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जिंदा रहने का जीवट : 8 महीने का गर्भ और 250 किलोमीटर दूर घर, सात दिन चली पैदल

कोरोना महामारी के चलते लॉकडाउन के इस दौर में सबसे अधिक झकझोर देने वाली कहानी मध्य प्रदेश से आई है. ये दास्तान टीकमगढ़ जिले के पृथ्वीपुर ब्लॉक अंतर्गत अजनौर निवासी सुखवती आदिवासी की है. आठ माह की गर्भवती इस महिला ने पति, तीन संतान और अपने चार अन्य साथियों के साथ ग्वालियर से भी आगे से 250 किलोमीटर पैदल चली और 7 दिन बाद अपने घर पहुंची. इस दौरान उसे पेट में दर्द हुआ, पांव सूज गया, पर हौसला नहीं हारा. सुखवती कहती है कि इतना खतरा उठाकर अगर घर नहीं लौटते तो परिवार सहित भूखे मर जाते. गांव पहुंचने के बाद सुखवती व अन्य लोगों की स्क्रीनिंग कराकर क्वारेंटाइन करा दिया गया है.

दरअसल, अजनौर के ये आदिवासी परिवार होली का त्योहार खत्म होते ही ग्वालियर के आगे देहली सिसौद सरसो की कटाई के लिए गए थे. वहां, 14 दिन ही काम कर पाए थे कि कोरोना महामारी के चलते लॉकडाउन कर दिया गया. किसानों ने उनकी मदद की और मजदूरी के पैसे भी दे दिए, इसलिए सभी यह सोचकर वहां रुक गए कि 14 अप्रैल तक की ही तो बात है. लेकिन लॉकडाउन बढ़ाए जाने से उनकी हिम्मत टूट गई. पैसे भी नहीं बचे और किसान भी मदद से पीछे हटने लगे. उसके सहित तीन परिवार साथ थे. सभी को चिंता उसके कोख में पल रहे आठ माह के बच्चे को लेकर थी. जब किसी तरह के साधन की व्यवस्था नहीं हुई तो वह हिम्मत करके 15 अप्रैल को पैदल चल पड़ी.

सुखवती ने बताया कि देहली सिसौद से 20 किलोमीटर पैदल चलकर वह सब ग्वालियर पहुंचे. रास्ते में मिले पुलिसकर्मियों व अन्य लोगों से मदद मांगी. पर किसी ने भी उसकी हालत पर रहम नहीं किया. उसने बताया कि 250 किलोमीटर के इस पैदल सफर में तीन जगहों पर उसके साथियों ने मदद के लिए हाथ फैलाया पर तिरस्कार ही मिला. एक जगह तो यहां तक कहा गया कि जहां से आ रहे हो वहीं लौट जाओ. घर छोड़कर जाने से पहले प्रशासन से अनुमति ली थी क्या. उनके साथ उसके तीन बच्चे भी थे पर उनपर भी किसी को तरस नहीं आया.

सुखवती के पति तुलसी आदिवासी ने बताया कि सात दिन की पैदल यात्रा में केवल तीन दिन ही ऐसे थे जब रास्ते में खाना मिला. बाकी जो भी मिलता, हिकारत भरी नजरों से देखता और चलता कर देता. ऐसे में रास्ते में दुकानों से नमकीन, बिस्किट के पैकेट खरीदकर उसी के सहारे रास्ता काटा. कुछ जगहों पर खेत की खड़ी फसल से कच्चे दाने निकालकर भी खाए. लेकिन हौसला नहीं खोया और उसी के दम पर घर पहुंच पाए.

सुखवती इस सबसे भयावह पदयात्रा के अनुभव के बारे में कहती हैं कि अचानक पेट में दर्द उठ आता और पैर में सूजन आ जाती तो चलना मुश्किल हो जाता. रास्ते में किसी पेड़ के नीचे सुस्ताने बैठ जाते तो उसके गांव की साथ चल रही दो महिलाएं मदद करतीं. पर कई बार उसे यह लगता था कि रास्ते में ही दम टूट जाएगा वह घर तक नहीं पहुंच पाएगी.

आठ माह के गर्भस्थ शिशु के साथ सुरक्षित घर पहुंची सुखवती कहती हैं कि साहब गरीब का कौन होता है. वह तो भगवान भरोसे है.

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