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घोटाला: बिहार सरकार ने 29 करोड़ में 5 RTPCR जांच वैन किराए पर ली, इससे कम में खरीद हो जाती!

पटना :  ये कमाल है। बिहार सरकार का। लखनऊ की एक कंपनी है- पीओसिटी सर्विसेज। महाराष्ट्र में ब्लैकलिस्ट है। इसी कंपनी को बिहार सरकार ने कोरोना की आरटीपीसीआर जांच के लिए मोबाइल वैन चलाने का ठेका दिया है। आरटीपीसीआर जांच किट की सप्लाई के मामले में इस कंपनी को महाराष्ट्र सरकार ने सितंबर 2020 में तीन साल के लिए ब्लैकलिस्ट किया है। बिहार में इस कंपनी को पांच मोबाइल वैन चलाने के लिए पटना, मुजफ्फरपुर, भागलपुर, गया और बिहारशरीफ के अस्पतालों से संबद्ध किया गया है। हर वैन को रोजाना 1000 आरटीपीसीआर जांच करनी है।

तीन महीने की इस व्यवस्था के लिए कंपनी को 29.20 करोड़ रुपए का ठेका दिया गया है। हालांकि, एक्सपर्ट बताते हैं कि इस तरह के वैन में आरटीपीसीआर जांच का सेटअप तैयार करने में प्रति वैन दो करोड़ रुपए की लागत आएगी। इस प्रकार 10 करोड़ रुपए में पांच वैन तैयार हो जाएंगे। सरकार को दो से ढाई सौ रुपए में आरटीपीसीआर जांच की किट मिलती है। इस प्रकार पांचों वैन से तीन महीने में साढ़े चार लाख जांच करने में करीब नौ से 10 करोड़ रुपए खर्च होंगे। इसके अलावा एक करोड़ रुपए वैन में तीन महीने के लिए वैन के मैनपावर, फ्यूल, केमिकल आदि के खर्च को आसानी से मैनेज किया जा सकता है।

ऐसे में 20 करोड़ रुपए में पूरा सेटअप तैयार हो जाएगा और तीन महीने में साढ़े चार लाख जांच भी पूरी हो जाएगी। मोबाइल टेस्टिंग वैन का काम संतोषजनक नहीं रहने को लेकर भागलपुर के सिविल सर्जन उमेश शर्मा ने स्वास्थ्य विभाग को पत्र लिखा है। उन्होंने बताया कि पिछले 2 दिनों में 1800 जांच रिपोर्ट पेडिंग है। कंपनी के लोग जांच कर रहे हैं, लेकिन रिपोर्टिंग नहीं कर रहे हैं। जांच भी लक्ष्य के अनुसार नहीं कर रहे हैं।

इतना हुआ खर्च, पर 30 हजार से नहीं बढ़ी जांच..24 घंटे में रिपोर्ट भी नहीं

गड़बड़ गणित

एक वैन की कीमत

  • 2 करोड़ यानी
  • 5×2=10 करोड़

4.5 लाख जांच किट

  • 200 रुपए प्रति किट यानी
  • 4.5 x 200 =9 करोड़

मैन पावर/फ्यूल/केमिकल आदि

  • 1 करोड़ रुपए/तीन महीने के लिए
  • कुल खर्च = 10 + 9 + 1 = 20 करोड रुपए

5 मोबाइल वाहनों से जांच पर एक दिन में 32.45 लाख खर्च
इन वैन से जांच की गति नहीं बढ़ रही है। हजारों सैंपल की रिपोर्ट पेंडिंग है। जबकि करार के अनुसार 24 घंटे में रिपोर्ट अपलोड करनी है। 5 वैन के लिए 1 दिन का खर्च 32,45,000 लाख है। 28 मई से 27 अगस्त तक, 90 दिनों के लिए यह व्यवस्था की गई है।

शर्त के मुताबिक हर दिन 900 जांच जरूरी, हो रही औसतन 365

पांच वैन को रोज 1000-1000 जांच का लक्ष्य दिया गया है। बीएमएसआईसीएल से जो अनुबंध हुआ है उसके अनुसार रोज 1 हजार जांच का न्यूनतम 90 प्रतिशत यानि 900 जांच होनी ही चाहिए। सभी जिलों के आंकड़ों को देखें तो 14 जून तक 31 हजार ही जांच हुए हैं, यानी हर वैन औसतन सिर्फ 365 जांच कर रहा है। वैसे, अलग-अलग जिलों में अलग तिथियों से जांच शुरू हुई है।

महाराष्ट्र ने सितंबर 2020 में 3 साल के लिए ब्लैकलिस्टेड किया

पिछले साल सितंबर में महाराष्ट्र में टेस्टिंग के लिए किट की कमी थी। महाराष्ट्र सरकार के हाफकीन बायो फार्मा कॉर्पोरेशन ने सितंबर 2020 में ई-टेंडर जेम पोर्टल पर डाला था। लखनऊ की पीओसिटी सर्विसेस का टेंडर पास हुआ। 9.87 करोड़ में सौदा हुआ था। 15 सितंबर को कंपनी से पहले बैच के 6.3 लाख किट्स मिलनेवाले थे, लेकिन कंपनी ने सप्लाई नहीं किया। इसलिए टेंडर रिजेक्ट करके कंपनी को ब्लैकलिस्ट किया गया।

पीओसिटी सर्विसेज को प्रति जांच 649 रु दे रही सरकार

आंकड़ों को देखें तो आरटीपीसीआर जांच 30 हजार तक भी नहीं पहुंच रही है। जब वैन नहीं चल रहे थे तब भी यह आंकड़ा 25-30 हजार के बीच ही था। 5 वाहनों के लिए विभाग ने 29.20 करोड़ रुपए खर्च का बजट रखा है। कंपनी को सरकार की ओर से 649 रुपए प्रति जांच के हिसाब से भुगतान किया जा रहा है।
सीधी बात – प्रदीप झा, बीएमएसआईसीएल के एमडी

ब्लैकलिस्टेड कंपनी टेंडर नहीं ले सकती..शिकायत मिली तो कार्रवाई

बीएमएसआईसीएल के एमडी प्रदीप झा ने इस पूरे प्रकरण पर कहा कि मेरे पास कंपनी के ब्लैकलिस्ट होने की कोई शिकायत नहीं आई है, न ही इस तरह की जानकारी है। अगर देशभर में कोई कंपनी ब्लैकलिस्ट होती है तो वह टेंडर नहीं ले सकती। शिकायत मिलती है तो हम समीक्षा करेंगे, तभी कुछ कह सकते हैं।

कंपनी कंपीटिशन से आई है। जहां तक कम टेस्ट का सवाल है, यह राज्य स्वास्थ्य समिति देखती है। हमारे पास टेस्टिंग या जांच कम होने, रिपोर्ट नहीं मिलने की जानकारी नहीं है। हमारा काम सप्लाई का है। 20 करोड़ में लैब स्थापित करने की बात आपने किस एक्सपर्ट से की है, इसकी जानकारी मुझे नहीं है।

जितनी जांच उतना ही पैसा देंगे: मंगल

  • मोबाइल वैन की क्षमता 1 हजार प्रतिदिन की है। हो सकता है कि किसी दिन 1 हजार हो, किसी दिन 800 या 900, कितना सैंपल उसे मिला इसपर निर्भर करता है। हम कंपनी को टेस्ट के आधार पर पैसा दे रहे हैं। वो जितना टेस्ट करेंगे उतने पैसे दिए जाएंगे। ब्लैकलिस्ट वाली बात में कितनी सत्यता है, पता करूंगा । – मंगल पांडेय, स्वास्थ्य मंत्री

स्वास्थ्य विभाग के अपर मुख्य सचिव प्रत्यय अमृत ने फोन नहीं उठाया। ह्वाट्सएप पर जानकारी मांगी गई, लेकिन उन्होंने कोई जबाव नहीं दिया।

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