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चिराग के बहाने बीजेपी को मैसेज दिए नीतीश- बिहार में तो हम ही हैं बादशाह!

पटना
लोक जनशक्ति पार्टी (एलजेपी) के संस्थापक रामविलास पासवान के निधन को अभी एक साल भी नहीं हुए हैं, लेकिन उनकी पार्टी और परिवार दोनों बिखरते हुए दिख रहे हैं। पिता ने जाते-जाते बेटे चिराग पासवान के हाथों में पार्टी की कमान सौंपी थी, लेकिन युवा नेता ने अब तक जितने फैसले लिए हैं उसमें कहीं भी सकारात्मक सफलता नहीं मिली है। पार्टी के अंदर चिराग की कार्यशैली को लेकर नाराजगी इतनी है कि चाचा पशुपति पारस की अगुवाई में चचेरे भाई प्रिंस पासवान समेत पांच सांसदों ने अलग गुट बना लिया है। ये अभी साफ नहीं हो पाया है कि यह गुट चिराग पासवान को ही पार्टी से बाहर कर देंगे या किसी दूसरे दल में शामिल होंगे। इस पूरे राजनीतिक घटनाक्रम का मास्टर माइंड बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को माना जा रहा है। यह बात सामने आने पर पहला सवाल यही उठता है कि साफ-सुथरी पॉलिटिक्स में विश्वास रखने वाले नीतीश कुमार आखिर इस तरह के फैसलों की अगुवाई क्यों कर रहे हैं। आइए राजनीतिक संकेतों के जरिए समझने की कोशिश करते हैं कि आखिर नीतीश कुमार का असली निशाना कहां है?

विधानसभा चुनाव में डैमेज का बदला लेना चाहते थे नीतीश!
2020 के बिहार विधानसभा चुनाव में वोटिंग से ठीक कुछ दिन पहले चिराग पासवान ने एनडीए से अलग होकर अकेले मैदान में उतरने का फैसला किया था। चिराग ने बिहार चुनाव में उन सीटों पर मजबूत प्रत्याशी उतारे जहां से जेडीयू के कैंडिडेट थे, वहीं जिन सीटों पर बीजेपी के प्रत्याशी थे उनपर अपनी पार्टी का कैंडिडेट ही नहीं उतारा। माना जाता है कि इससे जेडीयू को भारी नुकसान उठाना पड़ा और मुख्यमंत्री नीतीश की पार्टी जेडीयू 43 सीटों पर सिमट गई। वहीं बीजेपी 74 सीटों के साथ दूसरे नंबर पर रही। बीजेपी की केंद्रीय टीम की दखल से नीतीश कुमार को एक बार फिर मुख्यमंत्री की कुर्सी मिल गई, लेकिन नंबर गेम में पिछड़ने के चलते बीजेपी की राज्य ईकाई उनपर मनौवैज्ञानिक दबाव बनाए हुए है।

माना जा रहा है कि चिराग पासवान की ओर से किए गए इस डैमेज का बदला लेने के लिए नीतीश कुमार ने उनकी पार्टी को ही तहस-नहस करने पर आतुर हैं। पहले एलजेपी के एक मात्र विधायक को जेडीयू में शामिल कराया, अब पार्टी के छह सांसदों में से पांच को चिराग से अलग करने के पीछे भी इन्हीं का हाथ माना जा रहा है। रामविलास पासवान के छोटे भाई पशुपति पारस के नीतीश से अच्छे रिश्ते हैं। साथ ही पशुपति नहीं चाहते थे कि बिहार चुनाव में एलजेपी नीतीश का विरोध करे, लेकिन चिराग ने पार्टी अध्यक्ष के तौर पर इस सलाह को नकार दिया था, जिसका शायद उन्हें खामियाजा भुगतना पड़ रहा है।

चिराग के चलते जेडीयू को ना केवल सीटों का नुकसान हुआ, बल्कि बीजेपी के मुकाबले वोट शेयर भी काफी घट गया। बीजेपी को जहां 20.3 फीसदी वोट मिले, वहीं जेडीयू को 15.43 फीसदी वोट से संतोष करना पड़ा। राजनीति को जो भी समझते हैं वे भली-भाति जानते हैं कि चुनाव में सीटों का ऊपर नीचे होना उतना अहम नहीं है जितना कि वोट शेयर का घटना।

तीसरे नंबर की पार्टी बनने के बाद से कुनबा मजबूती में जुटे हैं नीतीश
बिहार विधानसभा चुनाव में तीसरे नंबर की पार्टी बनने के बाद से नीतीश कुमार लगातार अपने कुनबे को मजबूत करने में जुटे हैं। कुछ निर्दलीय विधायकों को वह पहले ही जेडीयू की सदस्यता दिला चुके हैं। इसके अलावा उपेंद्र कुशवाहा को पार्टी में लाए और अहम पद सौंपा है। अब एलजेपी को तोड़कर जनता दल युनाइटेड (जेडीयू) की ताकत लोकसभा में बढ़ाने में जुटे हैं। लोकसभा में बिहार से बीजेपी के 17 और जेडीयू के 16 सांसद हैं। अगर एलजेपी के पांच सांसद जेडीयू में आते हैं तो यह संख्या 21 हो जाएगी। यानी लोकसभा में जेडीयू बिहार की सबसे ताकतवर पार्टी हो जाएगी। नीतीश कुमार जिस तरह से जातीय समीकरण को साधकर अपना कुनबा मजबूत कर रहे हैं उससे तो यही लगता है कि आगामी चुनावों में वह बीजेपी के मुकाबले अपनी पार्टी का वोट शेयर बढ़ाने में जुटे हैं।

केंद्र में 5 मंत्री पद चाहते हैं नीतीश!
जेडीयू एनडीए का अहम घटक दल है, लेकिन केंद्र की नरेंद्र मोदी की सरकार में उसके नुमाइंदे नहीं हैं। इसकी असली वजह यह हे कि नीतीश कुमार केंद्र में एकाध नहीं पूरे पांच मंत्री पद चाहते हैं। उनका तर्क है कि जब बिहार में बीजेपी और जेडीयू बराबर सीटों पर चुनाव में उतरी और करीब-करीब बराबर सीटें जीती भी, तो केंद्र मंत्रिमंडल में भी दोनों दलों के बराबर प्रतिनिधि होने चाहिए। मोदी सरकार कैबिनेट विस्तार करने जा रही है। ऐसे में उम्मीद की जा रही है कि जेडीयू को भी सरकार में शामिल किया जा सकता है। इन अटकलों के बीच नीतीश कुमार अपनी पांच मंत्रियों की डिमांड को मजबूती से रखने के लिए एलजेपी में तोड़फोड़ का सहारा ले रहे हैं। अगर केंद्र सरकार में जेडीयू की मजबूती से एंट्री होती है तो स्वभाविक है कि बिहार में भी बीजेपी नेतृत्व पर इसका असर दिखेगा।

2005 में भी एलजेपी को तोड़ने वाले थे नीतीश!
साल 2005 के फरवरी में हुए विधानसभा चुनाव में रामविलास पासवान पहली बार लोकजनशक्ति पार्टी (एलजेपी) की स्थापना कर मैदान में उतरे थे। इस चुनाव में एलजेपी को 29 सीटें आई थीं। रामविलास सत्ता की चाबी लेकर घूम रहे थे और वह ना आरजेडी को समर्थन दे रहे थे और ना ही एनडीए को। ऐसे में एक शाम अचानक खबर आई कि एलजेपी के 29 में से 21 विधायक अलग गुट बनाकर नीतीश के साथ जा रहे हैं। लेकिन नीतीश कुमार ने कहा था कि वह किसी पार्टी में तोड़फोड़ कर सरकार नहीं बनाएंगे, जिसके बाद बिहार में दोबारा विधानसभा चुनाव हुए थे।

नीतीश का असल निशाना क्या है?
राजनीति के जानकार मानते हैं कि नीतीश कुमार का नेचर है कि वह किसी भी सरकार या गठबंधन में अपनी शर्तों पर ही रहते हैं। वह गठबंधन या सरकार में हमेशा ड्राइविंग सीट पर रहना चाहते हैं। 2020 बिहार विधानसभा चुनाव में नीतीश की ताकत घटी है। मौजूदा परिस्थिति में ऐसा लगता नहीं है कि नीतीश एनडीए से अलग होंगे। ऐसे में आगामी चुनावों में बीजेपी बिहार के किसी चुनाव में खुद को बड़ा भाई ना बताने लगे इसलिए नीतीश लगातार खुद को मजबूत करने में जुटे हैं। नीतीश जैसे मंजे हुए राजनेता भली-भांति समझते हैं कि अगर वह बीजेपी के मुकाबले लंबे समय तक कमजोर दिखने लगे तो उनकी पार्टी का क्या हाल होगा।

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