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खास रिपोर्ट: कोरोना फैलाने की अकेली दोषी नहीं है तब्लीगी जमात, ये मंदिर-मस्जिद चर्च-सत्संग भी किए यही काम

दुनिया भर में चर्च, मस्जिद, मंदिर आदि जैसे विभिन्न धर्मस्थलों में होने वाले आयोजनों की भीड़ ने कोरोना वायरस को तेजी से फैलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। ऐसा क्यों हुआ? इसको समझने से पहले विश्व की कुछ प्रमुख घटनाओं पर नजर डालें।

1) इन घटनाओं में दक्षिण कोरिया के शिंचेओंजी चर्च का नाम सबसे ऊपर है जहां से लगभग 5000 लोगों तक (63%) कोरोना फैलने का आकलन है। चर्च के प्रमुख ली मन ही ख़ुद को ‘जीसस का अवतार’ बताते हैं. उन्होंने चर्च की स्थापना 1984 में की थी. कोरियाई भाषा में शिन्चेऑन्जी का मतलब ‘नया स्वर्ग और धरती’ है. ली के अनुनायियों का मानना है कि वो अपने साथ करीब एक लाख 44 हज़ार लोगों को लेकर स्वर्ग जाएंगे. यह चर्च अपनी रहस्यमयी प्रथाओं और बंद जगह में प्रार्थना करने की अनिवार्यता के लिए जानी जाती है। यहां मास्क का उपयोग भी बंद रखा गया था।

2) फ्रांस के म्यूलहाउस स्थित एक चर्च में फरवरी महीने में एक धार्मिक कार्यक्रम का आयोजन हुआ, वहाँ कोरोना संक्रमित आदमी भी था, 18 से 22 फरवरी तक उस चर्च में सामूहिक प्रार्थना हुई, जिसमें दुनिया भर के हजारों लोग शामिल हुए और इसके बाद वे लोग दुनिया के अलग-अलग हिस्से में वापस चले गए और कोरोना वायरस ने अलग-अलग जगह कहर बरपाया। अब तक करीब 2500 ऐसे संक्रमित मरीज सामने आ चुके हैं जिन्होंने उस दिन इस चर्च के कार्यक्रम में हिस्सा लिया था। अब तक इस चर्च से जुड़े 17 संक्रमित लोगों की मौत हो चुकी है।

3) दिल्ली में निजामुद्दीन स्थित तबलीगी जमात के मुख्यालय मरकज़ में 13-15 मार्च के बीच लगभग 2500 लोगों ने एक कार्यक्रम में भाग लिया। इसमें मलेशिया और इंडोनेशिया से भी लोग आए। इन लोगों से कोरोना फैला जिसे कार्यक्रम के बाद सहभागी लोग देश के विभिन्न हिस्सों में वायरस ले गए। दिल्ली, तमिलनाडु और तेलंगाना में रोग का प्रसार मुख्यतः तबलीगी जमात में जुटे लोगों से हुआ। आज तक देश मे 1500 से ज्यादा पीड़ितों में मरकज़ में आये लोगों से वायरस फैलने का अनुमान है। जमात प्रमुख का कहना था कि, कोरोना मुसलमानों के साथ साजिश है, मरकज़ में कोरोना नहीं हो सकता और मरना ही है तो मरकज़ से अच्छी कोई जगह नहीं है।

4) मलेशिया में पेंतालिंग मस्जिद दुनिया के कई देशों में कोरोना फैलाने के लिए जिम्मेदार बनी, 27 फरवरी से लेकर 1 मार्च के बीच यहां एक बड़ा धार्मिक कार्यक्रम हुआ, जिसमें लगभग 16 हज़ार लोगों ने हिस्सा लिया था। इनमें 1500 विदेशी नागरिक थे और उन सबका दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों से संबंध था। इस मस्जिद से जाने वाले लोगों को संक्रमित पाया जा रहा है और अब इसे दक्षिण एशियाई और खाड़ी देशो में वायरस फैलाने का बड़ा दोषी माना जा रहा है।

5) लंदन में भी इस्कॉन मंदिर ने वायरस को प्रसाद की तरह बाँटा। 11 मार्च को इस्कॉन मंदिर मे भंडारा हुआ जिसमे हजारो लोग इकट्ठा हुऐ। फिलहाल इस भंडारे मे आने वालों मे से 10 लोगों की मौत हो चुकी है, 74 के करीब पॉजिटिव है। इस भंडारे के बाद ही लंदन में कोरोना का ग्राफ तेजी से बढ़ा है।

6) ईरान में भी धार्मिक नेताओं ने कोरोना से न डरने और सामूहिक नमाज जारी रखने की अपील की थी। लोग अपनी धार्मिक भावनाओं को जाहिर करने के लिए मस्जिदों के दरवाजों को चूमते और चाटते नज़र आ रहे थे। लोग कह रहे थे कि उन्हें अल्लाह पर भरोसा है और उसे मस्जिदों की दीवार चूमने से कोई नहीं रोक सकता, फिलहाल दीवार चाटने की वजह से ईरान में कोरोना का व्यापक प्रसार हुआ है।

7) मुंबई के उल्हासनगर में 49 साल की एक महिला दुबई से कोरोना पॉजिटिव होकर आयी और 8 मार्च को उसने एक आश्रम में सत्संग में हिस्सा लिया था, जहां करीब 1500 लोग थे, अब पुलिस इनकी डिटेल खंगाल रही है कि कौन कौन लोग सत्संग में आए और उन्हें क्वेरन्टीन किया गया है।

8) इजराइल की राजधानी तेल अबीब के उपनगर बनेई ब्रॉक में अति-ऑर्थोडॉक्स यहूदियों ने सैनिगोग में सामूहिक प्रार्थना जारी रखी और सरकारी निर्देशों का उल्लंघन किया। इन लोगों में कोरोना का फैलाव सामान्य से आठ गुनी तेजी से हुआ और यह उपनगर कोरोना का एक सबसे मुख्य हॉट स्पॉट बन गया।

जाहिर है जहां भी भीड़ एकत्र होगी, वह कोरोना जैसे अतिसंक्रामक रोग के फैलाव का कारण बन सकती है। लेकिन धर्म की भीड़ के साथ अतिरिक्त पोटेंशियल जुड़ जाता है। धार्मिक भीड़ अंद्धश्रद्धा और अंधविश्वास में डूबी होती है। उन्हें पूरा विश्वास होता है कि ईश्वर/अल्लाह/गॉड उन्हें कुछ नहीं होने देगा। ऑर्थोडॉक्स भीड़ के लोगों को अपने धार्मिक कर्मकांड करना, रोग से बचाव की तुलना में अधिक जरूरी लगता है। धार्मिक लोगों में ऐसे रोगों के प्रति जागरूकता भी नहीं होती। वैज्ञानिक चेतना का अभाव श्रद्धालुओं को लगभग अंधा कर देता है। यह शुद्ध रूप से एक बेवक़ूफ़ी होती है जो कि ज़्यादा ख़तरनाक साबित हुई है। हम पूरी दुनिया में तथाकथित धार्मिक लोगों की मूर्खता को देख रहे हैं, जो कोरोना की समस्या को और बढ़ा रहे हैं।

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