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सिद्धू ने आखिर क्यों दिया था इस्तीफा? इसका पूरा सच अब आया सामने

लखीमपुर खीरी में हुए कांड के बाद कांग्रेस इसका राजनीतिक फायदा उठाने की कोशिश में है, जिससे लंबे समय से पंजाब की राजनीति के कारण हो रही पार्टी की राष्ट्रीय फजीहत से लोगों का ध्यान भटकाया जा सके। ऐसे में योगी सरकार को सीधे निशाने पर लेने की साज़िश की जा रही हैं, लेकिन योगी सरकर के खिलाफ आक्रामकता अपनाने के चक्कर में कांग्रेस एवं राहुल गांधी ने पंजाब की राजनीति का पूरा कच्चा चिट्ठा खोल दिया है।

अब पंजाब और यूपी की राजनीति के बीच ये कैसा संबंध है चलिए ये आपको बताते हैं… दरअसल, लखीमपुर जाने के लिए राहुल गांधी ने जिन दो नेताओं का साथ लिया है, उसमें छत्तीसगढ़ के सीएम भूपेश बघेल के साथ पंजाब के सीएम चरणजीत सिंह चन्नी हैं, जिन्हें हाल ही में सीएम पद दिया गया है। ऐसे में ये माना जा रहा है कि पंजाब में सिद्धू को अब पार्टी में महत्व नहीं मिल रहा है, इसीलिए उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दिया था। हालांकि, उनके इस्तीफे का दांव हिट विकेट साबित हुआ है।

चन्नी को विशेष महत्व

कांग्रेस नेता और वायनाड से लोकसभा सांसद राहुल गांधी लखीमपुर-खीरी में चल रहे राजनीतिक कांड में अपने दौरे का तड़का लगाने पहुंचे थे, इस दौरान उत्तर प्रदेश की राजनीति में लाभ लेने की कोशिश तो की गई, लेकिन इस पूरे प्रकरण के बीच पंजाब की कलह एक झटके में ही सामने आ गई। इसकी वजह ये थी कि राहुल के साथ पंजाब के मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी की नज़दीकियाँ। जिन चन्नी को कल तक सिद्धू की कठपुतली माना जा रहा था, उन्हीं को राहुल अब हद से ज्यादा महत्व दे रहे हैं, तथा उन्हें दूसरे राज्यों की राजनीति में दखल करने के लिए भी अपने साथ ले जा रहे हैं। ये दिखाता है कि अब राहुल का विश्वास चरणजीत सिंह चन्नी पर ही दृढ़ हो गया है। यही कारण है कि कैबिनेट विस्तार के लिए भी चन्नी को ही बुलाया गया था। सिद्धू से दो बार राय जरूर ली गई, किन्तु अंतिम फैसला राहुल ने चन्नी के साथ बैठकर ही किया।

सिद्धू को तगड़ा झटका

नवजोत सिंह सिद्धू को लेकर हम पहले ही बता चुके हैं कि वो एक अपरिपक्व नेता हैं। ऐसे में उनके मनमुताबिक कैबिनेट और अधिकारियों की नियुक्तियां न होने के चलते उन्होंने प्रदेश अध्यक्ष के पद से इस्तीफा दे दिया था। उन्हें उम्मीद थी कि उनकी मांगों को तवज्जो मिलेगी, किन्तु स्थिति अचानक ही विपरीत हो गई। संभावनाएं हैं कि सिद्धू का इस्तीफा कांग्रेस आलाकमान मंजूर कर सकता है, और यदि ऐसा होता है, तो ये सिद्धू के लिए एक बड़ा झटका होगा। यही नहीं, खबरें ये भी हैं कि सिद्धू की जगह रवनीत सिंह बिट्टू को पंजाब कांग्रेस का प्रदेश अध्यक्ष बनाया जा सकता है।

सिद्धू का उद्देश्य था कि चरणजीत सिंह चन्नी उनके करीबी हैं, इसलिए वो उनकी ही बात सुनेंगे, तथा उनके इशारों पर कठपुतलियों की भांति नाचेंगे, किन्तु स्थिति विपरीत हो गई है। चन्नी ने सिद्धू को बाईपास करके सीधे कांग्रेस आलाकमान और राहुल गांधी तक पहुंच बना ली है। इसका नतीजा ये है कि सिद्धू न घर के रहे हैं न घाट के… कांग्रेस आलाकमान के अलावा चन्नी तक उन्हें महत्व नहीं दे रहे हैं।

यूज एंड थ्रो बने सिद्धू

सिद्धू की कांग्रेस में वर्तमान स्थिति को देखते हुए ये कहा जा सकता है कि वो यूज एंड थ्रो की भांति एक सामान बन गए हैं। कांग्रेस आलाकमान कैप्टन अमरिंदर सिंह की काट ढूँढने के लिए पंजाब की राजनीति में कोई मजबूत दावेदार चाहता था, और सिद्धू के रूप में उन्हें वो मिल भी गया था। साढ़े 4 सालों तक कैप्टन की आलोचना करने के बाद जब कैप्टन ने अपमान  के कारण इस्तीफा दिया तो सिद्धू को इस वफादारी के बदले प्रदेश अध्यक्ष का झुनझुना पकड़ा दिया गया। राहुल गांधी को पता था कि सिद्धू की राजनीतिक मंशाएं हैं, यही कारण है कि सिद्धू की नौटंकियों और राजनीतिक अस्थिरता के कारण हाईकमान ने सिद्धू को महत्व नहीं दिया।

अपने आप को अपमानित मान कर सिद्धू ने कैप्टन की भांति इस्तीफा दिया। उनका मानना था कि उन्हें पार्टी द्वारा मनाया जाएगा, किन्तु ऐसा नहीं हुआ, बल्कि दूसरे प्रदेश अध्यक्ष की तलाश शुरु हो गई है। सिद्धू चंडीगढ़ से लेकर पंजाब तक में लखीमपुर कांड पर राजनीतिक धरने तो कर रहे हैं, लेकिन राहुल के साथ केवल चन्नी ही दिख रहे हैं। ये संकेत है कि राहुल अब सिद्धू को तनिक भी भाव नहीं देने वाले… और संभवतः ये बात सिद्धू भी समझ गए हैं।

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