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रामदेव की पतंजलि: विवादों के साथ बढ़ा मुनाफा, 2010 के 100 करोड़ से बढ़कर अब सालाना कमाई 26 हजार करोड़

एक बड़े से हॉल में सैकड़ों लोग जमीन पर बैठे हैं। सामने मंच लगा हुआ है। मंच में सोफे पर 5 लोग बैठे हैं। एक व्यक्ति को छोड़कर सभी के मुंह पर मास्क है। बिना मास्क वाले व्यक्ति के सामने एक माइक लगा है।

वो बोलना शुरू करते हैं, ‘गजब का तमाशा है। एलोपैथी एक ऐसी स्टुपिड और दिवालिया साइंस है कि पहले क्लोरोक्वीन फेल हुई, फिर स्टेरॉयड फेल हो गए, प्लाज्मा थैरेपी पर बैन लग गया, इवरमैक्टिन पर रोक लग गई। बुखार की कोई दवाई कोरोना पर काम नहीं कर रही। बहुत बड़ी बात कह रहा हूं। हो सकता है इस पर कुछ लोग विवाद करें। लाखों लोगों की मौत एलोपैथी की दवा खाने से हुई है।’

इसके बाद हॉल में तालियां बजने लगती हैं। वो फिर कहते हैं, ‘ये कोई ताली बजाने की बात नहीं है। पीड़ा की बात है। लाखों की मौत का कारण एलोपैथी है।’ ये बयान देने वाले शख्स का नाम है- बाबा रामदेव।

रामदेव अक्सर विवादों में रहते हैं, लेकिन ये उनकी चर्चा का इकलौता कारण नहीं होता। जिस रफ्तार से उनके साथ विवाद जुड़ते हैं उसी रफ्तार से उनका बिजनेस भी बढ़ता जाता है। ब्लूमबर्ग क्विंट की रिपोर्ट के मुताबिक रामदेव के पतंजलि ग्रुप ने इस वित्त वर्ष में 26,400 करोड़ रुपए रेवेन्यू जुटाया है। कंपनी का दावा है कि उनकी बिक्री में कोरोना महामारी के दौरान भी 400% की बढ़ोतरी हुई है।

हम यहां बता रहे हैं बाबा रामदेव और पतंजलि आयुर्वेद की पूरी कहानी। हरियाणा के एक छोटे से गांव में जन्मे रामदेव ने इतना बड़ा साम्राज्य कैसे बनाया? जब उन्होंने भौतिक संसार को त्याग दिया तो टूथपेस्ट, इंस्टेंट नूडल्स और टॉयलेट क्लीनर क्यों बेच रहे हैं? लगातार विवादों की वजह से पतंजलि आयुर्वेद को कैसे फायदा पहुंचा? मोदी सरकार आने के बाद पतंजलि आयुर्वेद का रेवेन्यू 25 हजार करोड़ कैसे बढ़ गया? आइए, शुरू से शुरू करते हैं…

लकवे की वजह से हुआ योग से परिचय
1968 की बात है। हरियाणा के सैदालीपुर में राम निवास यादव और गुलाबो देवी को एक संतान हुई। नाम रखा रामकिशन यादव। बचपन में ही रामकिशन को लकवा मार गया। इससे उसके चेहरे का बायां हिस्सा निष्क्रिय हो गया। 1977 में उनके घर एक साधु आए। रामकिशन ने साधु से योग की एक किताब ले ली। इस किताब के मुताबिक अभ्यास करने से उन्हें काफी आराम मिला।

1985 में रामकिशन ने खानपुर में एक संस्कृत गुरुकुल ज्वॉइन कर लिया। 1989 में एक शिक्षक की सलाह पर उन्होंने अपना नाम बदलकर रामदेव कर लिया। संस्कृत, वेद दर्शन, योग और आयुर्वेद में आचार्य होने के बाद 1990 में वो जिंद में एक गुरुकुल के प्रिंसिपल बन गए। 1991 में सबकुछ छोड़कर गंगोत्री चले गए।

हरिद्वार में दो शिष्यों के साथ शुरू हुआ योग का सिलसिला

रामदेव ने हरिद्वार में गंगा किनारे दो शिष्यों को योग सिखाना शुरू किया। उनमें से एक शिष्य ने उनकी मुलाकात गुजराती व्यापारी जिवराज भाई पटेल से करवाई। इन्हीं के जरिए वो सूरत गए और करीब 200 लोगों के लिए पहला योग कैंप लगाया। इस तरह के कैंप का सिलसिला चल पड़ा।

1995 में जिवराज पटेल ने 3.5 लाख रुपए दान दिए। 1.5 लाख रुपए अन्य चाहने वालों से लेकर रामदेव ने दिव्य फार्मेसी और दिव्य योग ट्रस्ट की शुरुआत की। ये कनखल हरिद्वार में आयुर्वेदिक हॉस्पिटल और रिसर्च सेंटर था।

2001 में टीवी पर आना बना टर्निंग प्वॉइंट
2001 में रामदेव 20 मिनट का एक योग कार्यक्रम लेकर संस्कार चैनल पर आने लगे। ये उनके जीवन का टर्निंग प्वॉइंट माना जाता है। इस शो के जरिए उन्हें पूरे देश में पहचाना जाने लगा। तीन साल बाद वो आस्था चैनल में भी लाइव योग सेशन लेकर आने लगे। आज इन दोनों चैनलों का बड़ा मालिकाना हक पतंजलि आयुर्वेद और उनके सहयोगियों के पास है। धीरे-धीरे रामदेव का राजनीतिक दखल भी बढ़ने लगा।

2007 में रामदेव ने पतंजलि योगपीठ की शुरुआत की। इस इवेंट में 15 मुख्यमंत्री आए थे। FMCG सेक्टर में पतंजलि आयुर्वेद लिमिटेड 2009 में शुरू हुई। इसने हिंदुस्तान यूनिलिवर, नेस्ले और डाबर जैसी स्थापित कंपनियों में खलबली मचा दी। रामदेव ने 50 प्रोडक्ट के साथ शुरुआत की थी जो अब करीब 500 प्रोडक्ट तक पहुंच चुका है।

2012 तक कंपनी का टर्नओवर 450 करोड़ था जो मार्च 2016 तक बढ़कर 5 हजार करोड़ हो गया। सिर्फ 4 साल में 11 गुना बढ़ोत्तरी। 2021 की बात करें तो ये फिलहाल 26 हजार करोड़ हो गया है।

रामदेव की राजनीतिक चाहत मोदी पर जाकर रुकी

रामदेव किसी खास राजनीतिक पार्टी से भले नहीं जुड़े, लेकिन उनकी महत्वाकांक्षाएं बड़ी थीं। इसकी झलक 2010 में देखने को मिली। उन्होंने राजीव दीक्षित के साथ भारत स्वाभिमान आंदोलन शुरू किया। उन्होंने कहा कि ये आंदोलन एक राजनीतिक पार्टी बनेगा और वो सभी 543 लोकसभा सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारकर चुनाव लड़ेंगे। हालांकि नवंबर 2010 में राजीव दीक्षित की छत्तीसगढ़ के भिलाई में अचानक मौत हो गई और उनका ये राजनीतिक सपना अधूरा रह गया।

2011 में रामदेव ने अन्ना हजारे का इंडिया अगेंस्ट करप्शन आंदोलन ज्वॉइन किया। इसके बाद 4 जून 2011 से रामलीला मैदान में उन्होंने अपना ‘भ्रष्टाचार मिटाओ सत्याग्रह’ शुरू किया। आंदोलनकारियों के खिलाफ आधी रात को दिल्ली पुलिस ने ऑपरेशन शुरू किया। सलवार कमीज पहनकर भाग रहे रामदेव गिरफ्तार कर लिए गए।

रामदेव की राजनीतिक महत्वाकांक्षा नरेंद्र मोदी पर जाकर रुकी। 2012 के गुजरात विधानसभा चुनाव में उन्होंने मोदी के लिए प्रचार किया। 2014 लोकसभा चुनाव में जेएनयू के प्रोफेसर अरुण कुमार और दो अन्य रिसर्च पेपर के आधार पर रामदेव ने कालेधन का मुद्दा उठाया। प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेंद्र मोदी के लिए ये परफेक्ट स्लोगन साबित हुआ। रामदेव ने पीएम मोदी के साथ कम से कम 4 रैलियां साझा की।

मोदी सरकार आने के बाद पतंजलि को सस्ती दर पर मिली जमीनें
प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी ने फरवरी 2015 में योग से जुड़े चैरिटेबल ट्रस्ट की आय को सर्विस टैक्स के दायरे से बाहर कर दिया। इसका क्रेडिट रामदेव को दिया गया। 2017 की राएटर्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक मोदी के सत्ता में आने के बाद राज्य सरकारों के साथ लैंड डील में पतंजलि को 336 करोड़ रुपए की रियायत दी गई है। पतंजलि ने करीब 2 हजार एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया।

मोदी सरकार आने के बाद रामदेव और उनके सहयोगियों को कई कानूनी राहत भी मिली। यूपीए सरकार ने फॉरेन एक्सचेंज मैनेजमेंट एक्ट के उल्लंघन का एक केस दर्ज किया था। बीजेपी सरकार में ये केस बंद कर दिया गया। बालकृष्ण के खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग का एक केस 2014 में बंद कर दिया गया। सीबीआई ने रामदेव के गुरु शंकरदेव के रहस्यमय तरीके से गायब होने के मामले पर भी क्लोजर रिपोर्ट लगा दी। मई 2015 में उत्तराखंड पुलिस ने रामदेव के भाई राम भरत को मारपीट के एक केस में गिरफ्तार किया। बाद में वो बेल पर बाहर आ गए।

रुचि सोया के अधिग्रहण से 3 गुना हुआ पतंजलि ग्रुप का रेवेन्यू
दिसंबर 2017 में नेशनल लॉ ट्रिब्यून ने इन्सॉल्वेंसी प्रक्रिया के तहत रुचि सोया की नीलामी का आदेश दिया था। रुचि सोया पर बैंकों का 9,345 करोड़ रुपए बकाया था। दिसंबर 2019 में रुचि सोया को पतंजलि ने 4,350 करोड़ रुपए में खरीद लिया। इसके लिए कंपनी ने 3200 करोड़ का कर्ज लिया था।

पतंजलि को एसबीआई से 1,200 करोड़ रुपए, सिंडिकेट बैंक से 400 करोड़ रुपए, पंजाब नेशनल बैंक से 700 करोड़ रुपए, यूनियन बैंक ऑफ इंडिया 600 करोड़ रुपए और इलाहाबाद बैंक से 300 करोड़ रुपए मिले थे। रुचि सोया के अधिग्रहण के बाद उसके शेयरों के दाम 95 रुपए से बढ़कर 1272 रुपए तक पहुंच गए हैं।

रुचि सोया ने 2020 में कुल 13,175 करोड़ रुपए का रेवेन्यू रिपोर्ट किया था। वित्त वर्ष 2021 के शुरुआती 9 महीने में रुचि सोया का कुल रेवेन्यू 11,480 करोड़ रुपए था। रुचि सोया की 98.90% हिस्सेदारी पतंजलि ग्रुप के पास है।

इसमें 48.7% सीधा पतंजलि आयुर्वेद लिमिटेड के पास और बाकी दिव्य योग मंदिर ट्रस्ट और पतंजलि की एसोसिएट कंपनियों के पास है। रुचि सोया की मैन्युफैक्चरिंग लोकेशन देशभर के 22 हिस्सों में हैं। इसके प्रमुख ब्रांड हैं- न्यूट्रीला, महाकोश, रुचि गोल्ड, रुचि स्टार और सनरिच।

वापस उस घटना पर चलते हैं जिसका जिक्र इस लेख की शुरुआत में हुआ था। रामदेव के एलोपैथी वाले बयान पर देशभर में विवाद हुआ। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन ने एक प्रेस रिलीज में कहा, ‘अभी तक 1200 से ज्यादा डॉक्टर कोरोना की वजह से अपनी जान गंवा चुके हैं। ये आधुनिक एलोपैथी पर कीचड़ उछालने की कोशिश है। ये भी एक फैक्ट है कि योग गुरु और उनके सहयोगी बालकृष्ण बीमार होने पर खुद आधुनिक मेडिकल एलोपैथी ट्रीटमेंट ले चुके हैं। अब वह ऐसे दावे इसलिए कर रहे हैं ताकि अपनी दवाइयों को बेच सकें।’

आखिरकार रामदेव ने विवाद बढ़ता देख अपना बयान वापस ले लिया लेकिन इस मुद्दे को एलोपैथी बनाम आयुर्वेद का रंग देने की कोशिश की। रामदेव अच्छी तरह समझते हैं कि ये एक ऐसी डिबेट है जिसका फायदा हमेशा पतंजलि आयुर्वेद को ही मिलेगा।

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