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नीतीश कुमार को PM मोदी का सन्देश स्पष्ट- ‘अपने कदम पीछे लो और निकलते बनो’

भले ही जेडीयू-बीजेपी का एनडीए गठबंधन बिहार में सरकार चल रही हो, लेकिन पीएम मोदी और नीतीश कुमार के बीच 36 का आंकड़ा रहता है। जेडीयू सुप्रीमों नीतीश कुमार की कोशिश हर बार पीएम मोदी के लिए मुसीबत खड़ी करने की रहती है, लेकिन वो हर बार मुंह की खाते हैं।  पीएम मोदी के मंत्रिमंडल विस्तार में भी इसकी झलक दिखी है।  एक तरफ तो नीतीश की ज्यादा मंत्रीपद की मांगों को नकारते हुए जेडीयू को केवल एक मंत्रीपद मिला। वहीं, जिन आरसीपी सिंह को पीएम मोदी ने अपनी कैबिनेट में शामिल किया है उनके केन्द्र में जाने से नीतीश की ताकत कम होगी।

दरअसल, जेडीयू अध्यक्ष आरसीपी सिंह को पीएम मोदी ने अपनी कैबिनेट में शामिल कर लिया है। नीतीश जातिगत रणनीति के तहत 4-5 मंत्री पद मांग रहे थे, लेकिन उनके हिस्से में केवल एक ही पद आया है। ऐसे में रामचंद्र प्रताप सिंह को कैबिनेट पद देकर पीएम मोदी ने नीतीश के जातीय गणित को तोड़ दिया है, क्योंकि अब नीतीश पर आरोप लगने लगे हैं कि वो पिछड़ों की अपेक्षी सवर्ण समाज के लोगों को ही वरीयता देते हैं। इसके विपरीत अब कमजोर हो चुकी जेडीयू को पुनः खड़ी करने के लिए भी नीतीश को नई प्लानिंग पर काम करना पड़ेगा।

गौरतलब है कि 2020 के विधानसभा चुनावों के बाद बीजेपी ने सुशील मोदी को डिप्टी सीएम न बनाकर नीतीश को एक बड़ा झटका दिया था, और अब आरसीपी सिंह को केन्द्र में मंत्री पद देकर पीएम मोदी ने नीतीश को दूसरा बड़ा राजनीतिक झटका दिया है। एनडीए में जेडीयू की ताकत कम होने पर जेडीयू के ही कुछ नेताओं ने नीतीश के खिलाफ आवाज उठाई थी, ऐसे में नीतीश ने रणनीति के तहत ही जेडीयू अध्यक्ष का पद आरसीपी सिंह को दिया था, जिससे उन पर कोई ज्यादा सवाल न उठा सके।

इसके विपरीत अब जब आरसीपी सिंह को मंत्री बनाया गया है तो उन्हें जेडीयू अध्यक्ष पद छोड़ना पड़ सकता है। नीतीश को पता है कि आरसीपी सिंह का केन्द्र में जाना उनके लिए खतरे की घंटी है। शायद इसीलिए नीतीश ने अपनी ही पार्टी के नेता के मंत्री पद ग्रहण करने पर भी बधाई के लिए कोई ट्वीट तक नहीं किया है, क्योंकि नीतीश को पता है कि आरसीपी सिंह के जाने पर नीतीश को पुनः नए सिरे से पार्टी में कुछ बदलाव करने होंगे।

आरसीपी सिंह एक पूर्व नौकरशाह हैं और संगठनात्मक रूप से जेडीयू के लिए काफी अहम है। ऐसे में केन्द्रीय मंत्रिमंडल में पीएम मोदी के ध्वज तले काम करने के दौरान संभावनाएं हैं कि उनका रुख बीजेपी की तरफ नर्म हो जाए, और पीएम मोदी से उनकी करीबियां अधिक हो सकती हैं। बीजोपी पहले ही बिहार में गठबंधन की बड़ी पार्टी होने के बावजूद सीएम न बन पाने को लेकर आक्रोशित है। ऐसे में नीतीश के साथ बीजेपी आसानी से खेल कर सकती है। नीतीश आज की स्थिति में राजनीतिक रूप से कमजोर हैं, न तो उनके पास सुशील कुमार मोदी जैसा बीजेपी का भरोसेमंद साथी है… और न ही आरसीपी सिंह जैसा करीबी।

ऐसे में बीजेपी बिहार में नीतीश के कामकाजों पर लगातार सांकेतिक सवाल उठाते हुए उन पर दबाव बना सकती है। इसीलिए नीतीश कुमार जैसे मंझे हुए नेता के लिए पीएम मोदी की तरफ से एक साफ संकेत है कि अब उन्हें सीएम पद की कुर्सी छोड़नी चाहिए, जिससे बिहार में बीजेपी के लिए राहें आसान हो सकें। यदि वो अभी भी पीएम मोदी के संकेत को तवज्जो नहीं देते हैं तो फिर उनके लिए आने वाला समय मुसीबतों भरा हो सकता हैं, और शायद उन्हें खुद ही मजबूरन सीएम पद छोड़ना पड़ जाए।

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