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कोरोना कमांडो का दर्द : लॉकडाउन में हमको मिल रही जलालत, आखिर क्यों ?

नोएडा सेक्टर 20 थाने में सब इंस्पेक्टर के तौर पर तैनात फ्रंटलाइन वॉरियर उषा कुशवाहा लॉकडाउन के बारे में बेहद परेशानहाल अंदाज में कहती हैं कि, पुलिस की नौकरी को ढाई साल हो गए पर ऐसा कठिन दौर पहले कभी नहीं देखा. दुख तब होता है जब लोग समझते नहीं हैं और हमें ही गाली देते हैं या पत्थर फेंकते हैं.

जहां तक घर वालों की बात है, तो वो लोग घरआने के लिए कह रहे हैं. लेकिन मैं उनसे मिलने नहीं जा रही. मुझे डर लगता है कि मैं कई तरह के लोगों के संपर्क में आती हूं. कहीं मेरी वजह से मेरे परिवार में कोई इस महामारी के संपर्क में ना आ जाए. इसलिए मैं अकेली रह रही हूं. लेकिन दुख तब होता है जब लोग बिना वजह लॉकडाउन तोड़ते हैं या फिर हमारे साथ ही अभद्रता से पेश आते हैं.

अपने साथ बीती एक वाक्या की भी चर्चा करती हैं. मार्च में जब लॉकडाउन लगा ही था, उसी दौरान पास की झुग्गी-झोपड़ी के लिए राशन बांटने के लिए थाने में आया. जिस इलाके में ड्यूटी है उसके आसपास बड़ी संख्या में झुग्गी- झोप‍ड़‍ियां हैं, सो यहां राशन वितरण के समय महिलाओं की भीड़ भी काफी ज्यादा थी. जब राशन खत्म हो गया तो जिन महिलाओं को नहीं मिल पाया, उन्होंने हम पर पथराव शुरू कर दिया. गाली-गलौज करने लगीं. बड़ी मुश्किल से फोर्स बुलाकर उन पर काबू पाया गया.

उषा कहती हैं कि ये अकेली घटना नहीं है. मैंने अक्सर देखा है कि बिना वजह ही लॉकडाउन तोड़ने वालों को टोक दो तो वो पुलिस पर ही हावी होने की कोश‍िश करने लगते हैं. उन लोगों को ये जरूर सोचना चाहिए कि हम जो भी कर रहे हैं, जनता की सुरक्षा और अपनी ड्यूटी के तौर पर कर रहे हैं. हमारे साथ अभद्र तरीके से पेश आने से पहले एकबार आपको ये जरूर सोचना चाहिए कि हम भी आपकी ही तरह इंसान हैं, पर आपकी सुरक्षा के लिए सब कुछ दांव पर लगा कर इस माहौल में रह रहे हैं.

कड़ी धूप में मुंह पर मास्क बांधे सड़क पर ड्यूटी कर रही उषा कुशवाहा को भी हर दिन अपने 7 सदस्यों वाले परिवार की याद आती है. उनका घर गाजियाबाद में ही है. थाने से घर जाने में एक घंटे का भी समय नहीं लगता. उषा कुशवाहा ने बताया कि परिवार में मेरे माता-पिता के अलावा मेरे दो भाई, भाभी, बहन सब हैं. पहले ऐसा कभी नहीं हुआ कि मैं अपने घरवालों से हफ्ते दो हफ्ते में न मिलूं. लेकिन अब एक महीने से ज्यादा का अंतराल हो गया है, जब मैं न उनसे मिली हूं, न ही उन्हें देखा है. मैं यहीं थाने में कमरा लेकर रह रही हूं. यहां अपना खाना बनाने से लेकर वर्दी धोने तक का काम मैं खुद करती हूं. अभी कहीं से किसी प्रकार की मदद भी नहीं मिल रही, उस पर से रात-दिन की कड़ी ड्यूटी भी है.

बहरहाल, इस वक्त पूरा विश्व कोरोना महामारी से जूझ रहा व परेशानहाल है. जिसकी वजह से हम लोग अपने घरों में लॉकडाउन हैं, लेकिन वहीं ऐसे हजारों लोग हैं जो हमारे लिए सड़कों-अस्पतालों-गलियों में अपनी जान को जोख़िम में डाल कर हमारी मदद व रक्षा कर रहे हैं. ज्यादातर कोरोना कमांडोज़ इस महामारी के कारण घर व अपनों से दूर हो गए  हैं. ऐसे में हम सभी को मिलकर कोरोना कमांडोज की हर तरह से सहयोग करनी चाहिए न कि परेशान. वो भी आखिर हमारी तरह इंसान हैं.

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