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चीन के लोग क्यों खाते हैं साँप, चूहे और चमगादड़, जानिए ‘ऐतिहासिक’ कारण

दुनिया भर में फैली कोरोना वायरस महामारी के बीच चीन में लोगों की खाने-पीने की आदतें चर्चा में हैं। माना जाता है कि कोरोना वायरस चमगादड़ों से इंसान तक पहुँचा। इसी तरह हाल ही में फैले हंता वायरस के चूहों से इंसान के शरीर में पहुँचने की बात कही जा रही है। मांसाहारी लोग यूँ तो पूरी दुनिया में रहते हैं लेकिन चीन में मांसाहार कुछ अलग ही तरह का होता है। यहाँ धरती का शायद ही कोई ऐसा जानवर हो जिसे नहीं खाया जाता। चीन के लोग चमगादड़, चूहे, कुत्ते और यहाँ तक कि कीड़ों-मकोड़ों को भी अलग-अलग तरीक़े से खाने में इस्तेमाल करते हैं। खाने-पीने की ऐसी आदतें चीन के ही पास के मंगोलिया, रूस, कोरिया और जापान में भी नहीं पाई जातीं। इन देशों में भी मांसाहार अधिक होता है लेकिन कोई चमगादड़ खाने की कल्पना नहीं कर सकता। सवाल उठता है कि इसके पीछे क्या कारण है? दरअसल इसके पीछे की कहानी बेहद दिलचस्प है।

गौरैया मारने से शुरू हुआ सिलसिला

1958 में चीन के सुप्रीम लीडर माओ जेडॉन्ग ने फरमान जारी किया कि देश में सारी गौरैया चिड़िया (sparrows) मार दी जाएं। इस अभियान को Smash Sparrow Campaign यानी गौरैया मारो अभियान नाम से भी जाना जाता है। माओ ने ये काम सफाई अभियान के तहत शुरू किया था, जिसमें कुल चार जीवों- चूहे, मक्खी, मच्छर और गौरैया को मारने का टारगेट (Four Pests Campaign) रखा गया था। सरकार मानती थी कि इन चारों के कारण ही गंदगी फैलती है। गौरैया को मारने की दूसरी बड़ी वजह ये बताई गई कि ये खेतों में बहुत सारा अनाज खा जाती हैं। जिसके कारण उपज का उत्पादन कम हो जाता है। माओ अपने भाषण में गौरैया को “हिटलर की उड़ने वाली सेना” और “पूंजीवाद का प्रतीक” बताया करता था। उसके मुताबिक चीन के आर्थिक विकास में गौरैया चिड़िया सबसे बड़ी रुकावट हैं। इसलिए उन्हें मार
दिया जाना चाहिए।

चीन में मार डालीं गईं लाखों गौरैया

सुप्रीम लीडर की अपील का असर हुआ कि चीन में गौरैया मारने की मानो होड़ लग गई। अभियान के तहत चूहे, मक्खी और मच्छर भी मारने थे, लेकिन उनको मारने के लिए दवा का छिड़काव काफ़ी होता था। लिहाज़ा गौरैया को मारना शान की बात हो गई। उन्हें डराकर भगाने के लिए लोग ड्रम बजाते थे। गाँव के गाँव इतना शोर मचाते थे कि गौरैया डरके मारे नीचे बैठे ही न और उड़ते-उड़ते थककर मर जाए। गाँव वाले गुलेल लेकर चला करते थे। जो थोड़े पैसे वाले होते वो एयरगन लेकर चलते। पुरुष ही नहीं, महिलाएँ और बच्चे भी गौरैया मारने में जुट गए। बच्चों की स्कूली किताबों में चैप्टर पढ़ाया जाने लगा कि कैसे गौरैया के कारण चीन में लाखों लोग खाना नहीं खा पा रहे हैं और उन्हें मारना देशहित में है। नतीजा यह हुआ कि चीन में गौरैया चिड़िया लगभग ख़त्म हो गईं। गौरैया ही नहीं, इस अभियान का शिकार कई और चिड़िया भी हुईं।

 

चीन में चमगादड़ और कीड़े-मकोड़ों के सूप काफ़ी लोकप्रिय हैं। इसकी तस्वीर कुछ दिन पहले वायरल हुई थी।

 

गौरैया ख़त्म होने का भयानक नतीजा

चीन की वामपंथी सरकार के नेताओं को इस बात की समझ ही नहीं थी कि जब गौरैया नहीं रहेंगी तो क्या असर पड़ सकता है। अगले तीन साल में चीन के बड़े इलाक़े में अकाल जैसे हालात पैदा हो गए। क्योंकि फसल ख़राब होने लगी। फसल चक्र में गौरैया चिड़िया की बड़ी भूमिका होती है वो पौधों के परागण (Pollination) से लेकर बीच फैलाने जैसे कई काम करती हैं। गौरैया खत्म होने से टिड्डियों जैसे कीड़ों की संख्या अचानक बहुत बढ़ गई, जो पूरी खेती चट कर जाते थे। पहले से ग़रीबी झेल रहे चीन में भुखमरी के हालात पैदा हो गए। खुद चीन के सरकारी आंकड़ों के मुताबिक इस अकाल में 1.5 करोड़ लोगों की जान गई, हालांकि माना जाता है कि वास्तव में 4.5 करोड़ से ज्यादा लोगों की मौत हुई थी।

माओ की अपील पर पूरे चीन से गौरैया चिड़िया का सफ़ाया हुआ

 

अकाल से बदला खानपान का तरीक़ा

अकाल में लोग मरने लगे तो चीन की वामपंथी सरकार ने गाँव-गांव में मुनादी करानी शुरू कर दी कि लोग मांसाहार करें। लेकिन हालत ये थी कि जानवर पहले ही मर चुके थे। कुल मिलाकर चूहे, चमगादड़, कीड़े-मकोड़े, कॉक्रोच ही बचे थे। नतीजा हुआ कि लोगों ने इन्हें ही खाना शुरू कर दिया। कहते हैं कि कई लोग भूख से मरने वालों का मांस भी खा जाया करते थे, ताकि ज़िंदा रह सकें। कहते हैं कि हज़ारों लोगों को ज़िंदा मारकर खाने की घटनाएँ भी हुईं। चीनी पत्रकार याग जिशेंग ने इस मानवीय त्रासदी पर ‘टूमस्टोन’ (Tombstone) नाम से किताब भी लिखी है। जिसमें उन्होंने 3.6 करोड़ के मरने का अनुमान लगाया है। उनकी किताब पर चीन में इस कदर पाबंदी है कि अगर किसी के पास इसका डिजिटल एडिशन भी मिल जाए तो उसे जेल में डाल दिया जाता है।

चीन के इतिहास के सबसे बड़े अकाल में 4.5 करोड़ लोगों के मारे जाने का अनुमान।

 

तबाही के बाद कॉमरेड की खुली आँखें

करोड़ों लोगों की मौत के बाद चीन के सुप्रीम लीडर माओ जेडॉन्ग ने गौरैया मारने के अपने हुक्म को वापस ले लिया। हालाँकि उसने गलती नहीं मानी। बल्कि ये कहा कि गौरैया को माफ़ी दी जा रही है और अब उनकी जगह खटमल (Bed Bugs) को मारा जाए। इसके कुछ साल बाद चीन में हालात बेहतर हुए। लेकिन खान-पान की आदतें बनी रहीं। तब से अब तक चीन में चूहे, चमगादड़, कुत्ते, कीड़े और यहां तक कि चीटियां खाने में इस्तेमाल होती हैं। यही कारण है कि जानवरों से इंसानों में वायरस के संक्रमण के ज्यादातर मामले चीन से ही शुरू होते हैं और आज चीन की पहचान दुनिया के सबसे बड़े वायरस सप्लायर देश के तौर पर बन चुकी है।

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