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दुनिया को टेंशन : कोरोना के बाद अब ड्रैगन बना रहा छोटे बम !

एक ओर जहां दुनिया कोरोना वायरस की चपेट में है, चीन कथित तौर पर जमीन के नीचे परमाणु परीक्षण कर रहा है। अमेरिका के स्टेट डिपार्टमेंट ने चीन पर यह आरोप लगाया है कि चीन ऐसे ब्लास्ट्स को लेकर बनाए गए समझौते के पालन की बात करता है लेकिन फिर भी उसने कम तीव्रता के परमाणु बम के परीक्षण किए हैं। माना जा रहा है कि इससे अमेरिका और चीन के बीच में तो तनाव बढ़ेगा ही, भारत के लिए भी चिंता की लकीरें खिंचती दिख रही हैं।

चीन पर है शक
द वॉल स्ट्रीट जर्नल के मुताबिक अमेरिका पहले से ही कोरोना वायरस को लेकर चीन पर आरोप लगाता आ रहा है। ऐसे में आशंका जताई जा रही है कि अमेरिका और चीन के संबंधो पर असर पड़ सकता है। अमेरिका को चिंता है कि पेइचिंग टेस्ट ब्लास्ट्स के लिए बनाई गई ‘जीरो ईल्ड’ की संधि का उल्लंघन कर सकता है। इसके पीछे 2019 में लोप नुर न्यूक्लियर टेस्ट साइट पर चीन की गतिविधियां एक बड़ा कारण है।

‘जीरो ईल्ड का’ नहीं किया पालन
जीरो ईल्ड ऐसा न्यूक्लियर टेस्ट होता है जिसमें कोई एक्सप्लोसिव चेन रिएयक्शन नहीं होता है जैसा न्यूक्लियर हथियार के डिटोनेशन पर होता है। इस रिपोर्ट के मुताबिक, ‘चीन की साल भर से लोप नूर टेस्ट साइट पर तैयारी, एक्सप्लोसिव कंटेनमेंट चैंबर्स, लोप नुर में बड़े स्तर पर खुदाई और न्यूक्लियर टेस्टिंग को लेकर पारदर्शिता छिपाने के चलते चिंता पैदा होती है कि उसने शायद ‘जीरो ईल्ड’ स्टैंडर्ड का पालन नहीं किया है।’ बता दें कि जिन कम तीव्रता वाले परमाणु बमों के परीक्षण का शक अमेरिका ने जताया है, उन पर चीन और पाकिस्तान साथ में काम कर रहे हैं और इनसे किसी छोटे इलाके को निशाना बनाना आसान होता है।

चीन ने ब्लॉक किया डेटा ट्रांसमिशन
हालांकि, इस रिपोर्ट में इस बात का कोई सबूत नहीं दिया गया है कि चीन ने कोई परीक्षण किया है। जहां तक चीन की ओर से पारदर्शिता छिपाने की बात है, उसकी ओर से इंटरनैशनल एजेंसी के मॉनिटरिंग सेंटर से जुड़े सेंसर्स से आने वाले डेटा ट्रांसमिशन को ब्लॉक किया गया। यह एजेंसी ही इस बात को सुनिश्चित करती थी कि न्यूक्लिर टेस्ट एक्सप्लोजन पर प्रतिबंध लगाए जाने के समझौते का पालन किया जा रहा है या नहीं। वॉल स्ट्रीट जर्नल को एजेंसी की प्रवक्ता ने बताया कि 2018 से लेकर अगस्त 2019 के बीच चीन से डेटा ट्रांसमिशन में ब्लॉक आए लेकिन उसके बाद कोई ब्लॉक नहीं आया। इस बारे में वॉशिंगटन में चीन की एंबैसी की ओर से कोई प्रतिक्रिया भी नहीं मिली।

आर्म्स कंट्रोल अकॉर्ड में चीन को लाने की कोशिश
1996 में कॉम्प्रिहेन्सिव टेस्ट बैन ट्रीटी को इसलिए बनाया गया था ताकि न्यूक्लियर हथियारों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके। रूस, ब्रिटेन और फ्रांस ने इस पर साइन किए लेकिन चीन ने बिना इसपे साइन किए इसका पालन करने का दावा किया। इस समझौते के कानून बनने के लिए 44 और देशों का इसको साइन करना जरूरी है। वहीं, अमेरिका में एक सीनियर अधिकारी ने बताया कि इन अटकलों से डोनाल्ड ट्रंप के उस प्लान को मजबूती मिलती है जिसके तहत वह रूस के साथ होने वाले आर्म्स कंट्रोल अकॉर्ड में चीन को भी शामिल करना चाहते हैं।

चीन का दावा, खतरा नहीं
इस अधिकारी ने बताया, ‘जिस तरह से चीनी सरकार अपने जखीरे का आधुनिकीकरण कर रही है, यह चिंताजनक है और इससे पता चलता है कि क्यों चीन को इंटरनैशनल आर्म्स कंट्रोल फ्रेमवर्क के अंतर्गत लाना चाहिए।’ दूसरी ओर 300 न्यूक्लियर हथियारों के मालिक चीन ने हमेशा इस बात का खंडन किया है। उसका कहना है कि उसकी न्यूक्लियर फोर्स डिफेंस के लिए है और उससे कोई खतरा नहीं है।

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