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इनसाइड स्टोरी : ‘कोरोना की दवा’ पर कैसे बिगड़ा बाबा का मामला, यहां जानिए

पतंजलि समूह को देश की मौजूदा सरकार और सत्तारूढ़ दल का करीबी माना जाता है। इसके ब्रांड एंबेसेडर रामदेव ने छह साल पहले पूरे देश में घूम कर भाजपा और नरेंद्र मोदी के लिए प्रचार किया था। यह अलग बात है कि उस समय उन्होंने पेट्रोल, डीजल के दाम या डॉलर की कीमत या काले धन को लेकर जो वादे किए थे, उन सबका उलटा हो रहा है और लोग उस समय के वीडियो निकाल कर शेयर कर रहे हैं। इसके बावजूद यह माना जा रहा था कि सरकार और सत्तारूढ़ दल में उनका रूतबा कम नहीं हुआ है। पर कोरोना वायरस की दवा बनाने की घोषणा करके लगता है रामदेव और बालकृष्ण दोनों फंस गए हैं। जानकार सूत्रों का कहना है कि इस मुश्किल से उनको निकालने का प्रयास हो रहा है पर दवा की घोषणा के बाद जो कुछ हुआ उससे कई सवाल उठे हैं।

पहला सवाल तो यह है कि क्या प्रधानमंत्री मोदी से उनकी दूरी बढ़ गई है। एक खबर के मुताबिक पिछले दिनों प्रधानमंत्री मोदी ने मार्च में आयुर्वेद के जानकारों और कंपनियों के लोगों के साथ डिजिटल माध्यम से एक बैठक की थी, जिसमें उन्होंने कोरोना वायरस की सर्वमान्य दवा बनाने के बारे में बात की थी। कहा जा रहा है कि इस बैठक में रामदेव को नहीं बुलाया गया था। जिन कंपनियों ने इस बैठक में हिस्सा लिया था उनमें वैद्यनाथ समूह के अनुराग शर्मा भी थे, जो भाजपा के सांसद हैं। उनका कहना है सरकार की ओर से तय किए गए मानकों को पूरा करके ही उनकी कंपनी दवा बनाएगी।

सो, पहले तो आयुर्वेद की दवा बनाने या कुछ उपाय खोजने को लेकर पीएम ने जो बैठक की उसमें रामदेव नहीं बुलाए गए और ऊपर से उन्होंने जब दवा बनाने का दावा किया तो आयुष मंत्रालय ने आनन-फानन में उस पर रोक लगाई। इसके बाद राजस्थान, महाराष्ट्र सहित कई राज्यों ने दवा पर रोक लगा दी। राजस्थान की जिस संस्था निम्स के साथ रिसर्च करने का दावा रामदेव ने किया था उसने भी पल्ला झाड़ लिया है। ऊपर से दवा की घोषणा के एक दिन बाद प्रधानमंत्री ने कह दिया कि अभी कोरोना की कोई दवा नहीं आई है। उन्होंने कहा कि इसकी सिर्फ एक दवा है दो गज की दूरी। यह भी रामदेव के लिए एक झटका है।

असल में पतंजलि समूह ने जो काम किया है उससे आयुर्वेद की प्रतिष्ठा बढ़ने की बजाय उसका मजाक ज्यादा बन गया है।

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