्मनाक हाल
कुछ ऐसा ही हाल पड़ोसी राज्य बिहार का भी है। नीतीश कुमार करीब 15 वर्षों से यहां शासन कर रहे हैं, लेकिन अस्पताल तो छोड़िए पर्याप्त संख्या में स्वास्थ्यकर्मी नहीं हैं। फिर भी साहब को ‘सुशान बाबू’ का तमगा हासिल है। प्रदेश में डॉक्टरों की 5,000 सीटें खाली हैं, लेकिन महामारी के वक्त भी इसे भरने की जहमत नहीं उठाई गई। कोरोना की पहली लहर में जिला अस्पतालों से मांग उठी कि कम-से-कम 10-10 वेंटिलेटर की व्यवस्था की जाए, लेकिन सिर्फ 10 जिला अस्पतालों में ही 5 से ज्यादा वेंटिलेटर की व्यवस्था हो सकी। बिहार में एक भी ऑक्सिजन प्लांट नहीं है इसलिए उसे झारखंड पर निर्भर रहना पड़ रहा है।

अब बात दक्षिणी राज्य कर्नाटक की। बीजेपी शासित इस राज्य में भी हर दिन 25 हजार से ज्यादा नए कोविड केस सामने आ रहे हैं। पिछली लहर में कोरोना मरीजों की मृत्युदर के मामले में कर्नाटक की स्थिति दयनीय थी। कुल कोरोना केस का दो-तिहाई हिस्सा राजधानी बेंगलुरु से आ रहा है। फिर भी, जब पिछली लहर नरम पड़ी तब से लेकर नई लहर के जोर पकड़ने तक इस शहर में सिर्फ 18 वेंटिलेटर बेड ही बढ़ाए जा सके। हालत यह है कि पिछले हफ्ते बेंगलुरु के सभी सरकारी 117 और प्राइवेट 217 वेंटिलेटर बेड भर गए हैं।

महामारी की रफ्तार और सिस्टम की सुस्ती
राज्य सरकारों के इसी रवैये ने दूसरी लहर में कोरोना वायरस को इतना स्पेस दिया और आज वो करोड़ों जिंदगियों के लिए चुनौती बन गया है। ध्यान रहे कि स्वास्थ्य राज्य का विषय है, लेकिन कई राज्य सरकारों ने महामारी के सामने घुटने टेक दिए हैं। देश में डोली कोरोना केस का आंकड़ा 3.50 लाख को पार कर चुका है और इसमें तेजी का सिलसिला जारी है। इसके मुकाबले, स्वास्थ्य सुविधाओं को दुरुस्त करने की रफ्तार बहुत धीमी है। हैरत की बात यह है कि कुछ राज्य सरकारों ने तो ‘चोरी और सीनाजोरी’ की नीति अपना ली है। कुछ राज्य सरकारें स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में मरते मरीजों से ध्यान हटाकर सबकुछ पर्याप्त होने का दावा कर रही हैं। वैसे आंकड़ों की बाजीगरी तो करीब-करीब हर प्रदेश में हो रही है।

 

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