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संकट में लोग : कंट्रोल रूम से लेकर सोशल मीडिया पर मदद की गुहार, कोरोना से कैसे बचेगी जान

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में ऑक्सीजन की किल्लत दूर करने के लिए ऑक्सीजन एक्सप्रेस से टैंकर आ रहे हैं, लेकिन अभी अस्पतालों की स्थिति ठीक नहीं है। चाहे वह सरकारी अस्पताल हों या फिर निजी अस्पताल। मुंह मांगी कीमत देने पर भी मरीजों को बेड़ नहीं मिल पा रहे हैं। परिजन अस्पतालों से लगातार सम्पर्क कर रहे हैं, लेकिन कहीं बेड़ खाली नहीं तो कहीं ऑक्सीजन का संकट बताया जा रहा है। सौ से अधिक कोविड़ अस्पताल बनाए जा चुके हैं, लेकिन इन अस्पताल में मरीज आसानी से एड़मिट नहीं हो पा रहे हैं। कारण ये बताए जा रहे हैं कि जितनी बड़़ी संख्या में लोग बीमार हो रहे हैं‚ उस हिसाब से अस्पतालों में बेड़ उपलब्ध नहीं है।

वेबसाइट पर जाकर देख सकते हैं कहां कितने हैं बेड खाली

उत्तर प्रदेश सरकार के द्वारा अस्पतालों में कोविड-19 इलाज के लिए लखनऊ में बेड और ऑक्सीजन वेंटिलेटर की किल्लत को देखते हुए एक वेबसाइट लांच कर दी गई है। इस वेबसाइट पर मरीज के परिजन जाकर यह देख सकते हैं कि, कौन से हॉस्पिटल में कितने बेड खाली हैं। फिलहाल आंकड़े तो बता रहे हैं लेकिन एडमिशन होने में अभी भी बहुत समस्याओं का सामना पीड़ितों को करना पड़ रहा है। इस वेबसाइट पर जाकर पता किया जा सकता है कि, बेड की मौजूदगी है या नहीं।

http://dgmhup.gov.in/EN/covid19bedtrack

कंट्रोल रूम से लेकर सोशल मीडिया हर माध्यम पर मदद की गुहार

जानकीपुरम में एक मरीज की तबियत खराब हुई‚ तो परिजनों ने ड़ाक्टर से सम्पर्क किया है। मरीज से पहले से प्राइवेट पैथालॉजी से जांच करायी‚ जिसमें उनकी रिपोर्ट पॉजिटिव आयी। इस पर उन्हें कोविड़ अस्पताल में एड़मिट होने की सलाह दी गयी। प्रभावशाली व्यक्ति होने के नाते उनके परिचितों ने तमाम सिफारिशें की लेकिन बेड़ नहीं मिल पा रहा था। यह हालत एक मरीज की नहीं बल्कि कई मरीजों की है।

सोशल मीडिया पर परिजन अपने मरीजों के गिरते आक्सीजन का स्टेटस लगाते हैं और मदद की दरकार करते हैं लेकिन ग्रुप में समक्ष अधिकारी होने के बावजूद सहायत के लिए कोई संदेश नहीं आता है। सबसे ज्यादा किल्लत वेंटिलेटर मिलने की है।

बीते साल जब कोरोना के मरीजों में तेजी आयी थी तो स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों ने आनन–फानन में कई वेंटिलेटर खरीद डाले। इनको बलरामपुर‚ लोकबंधु व राम सागर मिश्र अस्पताल भेजा गया‚ ताकि कोरोना के गंभीर मरीजों का इलाज किया जा सके लेकिन ट्रेंड मैनपॉवर की कमी के चलते सभी वेंटिलेंटर का इस्तेमाल नहीं हो पाया। जिसके बाद अस्पताल द्वारा इनको एक कमरे में बंद कर दिया गया। वेंटिलेटर केवल शो–पीस बनकर रह गए है।

सरकारी अस्पतालों में स्टाफ के अभाव में वेंटिलेटर बने शो पीस

बक्शी का तालाब स्थित राम सागर मिश्रा चिकित्सालय के एक ड़ाक्टर बताते हैं कि दो वेंटिलेटर हैं लेकिन प्रशिक्षित स्टाफ की कमी है। ऐसे में अधिकारियों को इन वेंटिलेटर को चलाने के लिए जरूरी स्टॉफ भेजे या किसी दूसरे अस्पताल में शिफ्ट कराने के बारे में सोचना चाहिए‚ जहां इनका मरीजों के हित में उपयोग हो सके।

लोकबंधु अस्पताल को डेडिकेटेड कोविड अस्पताल बनाया गया है। यहां पर करीब 40 वेंटिलेटर है लेकिन चल महज तीन ही रहे है। अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक डा. अजय शंकर त्रिपाठी ने बताया कि वेंटिलेटर तो बहुत है लेकिन चलाने के लिए न तो 24 घंटे के लिए एनस्थेटिक है और न ही आईसीयू टेक्निशियन है।

फिलहाल‚ जितने संसाधनों में मरीजों को चिकित्सा सेवाएं दी जा रही है‚ वह मिसाल के रूप में देखना चाहिए। बलरामपुर अस्पताल में करीब 28 वेंटिलेटर हैं। यहां तीन सौ बिस्तरों का कोविड़ अस्पताल बनाया गया‚ जहां सभी बेड फुल बताये गये।

जरूरी स्टाफ की व्यवस्था करना कठिन

अस्पताल के निदेशक डा. एसके पांडेय ने बताया कि 13 बाइपेप और 5 वेंटिलेटर एक्टिव है‚ जबकि 10 वेंटिलेटर के लिए अलग से व्यवस्था की जा रही है। इसके लिए जरूरी स्टॉफ का भी इंतजाम किया जा रहा है। जल्द ही सभी वेंटिलेटर एक्टिव हो जाएंगे। फिलहाल‚ कोरोना के गंभीर मरीजों को उपचार मिलना कठिन हो रहा है।

मरीज और तीमारदार सवाल उठाते हैं कि जब यहां के आक्सीजन प्लांट और रेलवे से आक्सीजन के टैंकर आ रहे हैं तो फिर हालत में सुधार क्यों नहीं आ रहा है। इस संबंध में कोविड़ कमांड़ सेन्टर से जुड़े़ सक्षम अधिकारियों से सम्पर्क करने की कोशिश की गयी लेकिन किसी को मोबाइल बिजी तो किसी का बंद बताता रहा।

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