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महीनों बाद भी नहीं बन सकी कोरोना की दवा, ये बड़ लापरवाही है इसकी वजह !

कोरोना वायरस को दुनिया की निगाह में आए करीब 4 महीने बीत गए हैं. अबतक ये महामारी 1 लाख 90 हजार से अधिक लोगों की जान ले चुकी है. काफी दिनों से दुनिया भर के वैज्ञानिक अपनी लैब्स में बंद होकर इसका तोड़ तलाश रहे हैं. लेकिन अबतक कोई भी ये दावा नहीं कर सका है कि हां, मेरे पास है कोरोना का कन्फर्म इलाज. ऐसा क्यों, क्या आप जानते हैं कि कोरोना वैक्सीन को लेकर इतनी देर क्यों हो रहे है? ये जानकर आप हैरान रह जाएंगे कि इस देरी के लिए हम ही ज़िम्मेदार हैं. दरअसल हम टीके बनाने और उसकी रिसर्च से दूर हो गए, इसलिए कोरोना के सामने मजबूर हो गए. ऐसा हम कैसे कह रहे हैं, इसके लिए आपको वक्त में थोड़ा पीछे ले चलते हैं.

2002 में फैला सार्स

2002 में चीन के ग्वांझो में एक अनजाने वायरस से दुनिया के कई देशों में महामारी फैली. वैज्ञानिकों ने 2002 वाली महामारी को सार्स (SARS) नाम दिया. सार्स यानी सीवियर एक्यूट रेसपिरेटरी सिंड्रोम यानी सांस वाली बीमारी, जोकि कोविड 19 में भी होती है. बाद में वैज्ञानिकों को पता लगा कि सार्स कोरोना फैमिली के वायरस से फैलता है. सार्स कोरोना वायरस जानवरों के ज़रिए ही इंसानों तक पहुंचा.

कुछ ही महीनों में सार्स 29 देशों में फैल गया, करीब 8,000 लोग संक्रमित हुए, जबकि 800 से ज़्यादा मौतें हुईं. तब दुनिया जानना चाहती थी कि इसका टीका कब तैयार होगा. कुछ देशों ने तो क्लीनिकल ट्रायल का दावा भी कर दिया था, लेकिन तभी सार्स महामारी पर काबू पा लिया गया. काबू पाते ही कोरोना वैक्सीन पर जारी तमाम रिसर्च बंद हो गईं.

2012 में फैला मार्स

2012 में एक और जानलेवा कोरोना वायरस मर्स फैला. मर्स भी कोरोना वायरस था, जो ऊंटों के ज़रिए इंसानों में पहुंचा. तब भी कई वैज्ञानिकों ने मर्स का टीका तैयार करने की ज़रूरत दोहराई.

अब कोरोना ने मचाया है कोहराम

अब 18 साल बाद नए कोरोना वायरस SARS-Cov-2 का हमला हुआ है. करीब 27 लाख से ज़्यादा लोग संक्रमित हैं, 1 लाख 90 हजार से ज़्यादा मौतें हुईं. 2002 से 2012 तक कोरोना पर रिसर्च जारी रहती तो टीका जल्दी बन जाता. पिछली घटनाओं से हमने सबक नहीं लिया, अगर कोरोना वायरस की वैक्सीन पहले बन जाती तो कोविड 19 के टीके मुमकिन थे, वो तब बने नहीं, आज तलाश हो रही है.

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