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पीएम के संबोधन पर रवीश बोले- ‘बंद हो गए जब झूठ के सारे दरवाज़े, दोष राज्यों पर मढ़ चले’

सात जून के राष्ट्र के नाम संबोधन को सुनते हुए लिखना चाहिए. लिखने के बाद ध्यान से पढ़ना चाहिए. तब पता चलेगा कि इतने लोगों के नरसंहार के बाद कोई नेता किस तरह की कारीगरी करता है. कैसे वह ख़ुद को अपनी सभी जवाबदेहियों से मुक्त करता हुए, दूसरों पर दोष डाल कर जनता को एक भाषण पकड़ा जाता है. यह भाषण ठीक वैसा ही है.

एक लाइन की बात कहने के लिए दाएं-बाएं की बातों से भूमिका बांधी गई है. नीति, नीयत, नतीजे और न जाने ‘न’ से कितने शब्दों को मिलाकर वाक्य बना लेने से ‘ज’ से जवाबदेही ख़त्म नहीं हो जाती.

जब लाशों की गिनती का पता नहीं, हर दूसरे-तीसरे घर में मौत हुई हो, उसके बीच से ख़ुद को निर्दोष बताते हुए निकल जाना नेतागीरी की कारीगरी हो सकती है, ईमानदारी की नहीं. टीके को लेकर शुरू से झूठ बोला गया. बिना टीके के आर्डर के दुनिया का सबसे बड़ा टीका अभियान बताया गया.

जब झूठ के सारे दरवाज़े बंद हो गए, तब प्रधानमंत्री ने भाषण के पतले दरवाज़े से अपने लिए निकलने का रास्ता बना लिया. यह भाषण मिसाल है कि कैसे जनता को फँसा कर ख़ुद निकल जाया जाता है. वैसे भाषण में मानवता का भी ज़िक्र आया है.

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : ये लेख वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार के फेसबुक से साभार लिया गया है. इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति ये पब्लिकेशन उत्तरदायी नहीं है. 

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