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यूपी: बीजेपी के अंदरखाने जो हो रहा है, वो बड़ा बदलाव तय बता रहा है?

लखनऊ : अगले साल के शुरुआती महीनों में जिन पांच राज्यों में चुनाव होने हैं, उसमें यूपी को लेकर बीजेपी सबसे ज्यादा फिक्रमंद है। उसकी यह फिक्र हाल के कुछ महीनों के दरम्यान बढ़ी भी है। पिछले दिनों में दिल्ली में संघ और बीजेपी के बड़े नेताओं के बीच एक बैठक भी हुई, जिसमें यूपी को लेकर बहुत सारी बातों पर विमर्श हुआ।

बहुत सारे बदलाव भी ‘पाइप लाइन’ में बताए जा रहे हैं। अगर राजनीतिक गलियारों में इन दिनों यूपी को लेकर जो ‘किस्से’ सुने-सुनाए जा रहे हैं, अगर उन पर कान दे दिया जाए तो ऐसा लगता है कि वहां ‘बड़ी सर्जरी’ होने वाली है लेकिन अधिकारिक तौर पर अभी उनकी पुष्टि नहीं हो पा रही है। हालांकि बदलाव के दृष्टिगत घबराहट तो राज्य बीजेपी के बड़े नेताओं तक में है। दिल्ली की हर आहट पर वे चौंक जा रहे हैं। कुछ नेताओं ने तो अपनी सक्रियता भी बढ़ा दी है ताकि आने वाले किसी ‘तूफान’ से अपने का सुरक्षित रख सकें। संगठन और सरकार के बीच और बेहतर समन्वय बनाने पर जोर दिया जा रहा है।

फिक्र बढ़ने की क्या हैं वजहें:-

कोविड की पहली लहर में यूपी में जितना सब कुछ व्यवस्थित था, दूसरी लहर में वह उतना ही अव्यवस्थित दिखा। यह संयोग कहा जा सकता है कि कोरोना से डराने वाली ज्यादातर खबरें यूपी से ही निकलीं। यहां तक कि मंत्रियों, बीजेपी सांसदों और विधायकों तक ने कहीं कोई सुनवाई न होने की बात कह डाली। हालांकि बाद में राज्य सरकार ने स्थितियों पर काबू पाने में बहुत कुछ सफलता पाई लेकिन तब तक देर हो चुकी थी।

सरकार की प्रबंधन क्षमता पर जो ‘डेंट’ लगना था, वह लग चुका है। दिल्ली में बीजेपी के कई वरिष्ठ नेता स्वीकारते हैं कि ‘कई मौकों पर यह देखा जा चुका है, पहली नजर में जो धारणा बन जाती है, वह मिटने नहीं पाती, बाद में आप चाहे जितना अच्छा काम करके दिखा दें।’ शुरुआती अव्यवस्था लोगों के जेहन पर हावी न होने पाए, इसके लिए क्या तरीका अपनाया जाए, यह बीजेपी की टॉप लीडरशिप में विमर्श का मुख्य मुद्दा है।

जातीय समीकरणों पर नजर
यूपी की पॉलिटिक्स में पिछड़ा वर्ग और पिछड़ा वर्ग में भी अति पिछड़ा वर्ग बहुत निर्णायक भूमिका निभाता है। 1991 में बीजेपी पहली बार जब सत्ता में आई थी तो कल्याण सिंह को ही चेहरा बनाकर आई थी जो कि अतिपिछड़ा वर्ग से हैं। 2017 के चुनाव में बीजेपी ने अतिपिछड़ा वर्ग को ही गोलबंद करने के लिए सांसद केशव प्रसाद मौर्य को प्रदेश अध्यक्ष बनाया था। उन्हें सीएम उम्मीदवार घोषित तो नहीं किया गया था लेकिन पेश कुछ उसी अंदाज में किया जा रहा था।

सीएम का चेहरा हो या नहीं
2014 से 2021 के बीच अलग-अलग राज्यों में हुए चुनावों के जरिए बीजेपी ने पाया कि लगातार दूसरी बार उसी मुख्यमंत्री के चेहरे पर चुनाव के मैदान में जाने से ऐंटी इनकंबेंसी फैक्टर ज्यादा हावी हो जाता है। दूसरी बात यह भी होती है कि सीएम पद के जो अन्य दावेदार होते हैं, वे सक्रियता नहीं दिखाते। इसके मद्देनजर बीजेपी लीडरशिप ने अप्रैल में हुए असम के चुनाव में एक नया प्रयोग किया।

विपक्ष का मुखर हो जाना
बीजेपी की लीडरशिप का यह अनुभव है कि जिन राज्यों में क्षेत्रीय दल होते हैं, वहां बीजेपी की लड़ाई कांग्रेस प्रभावी वाले राज्यों के मुकाबले ज्यादा कठिन हो जाती है। यूपी में तो बीजेपी के मुकाबले क्षेत्रीय दलों का ही दबदबा है। बीजेपी की लीडरशिप को यह भी उम्मीद नहीं थी कि चुनाव तक राज्य में विपक्ष इतना ज्यादा मुखर हो जाएगा लेकिन चुनाव आते-आते राज्य में विपक्ष तन कर खड़ा हो चुका है।

कोविड काल की अव्यवस्था ने उसे सरकार पर हमला बोलने का हथियार भी दे दिया है। कई गैर राजनीतिक संगठन और प्रभावी व्यक्ति भी विपक्ष के सुर में सुर मिला रहे हैं। ऐसे में सरकार को अपना बचाव कर पाना मुश्किल हो रहा है। सरकार में होने का अपना एक अलग दबाव तो होता है, उधर विपक्ष के पास खोने के लिए कुछ नहीं है।

यूपी से लोकसभा की 80 सीटें आती हैं। यहां की पॉलिटिक्स का सीधा असर केंद्र की राजनीति पर पड़ता है। 2014 और उसके बाद 2019 के आम चुनाव में बीजेपी को रेकॉर्ड 300 + सीटें मिलीं, उसमें यूपी का बहुत बड़ा योगदान है। 2014 के चुनाव में बीजेपी को यहां से 80 में से 73 और 2019 में 64 सीट मिलीं थी। 2022 में जब यूपी में चुनाव होंगे तो उसके महज दो साल बाद लोकसभा के चुनाव प्रस्तावित हैं।

बीजेपी लीडरशिप को लगता है कि अगर पार्टी कहीं 2022 के विधानसभा चुनाव में अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाई तो इसका असर 2024 के लोकसभा के चुनाव पर पड़ेगा। 2024 का लोकसभा का चुनाव बीजेपी के लिए इसलिए और महत्वपूर्ण होगा कि वह लगातार तीसरे कार्यकाल के लिए चुनाव के मैदान में होगी। उसकी कोशिश किसी भी कीमत पर सत्ता में वापसी की होगी और यह सब कुछ राज्यों में पार्टी के प्रदर्शन पर निर्भर करेगा।

पार पाना कितना आसान?
यूपी को लेकर बीजेपी की बढ़ती फिक्र की ये जो वजहें हैं, उनसे पार पाना उसके लिए कितना आसान होगा, यह सवाल बहुत अहम है। बताया जा रहा है कि आने वाले कुछ महीनों के अंदर अमित शाह यूपी को लेकर सक्रिय होने वाले हैं और एक तरह से राज्य में पार्टी की रणनीति की कमान उन्हीं के हाथ में होगी।

यूपी में बीजेपी को खड़ा करने का श्रेय भी उन्हें जाता है। 2014 में यूपी के प्रभारी रहते हुए यह उनकी रणनीति का कमाल था कि राज्य में विपक्ष का सफाया हो गया था। पार्टी के एक सीनियर लीडर ने कहा भी, यूपी को लेकर हमें कुछ कड़े फैसले लेने ही होंगे।

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