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एक हफ्ते से घर नहीं गया ये बेटा, ताकि पिता की मौत की खबर न जान सके मां

सीकर. दुख में दर्द की ये दास्तां शब्दों में बयां नहीं की जा सकती। कल्पना भी करें तो कलेजा घुटने लगता है। लेकिन, उसी दर्द को कोलीड़ा में कुई में धंसे मनरूप का बड़ा बेटा विक्रम सात दिन से सीने में दबाए है। जो हल्का सा कुरेदते ही आंसू के रूप में छलछला उठता है। 55 वर्ष की उम्र में पिता को जोखिमभरी कुई खोदने से निजात दिलाने के लिए विक्रम ढाई महीने पहले ही कर्ज लेकर दुबई कमाने गया था। आंखों में उतरी नमी व रुंधे गले से लडखड़़ाते शब्दों से उसने बताया कि 10 दिन पहले ही उसने फोन पर पिता से बात कर कुई खोदने का काम बंद कर घर पर आराम करने को कहा था।

ऑटो लेने या फल- सब्जी की दुकान करने के लिए बाप- बेटे में सहमति बनने पर मनरूप ने एक महीने में कुई खुदाई बंद करना भी तय कर लिया था। लेकिन, इसी बीच जोखिम की वही कुई पिता के लिए जानलेवा बन गई। जो सात दिन से शव तक नहीं लौटा रही। विक्रम का दर्द यहीं खत्म नहीं होता। पिता की मौत की खबर पाते ही वह अगले दिन कुवैत से गांव तो लौट आया लेकिन मां व बहन को हादसे की जानकारी नहीं होने पर वह अब तक घर नहीं गया। पूछने पर भावुक मन से कहा कि ‘घर जाने पर मां को देखते ही मुझे रोना आ जाएगा और सारा भेद खुल जाएगा। कहता है कि इसलिए तो छह दिन से घटना स्थल पर ही हूं। मां से फोन पर भी बात करने की हिम्मत नहीं है। फोन आने पर इधर- उधर के बहाने बना रहा हूं। ‘

सात दिन से घर में नहीं जला चूल्हा, मां व बहन को कहा अस्पताल में है पिता
मृतक मनरूप के परिवार में मां व बहन को हादसे की अब जानकारी नहीं है। उन्हें बाइक दुर्घटना में पिता के घायल होने पर अस्पताल में भर्ती होने की बात कही गई है। मगर चूंकि मृतक के अंतिम संस्कार तक घर में चूल्हा नहीं जलने की परंपरा है। ऐसे में उनके घर भी सात दिन से चूल्हा नहीं जला। पास- पड़ौस व रिश्तेदार ही घर में मां व बहन को खाना पहुंचा रहे हैं।

पापा आठ घंटे में खोद देते थे 45 फीट कुई, प्रशासन सात दिन में नहीं खोद पाया
मनरूप के बेटे विक्रम व दिलिप में सर्च ऑपरेशन को लेकर भी नाराजगी है। दोनों कहते हैं कि पिता मनरूप 45 फीट का गड्ढा आठ घंटे में खोद देते थे। लेकिन, प्रशासन सात दिन में उतनी गहराई से पिता का शव नहीं निकाल पाया। उन्होंने आरोप भी लगाया कि प्रशासन के पास पिता का शव निकालने की कोई ठोस योजना ही नहीं है। दोनों ने कहा कि कैसे भी करके प्रशासन पिता को ढूंढ निकाले तो आगे के क्रियाक्रम भी करें। कहा कि दुख को दबाए आखिरकार कब तक पिता को मिट्टी में दफन ही देखते रहें।

मनरूप ही चला रहा था परिवार, ग्रामीणों ने उठाई मुआवजे की मांग
मृतक मनरूप के परिवार के माली हालात भी खराब है। मनरूप की कुई खोदने की मेहनत पर ही परिवार का पालन टिका हुआ था। दो बेटियों की शादी के बाद ढाई महीने पहले ही कर्ज लेकर विदेश कमाने गया बड़ा बेटा अब वापस लौट आया है, तो छोटा बेटा दिलिप बीए तृतीय वर्ष में पढ़ रहा है। ऐसे हालातों के बीच दुख की दरिया पार करने के लिए ग्रामीणों ने शासन- प्रशासन से परिवार के मुआवजे की मांग भी की है।

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