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अमेजन को टक्कर देने आ रहा ‘सरकारी अमेजन’, खुदरा व्यापारियों की होगी बल्ले-बल्ले!

भारत का बाजार दुनियाभर की कंपनियों के लिए आकर्षण का केंद्र माना जाता है। आज के दौर में भारत के विशाल बाजार में आए बिना कंपनियां वैश्विक कंपनी होने का दावा करने की हिम्मत नहीं जुटा पातीं। ई-कॉमर्स भी एक ऐसा सेक्टर है, जिसमें भारत में अनेको संभावनाएं हैं, लेकिन इस सेक्टर में केवल दो चार कंपनियों ने कब्जा कर रखा है। इस एकाधिकार को खत्म करने का बीड़ा अब भारत सरकार ने उठाया है।

उद्योग एवं आंतरिक संवर्धन विभाग ने डिजिटल कॉमर्स के तहत ओपन सोर्स परियोजना शुरू करने की प्लानिंग की है। इसके तहत सुझावों के लिए एक कमेटी का गठन भी कर दिया गया है। विश्लेषकों के मुताबिक ये एक ऐसा मंच होगा जो कि देश के सभी खुदरा विक्रेताओं के लिए उपयोगी साबित होगा।

आज की स्थिति में अगर कोई भारतीय नागरिक ई-कॉमर्स कंपनियों के नाम लेगा तो मुख्य तौर पर अमेजन, फ्लिपकार्ट, रिलायंस जैसी कंपनियों के ही लेगा। इनमें भी सबसे बड़ा खिलाड़ी अमेजन ही है। इसको हम ऐसे भी कह सकते हैं कि अमेजन का पूरे भारतीय ई-कॉमर्स मार्केट पर एकाधिकार है। अब इस स्थिति को बदलने के लिए सरकार यूपीआई (UPI) की तर्ज पर ही ई-कॉमर्स के लिए भी एक ओपन सोर्स प्लेटफॉर्म लाने की प्लानिंग कर रही है। इसके लिए DPIIT ने सुझावों के संबंध में एक कमेटी का गठन भी कर दिया है।

सरकार की प्लानिंग है कि इस नई ओपन सोर्स परियोजना के तहत देश का कोई भी डिजिटल खुदरा व्यापारी अपना सामान देश भर में कहीं भी बेच सके। इसका उद्देश्य खुले नेटवर्क संवर्धनों को बढ़ावा देना है। इतना ही नहीं, इस नीति में लोगों को ऑनलाइन खरीदने और बेचने के लिए प्रेरित करने के साथ ही संचालन के मानकीकरण के संबंध में भी कदम उठाए जा सकते हैं।

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक इस कमेटी में राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राधिकरण के सीईओ व ट्राई (TRAI) के पूर्व अध्यक्ष आरएस शर्मा के साथ ही इन्फोसिस के गैर-कार्यकारी अध्यक्ष नंदन नीलेकणि, क्वालिटी कंट्रोल ऑफ इंडिया के आदिल जैनुलभाई के साथ एक बड़ी टीम काम करने वाली है। इस मुद्दे पर एक बड़ी ई-कॉमर्स कंपनी के एग्जिक्यूटिव ने कहा कि अगर सरकार द्वारा इस दिशा में ऐसा कोई कदम उठाया जाता है तो ये निजी क्षेत्र की उन बड़ी कंपनियों के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी, जोकि देश में बड़े स्तर पर ई-कॉमर्स पर अपना कब्जा करके बैठे हैं।

यदि ओएनडीसी की कमेटी इस दिशा में बेहतरीन सुझावों के साथ सामने आती है तो ये देश के साधारण लोगों को भी अपना व्यापार आसानी से डिजिटल माध्यम में ले जाने में सबसे बड़ा सहायक होगा। कई बार ये खुलासे भी हुए हैं कि ई-कॉमर्स कंपनियां कुछ चुनिंदा रीटेलर्स के सामान को वरीयता देती हैं, जिसके पीछे असल में ई-कॉमर्स कंपनियों की अप्रत्यक्ष डील होती है या फिर वो रीटेलर भी ई-कॉमर्स कंपनियों से संबंधित ही होता है, जिसके चलते निचले स्तर के खुदरा व्यापारियों का सामान बिक ही नहीं पाता है।

ऐसे में अगर नए सुझाव लागू होते हैं तो मुख्य ई-कॉमर्स कंपनियों का एकाधिकार तो खत्म होगा ही, साथ ही उन खुदरा व्यापारियों के लिए भी आसानी होगी जो इन बड़े-बड़े प्लेटफॉर्म के बीच अपने विस्तार के लिए लगातार संघर्ष करते रहते हैं।

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