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तेजस्वी और चिराग हैं राजनीति में दो ‘चांदी के चम्मच’, अपने नेताओं से मिलने का भी नहीं वक्त

बिहार की राजनीति के ये दो चेहरे हैं- तेजस्वी यादव व चिराग पासवान। एक पिछड़े समाज के तो दूसरे दलित समाज के। बिहार के सामाजिक व आर्थिक पृष्ठभूमि में देखें तो ये दोनों हाशिए पर जी रहे बड़े आधार के लोगों के लिए उनका पसंदीदा नेता हैं। सामाजिक परविर्तन के आंदोलन से निकले लालू प्रसाद यादव व रामविलास पासवान से इन्हें राजनीति विरासत में मिली है।

राजनीतिक विचारधारा व कायकर्ताओं की ताकत के बदौलत की जानेवाली राजनीति जब से कमजोर पड़ने लगी तबसे नेता व कार्यकर्ता के बीच का संवाद भी कम होते चला गया।ऐसे ही रिश्तों के सवाल इन रहनुमाओं को लेकर भी उठ रहे है।इनके संबंध में कहा जाता है कि इनसे मिलने के लिए उनके ही नेताओं को लंबा इंतजार करना पड़ता है। ऐसे में आम कार्यकर्ताओं व समाज के लोगों के साथ कितना मेल-मिलाप बढ़ पाएगा, यह एक बड़ा सवाल है।

बिहार विधानसभा में प्रतिपक्ष के नेता तेजस्वी यादव राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव के छोटे बेटे हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में महागठबंधन की अगुवाई करते हुए शानदार प्रदर्शन किया था। चंद सीटों की कमी के चलते राज्य के सत्ता की शिखर से दूर रह जानेवाले तेजस्वी राजनीतिक कौशल के बदौलत बेरोजगारी को चुनावी मुददा बनाने में सफल दिखे, जिसका नतीजा रहा कि चुनाव कैंपेन के बीच ही राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को भी बेरोजगारी के सवाल पर बोलना पड़ा। इन सबके पीछे तेजस्वी के राजनीतिक सलाहकार संजय यादव की प्रमुख भूमिका रही है।

ये कौन हैं संजय यादव?

तेजस्वी के 37 वर्षीय राजनीतिक सलाहकार संजय यादव हरियाणा के महेंद्रगढ़ जिले के नांगल सिरोही गांव के रहने वाले हैं। संजय ने दिल्ली से एमएससी और एमबीए की पढ़ाई की है। वे एक आईटी कंपनी में नौकरी करते थे। संजय यादव और तेजस्वी की मुलाकात साल 2010 में हुई थी, तब तेजस्वी आईपीएल में तेजस्वी हाथ आजमा रहे थे। उस समय संजय भोपाल यूनिवर्सिटी से कंप्यूटर साइंस में एमएससी और इंद्रप्रस्थ यूनिवर्सिटी, दिल्ली से एमबीए करने के बाद तीन मल्टीनेशनल आईटी कंपनियों में नौकरियाँ बदल चुके थे।

2012 में जब तेजस्वी यादव ने महसूस किया कि क्रिकेट में उनका करियर खत्म होने वाला है, तो उन्होंने राजनीति में दूसरी पारी की शुरुआत करने का फैसला लिया। उस समय संजय यादव ने तेजस्वी पर भरपूर विश्वास जताया। तब तेजस्वी ने संजय से हाथ मिलाया था, जो उनसे सिर्फ 5 साल बड़े थे और पिता समान भी थे। उस दौरान तेजस्वी ने संजय यादव का परिचय देते हुए कहा था कि ये मेरे बड़े भाई हैं, अब हम साथ साथ हैं। संजय बीते एक दशक से तेजस्वी यादव से जुड़े हुए हैं।

तेजस्वी से मुलाकात के बाद नौकरी छोड़कर राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) जॉइन की थी। 2015 के विधानसभा चुनाव में भी संजय यादव ने आरजेडी के लिए चुनावी रणनीति बनाई थी। संजय यादव को तेजस्वी का दाहिना हाथ भी माना जाता है। मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो 2020 के विधानसभा चुनाव में आरजेडी के लिए चुनावी रणनीति तैयार करने में संजय यादव ने अहम भूमिका निभाई थी। एनडीए के जंगलराज के नारे की काट के तौर पर संजय यादव ने बेरोजगारी की समस्या को पेश किया। बेरोजगारी, कोरोना जैसे चुनावी मुद्दों पर महागठबंधन का चुनावी कैंपेन तय करने में संजय यादव का अहम योगदान रहा।

इसके अलावा विधानसभा चुनाव को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बजाय मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर केंद्रित रखने के पीछे भी संजय यादव का ही दिमाग था। आरजेडी के बिहारी अस्मिता और युवाओं को 10 लाख नौकरी जैसे वादों ने चुनाव में खूब असर किया। माना जाता है कि संजय यादव तेजस्वी यादव के लिए सबसे भरोसेमंद हैं। गत विधानसभा चुनाव में तेजस्वी यादव की सभाओं को मैनेज कर रहे थे बल्कि अलग-अलग सभाओं में तेजस्वी को क्या बोलना चाहिए, इसकी रूपरेखा भी बना रहे थे।

तेजस्वी यादव हर दिन 17-18 सभाओं को संबोधित कर रहे थे और उसका कंटेंट मुहैया कराने के साथ-साथ तेजस्वी की बात पूरे बिहार तक पहुँचे, इसकी कोशिश भी लगातार हुई। विधानसभा चुनाव में संजय यादव ने प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र के हिसाब से छोटी-छोटी चीजों पर ध्यान केंद्रित करते हुए चुनावी रणनीति बनाई।

बिहार की राजनीति में दलित समाज की अगुवाई करनेवाले लोजपा प्रमुख रहे रामविलस पासवान के बेटे हैं चिराग पासवान। रामविलास पासवान को जमीन से जुडा नेता माना जाता था। सियासत के भी वे माहिर खिलाडी माने जाते थे। वह छह प्रधानमंत्रियों के साथ मंत्री पद संभाल चुके थे। उनकी लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से लगा सकते हैं कि वे अपने ही रिकॉर्ड को तोड़ते हुए 1989 के लोकसभा चुनाव में पांच लाख वोटो के अंतर से जीतकर संसद में पहुंचे थे। वे विशेषकर दलित समाज के सर्वमान्य नेता के रूप में स्थापति रहे।

उनसे राजनीति विरासत के रूप बेटे चिराग पासवान को मिली।फिल्म में कैरियर तलाश रहे चिराग पिता के कहने पर राजनीति में आ गए। उनके जीवन काल में चिराग जमुई से लोकसभा चुनाव जीतकर सदन में पहुंचे। पार्टी के असली नेता को लेकर चाचा पशुपतिनाथ पारस के साथ चल रहे राजनीतिक तकरार के बीच आज भी पासवान जाति के चिराग पसंदीदा चेहरा हैं। इनके राजनीतिक सलाहकार हैं सौरभ पांडे, जो दल के अंदर अपनी भूमिका को लेकर पशुपतिनाथ पारस समेत अन्य नेताओं के राजनीतिक हमले के शिकार होते रहे हैं।

कौन हैं सौरभ पांडेय?

सौरभ पांडेय उत्तर प्रदेश के वाराणसी के एक राजनीतिक परिवार से आते हैं। उनके पिता मणिशंकर पांडे उत्तर प्रदेश विधान परिषद के सदस्य रह चुके हैं। उनकी पहचान कांग्रेसी नेता के तौर पर है। लेकिन 2018 में उन्होंने लोक जनशक्ति पार्टी का दामन थाम लिया था। वे पार्टी की उत्तर प्रदेश ईकाई के अध्यक्ष भी हैं। कहा जाता है कि मणिशंकर पांडे के रामविलास पासवान के साथ पारिवारिक रिश्ते थे और इसी रिश्ते के कारण सौरभ पांडेय और चिराग की दोस्ती भी दशकों पुरानी है।

सौरभ पेशे से वकील हैं और शुरुआती दिनों में मुंबई हाईकोर्ट में प्रैक्टिस भी की है। लेकिन राजनीतिक परिवार से आने के कारण खुद को राजनीति से दूर रख पाना सौरभ के लिए आसान नहीं था। वे सक्रिय राजनीति में नहीं आए। हालांकि अपने मित्र चिराग के जरिए इसका हिस्सा जरूर बन गए। फिल्मी करियर को अलविदा कहने के बाद जब चिराग ने राजनीति में कदम रखा तब से सौरभ उनके साथ हो लिए। दोनों ने साथ में ही राजनीति का ककहरा सीखा।

चिराग लोजपा का चेहरा बन गए और पार्टी के भीतर सौरभ पांडे उनके सेनापति। बीतते वक्त के साथ उनका कद भी पार्टी में बढ़ता गया। वे ‘बिहार फर्स्ट, बिहारी फर्स्ट’ ड्राफ्ट कमिटी के सदस्य भी रह चुके हैं। बिहार विधानसभा चुनाव 2020 के दौरान, जब पार्टी ने बिहार में एनडीए से अलग होने का फैसला किया तो पशुपति पारस ने विरोध किया था। जबकि सौरभ पांडेय का पक्ष था कि पार्टी के पास अकेले जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था। क्योंकि एनडीए ने सिर्फ 15 सीटों पर उम्मदीवार उतारने का प्रस्ताव दिया था।

जिस पार्टी के 6 सांसद हों, वो सिर्फ 15 विधानसभा सीटों पर कैसे चुनाव लड़ सकती है। मामला आत्मसम्मान का था। यह पार्टी के किसी भी नेता को मंजूर नहीं था। ऐसे में एनडीए से अलग होने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। जब चिराग पासवान ने अध्यक्ष के तौर पर फैसला कर लिया, तब सौरभ ने ही उसे कार्यरूप देने में मदद की। सौरभ पांडेय व चिराग पासवान के इन रिश्तो के साथ एक दूसरा पहलू भी है।

बिहार के नेता नहीं राजनेता हैं ये लोग

एचएन सिन्हा इंस्टीटयूट और सोशल स्टडीज पटना के अर्थशास्त्र विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डा. विद्यार्थी विकास कहते हैं कि नेता व राजनेता के बीच के फर्क को समझना होगा। लालू प्रसाद यादव, रामविलास पासवान, कांशी राम नेता थे। इस समय बिहार का दुर्भाग्य है कि नेता का अभाव है। ये जातियों के नेता लोग हैं, जो जाति समाज की अगुवाई करते हुए बडे दलों से मोलभाव कर किसी तरह एमपी एमएलए बन जाते हैं। ये किसी तरह राज करने के लिए अपना पहल करते हैं।

पहले के उन नेताओं व इस समय के राजनेताओं में जमीन आसमान का फर्क है। पहले अंबेडकरवादी, समाजवादी धारा की राजनीति करने वाले जनप्रकाश नारायण, राममनोहर लोहिया, मधु लिमये सरीखे नेताओं से वैचारिक राजनीति की परंपरा आगे के पीढियों तक ट्रांसफर नहीं हो सकी। नेता व जनता के बीच संवाद की कमी के चलते सारी परेशानी उत्पन्न हुई है। कोरोना काल में भी वर्चुवल मीटिंग कर राज्य से लेकर जिला व ब्लाक कमेटियों से संवाद किया जा सकता है। विपक्ष के नेता पर तो जनता के नजर में बड़ी जिम्मेदारी होती है। इनके द्वारा राजनीतिक शोध का अभाव दिखता है। इन्हें बहुत प्रशिक्षण कर जरूरत है।

बिहार के 44 सरकारी विभागों से संबंधित योजनाओं की प्रगति का फैक्ट क्या है। इसे जाने बिना जनता के लिए उन सवालों पर संघर्ष कैसे किया जा सकता है। सतही विचारधाराओं को छोड़कर पुराने अनुभवी लोगों से इन्हें संवाद में जाना चाहिए। आज भी भूमि सुधार बिहार का बडा एजेंडा है। लेबर एक्ट, बेरोजगारी जैसे सवालों पर काम करने की जरूरत है।इन सबके लिए नेता कार्यकर्ता व जनता के बीच संवाद की संस्कृति को बढ़ाना होगा।

तेजस्वी व चिराग को विरासत में मिली है राजनीति

इंडियन पीपुल्स फ्रंट बिहार के प्रवक्ता व पूर्व विधायक रमेश सिंह कुशवाहा कहते हैं कि तेजस्वी यादव हों या चिराग पासवान, इन्हें राजनीति विरासत में मिली है। स्वाभाविक नेततव क्षमता का इनमें अभाव दिखता है। इनकी राजनीतिक समझ राजकुमार की है और उसी भूमिका लोगों के बीच अपने को प्रदर्शित भी करते हैं। बिहार में बाढ, कोरोना संक्रमण जैसे वक्त पर तेजस्वी यादव का कोई हस्तक्षेप नहीं दिखता है। यह सच है कि बिहार में एक बड़े सामाजिक पृष्ठभूमि की अगुवाई करते हैं।

लोजपा के तमाम उठापटक के बावजूद पासवान जाति के एकमात्र नेता चिराग पासवान हैं। लेकिन वास्तव में दलित राजनीति से कोई इन्हें वैचारिक रूप से लेना-देना नहीं है। जबकि रामविलास पासवान ने दलित, अल्पसंख्यक के सवाल पर हमेशा मजबूत हस्तक्षेप किया। गोधरा कांड को लेकर भाजपा का विरोध करते हुए इस्तिफा तक देने में पीछे नहीं रहे।मौजूदा इन नेताओं से ऐसे राजनीति की कोई उम्मीद नजर नहीं आ रही।जिसका नतीजा है कि नेता व कार्यकर्ता में संवाद का भी अभाव बढ़ता जा रहा है।

दलितों के हित से नहीं है कोई नाता

लोजपा नेता व दलित सेना के बिहार प्रधान महासचिव घनश्याम कुमार दाहा कहते हैं कि रामविलास पासवान व चिराग पासवान में जमीन आसमान का फर्क है। लोजपा के साथ ही रामविलास पासवान ने हमेशा अपने दलित सेना को प्राथमिकता दी। उनके जीते जी चिराग पासवान ने दलित सेना को कमजोर किया। सौरभ पांडे का बतौर राजनीतिक सचिव इतना हस्तक्षेप बढता गया कि दल के वरिष्ठ नेता तक चिराग से दूर होते चले गए।

अब तो सही मायने में पार्टी व कार्यकर्ता पशुपतिनाथ पारस के नेतत्व में बेहतर महसूस कर रहे हैं।विधान सभा चुनाव के दौरान सौरभा पांडे के सलाह पर चिराग ने संगठन में यह संदेश दिया कि जो 25 हजार पार्टी सदस्य बनाएंगा,उसे ही विधानसभा का टिकट दिया जाएगा। प्रधान महासचिव ने उदाहरण के रूप में कहा कि वैशाली जिले के लालगंज विधान सभा क्षेऋ से छह लोगों ने 25-25 हजार की सदस्यता का दावा करते हुए शुल्क जमा किया।

अब डेढ लाख हमारे पार्टी के सदस्य ही बन गए तो चुनाव में इस सीट से हार क्यों मिली।इसी जिले के राजापाकड सुरक्षित सीट से रामनाथ रमन ने 25 हजार सदस्यता की।लेकिन चिराग पासवान ने उन्हें टिकट न देकर अपने बहनोई को दे दिया। ऐसे नेतत्व से दलित समाज क्या उम्मीद कर सकता है।अपने संसदीय क्षेत्र के लोगों के दिल्ली इलाज कराने जाने पर वहां रहने का रामविलास पासवान इंतजाम करते थे।उनके जीते जी चिराग ने उस सभागार को ध्वस्त करा दिया।चिराग को पार्टी के नेताओं व कार्यकर्ताओं से कोई वास्ता नहीं रहा है।

उधर राजद बिहार के प्रदेश महासचिव अनिल चंद्र कुशवाहा कहते हैं कि लालू प्रसाद यादव व रामविलास पासवान जमीन से जुड़े नेता थे। उनसे राजनीति तेजस्वी यादव व चिराग पासवान को विरासत में मिली है। यह कह सकते हैं कि यह सोने का चम्मच लेकर पैदा हुए हैं । इनका राजनीतिक संघर्षों का कोई इतिहास नहीं रहा है । ऐसे में उन नेताओं से इनकी तुलना करना ठीक नहीं होगा । खेल व सिनेमा जगत से राजनीति में आए इन राजकुमारो से रामविलास पासवान और लालू प्रसाद यादव की राजनीति उम्मीद करना ठीक नहीं है। लालू प्रसाद यादव से मिलना व संवाद करना जितना सहज था, वह अब नहीं है।

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