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Explainer: ‘जातिगत जनगणना’ की क्यों हो रही मांग, किसे होगा फायदा और कौन उठाएगा नुकसान?

पटना: बिहार में जातीय जनगणना (Caste Census) को लेकर छिड़ी बहस थमने का नाम नहीं ले रही है. मॉनसून सत्र में विपक्षी दलों के साथ जदयू (JDU) ने भी अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Prime Minister Narendra Modi) से मिलकर जातिगत जनगणना कराने की मांग की प्लानिंग की है. सवाल ये कि आखिर क्यों 90 साल बाद एक बार फिर इस मुद्दे पर क्षेत्रीय पार्टियां केंद्र पर दबाव बना रही है.

एक तरफ संसद में केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय (Nityanand Rai) ने जातीय जनगणना पर पूछे गए सवाल को लेकर दो टूक कह दिया कि जाति आधारित जनगणना नहीं होगी. वहीं दूसरी तरफ बिहार (Bihar politics) समेत कई राज्यों में जातीय जनगणना कराने की मांग तेजी से हो रही है.

आपको बता दें कि देश में 90 साल पहले 1931 में आखिरी बार जाति आधारित जनगणना हुई थी. उसके बाद से वर्ष 2011 तक हर 10 साल पर हुई जनगणना में केवल एससी और एसटी के आंकड़े अलग से इकट्ठा किए गए हैं. लेकिन बिहार में राष्ट्रीय जनता दल (Rashtriya Janata Dal) और जदयू समेत अन्य क्षेत्रीय दल ईबीसी और ओबीसी की जनगणना की भी मांग कर रहे हैं.

सामाजिक भूगोल विशेषज्ञ राकेश तिवारी बताते हैं कि राजनीतिक दल अपने वोट बैंक को लेकर जातिगत जनगणना कराने में दिलचस्पी दिखा रहे हैं. लेकिन अगर जातिगत जनगणना होती है और इसके आधार पर समाज के विभिन्न पिछड़े वर्गों को फायदा मिलता है तो इससे अच्छी बात और कुछ नहीं हो सकती.

‘जातिगत जनगणना से पिछड़ी और अत्यंत पिछड़ी जातियों की सही संख्या का पता चलेगा और इसके बाद उनके उत्थान के लिए विभिन्न कार्यक्रम तय किए जा सकेंगे. अगर जाति आधारित जनगणना होगी तो सही संख्या पता चलेगी और तब उन्हें सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थाओं में उचित भागीदारी मिल सकेगी.‘- राकेश तिवारी, सामाजिक भूगोल विशेषज्ञ

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (CM Nitish Kumar) के अलावा राष्ट्रीय जनता दल, यूपी, महाराष्ट्र और ओडिशा के कई राजनीतिक दल भी जातिगत जनगणना कराने की मांग केंद्र सरकार से कर रहे हैं. बिहार से तो दो बार सर्वसम्मति से प्रस्ताव भी केंद्र सरकार को पहले भेजा जा चुका है. दरअसल राजनीतिक दलों की असल मंशा अदर बैकवर्ड क्लास यानी अन्य पिछड़ी जातियों की संख्या पता करना है. ताकि उन्हें अपना चुनावी समीकरण साधने और चुनाव में रणनीति बनाने में मदद मिले सके.

जाति आधारित जनगणना को लेकर समाजशास्त्र विशेषज्ञ बीएन प्रसाद कहते हैं कि ना तो ग्रामीण स्तर पर और ना ही शहरों में जाति को लेकर कोई भेदभाव दिखता है. जातियों का वर्चस्व या इनकी चर्चा तभी खास होती है जब राजनीतिक तौर पर इनका इस्तेमाल होता है.

जातिगत जनगणना जरूरी तो है लेकिन जब इसके आंकड़े उपलब्ध होंगे तो उनका इस्तेमाल किस तरह होता है इस पर यह निर्भर करेगा कि जातिगत जनगणना सही है या गलत. जातिगत जनगणना के आंकड़ों का उपयोग समाज के पिछड़े और अत्यंत पिछड़े वर्ग के आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक उत्थान में होना चाहिए.- बीएन प्रसाद, समाजशास्त्र विशेषज्ञ

अर्थशास्त्र के हिसाब से जातिगत जनगणना क्यों है जरूरी: इसे लेकर अर्थशास्त्र विशेषज्ञ विद्यार्थी विकास कहते हैं कि जातिगत जनगणना हमारे यहां हजारों साल से चली आ रही है इसमें कुछ भी नया नहीं है. अगर जातिगत जनगणना होती है तो इससे विभिन्न जातियों की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक स्थिति का पता चलता है. लेकिन जातिगत जनगणना के साथ-साथ यह भी पता किया जाना चाहिए कि किस वर्ग के कितने व्यक्तियों को सरकारी नौकरी का लाभ मिला है. इस आंकड़े के आधार पर हम आरक्षण का सही तरीके से और अधिक लाभ जरूरतमंद को दे पाएंगे.

दरअसल राजनीतिक दलों की दिलचस्पी सिर्फ अपना वोट बैंक साधने की है. जातिगत जनगणना कोई बुरी चीज नहीं है लेकिन अगर जाति के आधार पर जनगणना होगी तो सभी जातियों की जनगणना होनी चाहिए ताकि अगर किसी केंद्रीय या राज्य स्तरीय योजना का लाभ देना है तो सभी जातियों को मिल सके ना कि सिर्फ चुनिंदा जातियों को, जैसी मांग राजद और जदयू समेत कुछ क्षेत्रीय पार्टियां कर रही हैं.– रवि उपाध्याय वरिष्ठ पत्रकार

बता दें कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी कई बार जातीय जनगणना की मांग कर चुके हैं. हाल में भी उन्होंने कहा था कि हम लोगों का मानना है कि जनगणना जाति आधारित होना चाहिए. उन्होंने कहा कि बिहार विधान मंडल ने 18 फरवरी 2019 को और बिहार विधानसभा ने 27 फरवरी 2020 को सर्वसम्मति से यह जातीय जनगणना का प्रस्ताव पास किया था. नीतीश कुमार ने कहा कि यह प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजा गया था, केंद्र सरकार को इस संबंध में पुनर्विचार करना चाहिए.

वहीं आरजेडी का भी मानना है कि अगर जातिगत जनगणना नहीं कराई जाती है तो पिछड़े, अति पिछड़े हिंदुओं के आर्थिक और सामाजिक प्रगति का सही आंकलन नहीं हो सकेगा. जातीय जनगणना कराने के लिए बिहार विधानसभा की एक उच्चस्तरीय सर्वदलीय कमेटी प्रधानमंत्री से मिलकर अनुरोध करें. यदि भारत सरकार अड़ियल रवैया अपनाते हुए जातिगत जनगणना नहीं कराती है तो बिहार सरकार अपने संसाधनों से राज्य में जातीय जनगणना कराए, जिससे राज्य में रहने वाले सभी वर्ग के आर्थिक एवं सामाजिक स्थिति का सही पता चल सके.

देश के राजनीतिक दलों ने जातिगत जनगणना को राजनीति का हथियार बना लिया है. नेता लगातार इसलिए जातिगत जनगणना की मांग कर रहे हैं, ताकि वो जाति की राजनीति साध सकें. लेकिन, बीजेपी तो जातिगत राजनीति से परे है. पार्टी शुरू से ही धर्म की राजनीति करती रही है. जातिगत जनगणना को लेकर बीजेपी और जदयू आमने-सामने हैं.

जातिगत आधारित जनगणना से देश को नुकसान भी उठाना पड़ सकता है. दरअसल देश में जनसंख्या नियंत्रण कानून बनाने पर चर्चा की जा रही है. ऐसे में जातिगत आधार पर जब किसी को यह पता चलेगा कि उनके समाज की संख्या घट रही है, तो वह जाति, परिवार नियोजन को अपनाना छोड़ सकती है, जिससे देश की जनसंख्या में और भी अधिक तेजी से इजाफा हो सकता है.

अगर राजनीतिक दल जातिगत जनगणना का राजनीतिकरण नहीं करें तो इसके आधार पर लोगों की वास्तविक स्थिति का आकलन हो सकता है, लेकिन इसकी संभावना काफी कम है.

 

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