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BSP की राजनीति: कांशीराम के जमाने से जुड़े थे राम अचल और लालजी, क्यों बाहर कर दीं ‘बहनजी’?

लखनऊ :  बहुजन समाज पार्टी (BSP) सुप्रीमो मायावती (Mayawati) ने अपने दो दिग्गज नेताओं पर सख्त कार्रवाई की है। विधानमंडल दल के नेता लालजी वर्मा (Lalji Verma) और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष व राष्ट्रीय महासचिव राम अचल राजभर (Ram Achal Rajbhar) को पार्टी से निष्कासित कर दिया गया है। पंचायत चुनाव में पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल होने को इसकी वजह बताया गया है। आजमगढ़ के मुबारकपुर से विधायक शाह आलम उर्फ गुड्डू जमाली (Shah Alam Urf Guddu Jamali) को विधायक दल का नया नेता चुना गया है। वर्मा और राजभर का पिछड़े वर्ग में बड़ा जनाधार माना जाता है।

आइए समझते हैं इन दो नेताओं की विदाई पार्टी के लिए कितना बड़ा झटका है। साथ ही सियासत पर क्या असर पड़ सकता है।

2017 की प्रचंड लहर में भी बचाई थी सीट
राजभर और वर्मा दोनों ही मायावती के काफी करीबी थे। वर्मा अंबेडकरनगर के कटेहरी और राजभर अकबरपुर विधानसभा सीट से विधायक हैं। इनका निष्कासन लगातार कमजोर हो रही पार्टी के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है। 2017 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी की लहर के बावजूद दोनों अपनी-अपनी सीट बचाने में कामयाब रहे थे।

दोनों ही कांशीराम के जमाने से बसपा से जुड़े थे। राजभर 1993 में पहली बार बसपा के टिकट पर विधायक बने। तब से उनकी जीत का सिलसिला जारी है। वर्मा 1986 में पहली बार एमएलसी बनाए गए। इसके बाद उन्होंने 1991, 1996, 2002, 2007 और 2017 का विधानसभा चुनाव भी जीता।

सपा में जाने की ज्यादा संभावना
सूत्रों के मुताबिक वर्मा और राजभर के निष्कासन की वजह सिर्फ पंचायत चुनाव नहीं है। दोनों ही नेताओं की पिछले कुछ समय से समाजवादी पार्टी (सपा) और भाजपा से करीबी बढ़ रही है। पिछले साल इनमें से एक नेता की मुलाकात सपा मुखिया अखिलेश यादव से भी हुई थी। इसके बाद उनके पार्टी छोड़ने के कयास लगाए जा रहे थे। राजभर की राजभर समाज और वर्मा की कुर्मी समाज पर अच्छी पकड़ मानी जाती है।

जानकारों का मानना है कि दोनों के सपा में जाने की संभावना ज्यादा है। दोनों जहां से राजनीति करते हैं, वहां समाजवादी पार्टी का अच्छा दबदबा है। साथ ही ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) समाज के दो बड़े नेताओं को जोड़कर सपा 2022 के लिए जमीन तैयार कर सकती है।

मैं बहनजी (मायावती) से मिलने की कोशिश कर रहा हूं, ताकि उनकी गलतफहमी दूर की जा सके। उन्हें बताऊंगा कि बीमार होने के कारण मैं पंचायत चुनाव में सक्रिय भागीदारी नहीं निभा सका। वैसे यह बात उन्हें मालूम है।

कांशीराम से लेकर माया के खास रहे दोनों नेता
पिछले विधानसभा चुनाव में जब यूपी में बीजेपी की लहर चल रही थी, उस वक्त भी अम्बेडकरनगर से बसपा के लालजी वर्मा और राम अचल राजभर को बीजेपी पटखनी नहीं दे पाई थी। उन्हीं को पार्टी ने पंचायत चुनाव में धोखाधड़ी की शिकायत पर बाहर का रास्ता दिखा दिया।

कभी बसपा संस्थापक कांशीराम के करीबी रहे लालजी और राजभर को मौजूदा सुप्रीमो मायावती ने भी अपनी सरकारों में हमेशा बड़ा ओहदा दिया लेकिन बसपा के गढ़ अम्बेडकरनगर के इन दोनों नेताओं की ‘अति महत्वाकांक्षा’ उन्हें रास नहीं आई और उन्हें बाहर करना ही पड़ा।

अपनों में घमासान का असर
अम्बेडकरनगर को बसपा अपना गढ़ मानती है, खुद बसपा सुप्रीमो यहां से विधानसभा और लोकसभा चुनाव जीत चुकी हैं। 2017 में अकबरपुर से राम अचल राजभर और कटेहरी से लालजी वर्मा ने चुनाव जीतकर जिले और पार्टी दोनों जगह अपना कद और बढ़ा लिया था। लेकिन कुछ महीने से दोनों विधायक जोनल कोऑर्डिनेटर से सीधे मोर्चा खोले हुए थे। जोनल कोऑर्डिनेटकर बसपा से निष्काषित पूर्व सांसद घनश्याम चन्द्र खरवार के पार्टी में लौटते ही अंतर्कलह शुरू हो गई।

सूत्रों का कहना है कि बसपा में कद बढ़ाने के लिए खरवार ने आते ही अपने विरोधियों की घेराबंदी शुरू कर दी। लालजी वर्मा और राम अचल उनके निशाने पर थे। पहले इसी वजह से बसपा सुप्रीमो के लिए अपनी सीट छोड़ने वाले त्रिभुवन दत्त ने पार्टी छोड़कर सपा जॉइन कर ली। यह आपसी रार पार्टी मुखिया तक पहुंची लेकिन वहां से भी कोई हल नहीं निकला।

 

मुझे निकाले जाने की वजह के बारे में कोई जानकारी नहीं है। मैं पार्टी का समर्पित कार्यकर्ता हूं और हमेशा रहूंगा। मैं बहनजी को एक बार फिर मुख्यमंत्री बनाने के लिए पार्टी में कार्य करता रहूंगा।
राम अचल राजभर

टिकट की चाह महंगी पड़ गई
पिछले चुनाव में पत्नी शोभावती को जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी न दिला पाने की कसक पांच साल से लालजी वर्मा के सीने में दबी हुई थी। इस बार वह पत्नी को जिला पंचायत अध्यक्ष बनाकर उसे पूरा करना चाहते थे। लेकिन पत्नी को छोड़कर उनके करीबियों को टिकट नहीं दिया गया। लालजी इतना नाराज हुए कि उन्होंने ना केवल पत्नी का टिकट वापस किया, बल्कि पूरे चुनाव से कन्नी काट ली।

वहीं राम अचल की करीबी माने जाने वाली पूर्व ब्लॉक प्रमुख शारदा राजभर को भी जिला पंचायत सदस्य का टिकट बसपा ने नहीं दिया। इससे नाराज वह जिले से ही गायब हो गए। इस वजह से गढ़ में ही 41 सीट में बसपा समर्थित केवल सात उम्मीदवार ही जीत सके। सूत्रों का कहना है कि मायावती को बताया गया कि दोनों नेताओं ने पार्टी की मदद करने के बजाए सपा की मदद की। दोनों नेता सपा-बीजेपी के भी संपर्क में थे।

कहा जा रहा है कि दोनों की रुखसती का प्लान भी घनश्याम ने तैयार किया था। हालांकि लालजी वर्मा और राजभर खुद को निर्दोष बता रहे हैं। लालजी का कहना है कि पंचायत चुनाव में वह अस्वस्थ थे। खुद बसपा प्रमुख ने उनसे बात की थी।
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