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पाकिस्तान को काफी महंगा पड़ा मंत्री का बड़बोलापन, 10 अरब डॉलर नहीं लगाएगा सऊदी अरब

सऊदी अरब को लेकर शाह महमूद कुरैशी का बड़बोलापन पाकिस्तान को आज भी भारी पड़ रहा है। पिछले वर्ष अगस्त महीने की शुरुआत में पाकिस्तानी विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने कश्मीर मुद्दे पर सऊदी अरब द्वारा पाकिस्तान को समर्थन न करने के कारण सऊदी अरब को यह धमकी दे दी थी कि वह मुस्लिम देशों के बीच नेतृत्व का एक नया धड़ा बनाएंगे। बस फिर क्या था, सऊदी ने पाकिस्तान को उसकी जगह दिखाना शुरू कर दिया और एक के बाद एक पाकिस्तान को कई आर्थिक झटके दिए।

अब सऊदी अरब ने फैसला किया है कि वह पाकिस्तान की ग्वादर आयल रिफाइनरी में निवेश नहीं करेगा। न्यूज इंटरनेशनल से बात करते हुए इमरान खान के बिजली-पेट्रोलियम पर विशेष सहायक ताबीश गौहर ने स्पष्ट रूप से बताया कि सऊदी अरब ग्वादर में रिफाइनरी स्थापित नहीं करेगा।

सऊदी अरब इस प्रोजेक्ट के लिए 10 अरब डॉलर का निवेश करने वाला था। पाकिस्तान की वर्तमान आर्थिक स्थिति को देखते हुए भी यह समझा जा सकता है कि यह निवेश पाकिस्तान के लिए कितना महत्वपूर्ण था। पाकिस्तान ग्वादर को आर्थिक हब बनते देखना चाहता है। चीन का CPEC प्रोजेक्ट भी ग्वादर तक आता है। यही कारण था कि यह आयल रिफाइनरी पाकिस्तान के आर्थिक विकास में एक महत्वपूर्ण घटक बन सकती थी।

सऊदी से निवेश पाने के लिए पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने हाल में सऊदी अरब का दौरा भी किया था, लेकिन उनके सभी प्रयास निर्रथक साबित हुए हैं। ऐसा लगता है कि सऊदी पाकिस्तान को माफ करने के मूड में नहीं है।

दरअसल, वर्ष 2019 में सऊदी अरब ने 20 अरब डॉलर के समझौते के वक्त ग्वादर में 10 अरब डॉलर के निवेश की घोषणा की थी। बिगड़ते संबंधों के बीच सउदी ने पाकिस्तान से तेल सुविधा भी वापस ले ली है, जिसकी बहाली के लिए पाकिस्तान प्रयासों में लगा हुआ है।

बता दें कि जब पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद ने यह बयान दिया था कि पाकिस्तान OIC में सऊदी से अलग नेतृत्व खड़ा कर सकता है, उसके बाद सबसे पहले सऊदी ने पाकिस्तान से अपना बकाया लोन चुकाने को कहा। पाकिस्तान ने जैसे तैसे चीन से 1 बिलियन डॉलर उधार लेकर सऊदी के कर्ज का एक हिस्सा भर दिया, साथ ही थोड़ी मोहलत ले ली।

इसके बाद सऊदी ने पाकिस्तान को मुफ्त का तेल निर्यात बन्द कर दिया। पाकिस्तान के सेना प्रमुख बाजवा भागकर सऊदी पहुंचे, किन्तु क्राउन प्रिंस बिन सलमान ने उन्हें समय नहीं दिया। इसके बाद कश्मीर की आजादी का नारा लगाने वालों को सऊदी ने धमकी दी कि ऐसे प्रदर्शन करने वालों को सऊदी अरब से बाहर फेंक दिया जायेगा।

दअरसल, सऊदी अरब ये भी जानता है कि दूरगामी रूप से पाकिस्तान और उसका सहयोग सम्भव नहीं है। पाकिस्तान चीन के साथ सहयोग करके बुरी तरह फंस चुका है। पश्चिम एशिया में चीन का मुख्य सहयोगी ईरान है, अतः मजबूर होकर पाकिस्तान को ईरान और चीन की लाइन पर चलना होगा।

इसके अतिरिक्त अब पाकिस्तान में कट्टरपंथियों का प्रभाव पहले से कहीं अधिक बढ़ गया है। फ्रांस के राजदूत को देश से बाहर निकालने के लिए हुए आंदोलन ने ये बात साफ कर दी है। फ्रांस से मजबूत आर्थिक रिश्तों के बाद भी पाकिस्तान की सरकार को कट्टरपंथियों के दबाव में यह फैसला लेना पड़ा कि वह फ्रांस के राजदूत को वापस भेजेगी।

इस घटना से एक बात तो स्पष्ट हो गई कि पाकिस्तान कट्टरपंथ के सामने इतना मजबूर है कि वो अपने हितों के साथ समझौता तक करने को तैयार है। बीती वर्ष जिस तरह से पाकिस्तान ने सऊदी को निशाना बनाकर अपने हितों से समझौता किया उसका खामियाजा वो अब तक भुगत रहा है।।

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