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नीतीश भूले सोशल इंजीनियरिंग, JDU में हाशिये पर सवर्ण, महत्वपूर्ण पदों पर ‘लव-कुश’ काबिज

पटना: मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (Nitish Kumar) ऐसे तो सोशल इंजीनियरिंग (Social Engineering) के मास्टर कहे जाते हैं. इसलिए जदयू (JDU) का राष्ट्रीय अध्यक्ष पिछड़ा वर्ग से और प्रदेश अध्यक्ष सवर्ण वर्ग से बनाए रखा था. लेकिन इस बार सब कुछ बदल गया है. विधानसभा चुनाव (Assembly Election) में पार्टी के खराब परफॉरमेंस के बाद ही नीतीश कुमार ने अपनी रणनीति बदल ली और लव कुश समीकरण (Luv Kush Equation) का ध्यान रखा गया है.

बिहार विधानसभा चुनाव में जदयू को केवल 43 सीट पर जीत हासिल हुई और पार्टी तीसरे नंबर पर पहुंच गई. इसी के बाद नीतीश कुमार ने संगठन से लेकर हर स्तर पर अपनी रणनीति बदल ली है. नीतीश कुमार ने इस बार सवर्ण वर्ग को पार्टी के महत्वपूर्ण पदों पर जगह नहीं दी है. मंत्रिमंडल में भी सवर्ण वर्ग के जिन मंत्रियों को जगह दी है, वो नीतीश कुमार के पुराने वफादार नेता हैं. एक तरह से इस बार सवर्ण वर्ग जदयू में हाशिए पर है.

”उन्होंने भले ही अध्यक्ष पद छोड़ दिया है, लेकिन पार्टी उन्हीं की है. नीतीश कुमार पिछड़ों की राजनीति करते रहे हैं और जो फैसला ले रहे हैं, उसमें कोई विस्मय वाली बात नहीं है.”– अरुण पांडे, वरिष्ठ पत्रकार

”नीतीश कुमार लगातार अपर कास्ट का आशीर्वाद लेते रहे हैं. अब उन्हें कहीं जगह नहीं दे रहे हैं. उन्होंने केवल अपने सजातीय को जगह दी है. उन्होंने अपर कास्ट को ही नहीं, बल्कि स्वजातीय और पिछड़ों को छोड़कर सभी वर्ग को ठगा है.”– राजेश राठौर, प्रवक्ता कांग्रेस

”जेडीयू में किसी को तवज्जों नहीं दी जाती है. चाहे वो अगड़े हो, पिछड़े हो, दलित हो या महादलित हो, ये केवल सभी का आई वॉश करते हैं. सभ को यूज करके थ्रो करते हैं. जदयू में किसी का सम्मान नहीं है. सभी अपमानित महसूस कर रहे हैं.”– मृत्युंजय तिवारी, प्रवक्ता आरजेडी

”यहां सब को सम्मान मिलता है. सबसे बड़ा उदाहरण तो मैं ही हूं लगातार मैं पार्टी के लिए काम कर रहा हूं. विपक्ष के पास कोई मुद्दा ही नहीं है, इसलिए उनका काम ही केवल आरोप लगाना है.” उमेश कुशवाहा, प्रदेश अध्यक्ष, जदयू 

नीतीश कुमार ने संगठन से लेकर हर स्तर पर अपनी रणनीति बदल ली है. पार्टी के नेताओं पर अगर नजर डाले तो नीतीश कुमार- कुर्मी, राष्ट्रीय अध्यक्ष आरसीपी सिंह- कुर्मी, संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा- कुशवाहा, प्रदेश अध्यक्ष उमेश कुशवाहा- कुशवाहा, राज्य संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष दिलेश्वर कामत- अति पिछड़ा वर्ग, विधानसभा में डिप्टी स्पीकर महेश्वर हजारी- दलित और राज्यसभा में डिप्टी स्पीकर हरिवंश- राजपूत हैं.

वहीं, नीतीश कैबिनेट में जदयू की भागीदारी पर नजर डाले तो नीतीश कुमार- कुर्मी, विजेंद्र यादव- यादव, श्रवण कुमार- कुर्मी, विजय चौधरी- भूमिहार, लेसी सिंह- राजपूत, संजय झा- ब्राह्मण, जयंत राज- कुशवाहा, सुनील कुमार- दलित, मदन सहनी- मल्लाह, जमा खान- मुस्लिम, अशोक चौधरी- दलित, सुमित कुमार सिंह- राजपूत और शीला कुमारी- धानुक हैं.

नीतीश कुमार समाजवादी आंदोलन से उपजे हुए नेता हैं. लेकिन, जिस प्रकार से पिछड़ा और अति पिछड़ा वोट बैंक के लिए राजनीति कर रहे हैं और अब पार्टी में लव-कुश समीकरण से आने वालों को पार्टी में जिम्मेवारी दे रहे हैं, उस पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं.

बता दें कि विधानसभा चुनाव में जदयू के खराब प्रदर्शन के बाद नीतीश कुमार ने पार्टी की नई रणनीति तैयार की है. नीतीश कुमार को यह भी लगता है कि इस बार अपर कास्ट का वोट जदयू को नहीं मिला है और नाराजगी का यह भी एक बड़ा कारण हो सकता है. इसलिए पूरी तरह फोकस लव कुश समीकरण और अति पिछड़ा वोट बैंक के साथ आधी आबादी पर है. हालांकि, पार्टी में अपर कास्ट के नेताओं ने इस मामले में फिलहाल चुप्पी साध रखी है.

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