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हर पार्टी में होता है एक ‘जीतनराम मांझी’, ममता की TMC वाला भी जल्द सामने आएगा

कहते हैं कि इतिहास खुद को दोहराता है, लेकिन बिहार का इतिहास अब उसके पड़ोसी राज्य पश्चिम बंगाल में दोहराए जाने की संभावनाएं हैं। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के विधायक पद पर न होने के चलते उन्हें उप-चुनाव में जीत हासिल करनी ही होगी। समस्या ये है कि जीतने के लिए उपचुनाव का आयोजन भी तो होना चाहिए, जिसकी संभावनाएं फिलहाल बेहद कम है। ऐसे में ममता बनर्जी को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ सकता है, और ममता की जगह टीएमसी की तरफ से जो भी मुख्यमंत्री बनेगा, वो ममता को नाकों चने चबवा सकता है। ये ठीक वैसी ही स्थिति हो सकती है, जैसी बिहार में नीतीश के इस्तीफे के बाद जीतन राम मांझी के कारण बनी थी।

एक हार कैसे किसी राजनेता को राजनीतिक रूप से पूरी तरह अस्त-व्यस्त और बर्बाद कर सकती है, इसका सटीक उदाहरण ममता बनर्जी हैं। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में जीत के बाद चुनावी हिंसा से इतर अगर राजनीतिक एंगल से देखें; तो ममता के लिए ये विधानसभा चुनाव सबसे बुरा रहा है। इन चुनावों में टीएमसी तो पहले से ज्यादा सीटों से जीत गई, लेकिन ममता नंदीग्राम सीट भाजपा नेता सुवेंदु अधिकारी से हार गईं। ममता ने हार के बावजूद सीएम की कुर्सी भी संभाल ली, लेकिन दिक्कत ये है कि ममता को 6 महीने के भीतर यानी नवंबर तक विधायक का पद हासिल करना है। इसके इतर अभी चुनाव आयोग कोरोना के कारण किसी भी कीमत पर चुनाव कराने के मूड में नहीं हैं।

उपचुनावों की संभावनाएं न देख बीजेपी ने उत्तराखंड के सीएम तीरथ सिंह रावत का इस्तीफा लेकर पुष्कर सिंह धामी को सीएम बना दिया। ऐसे में टीएमसी नेता उपचुनाव कराने के अनुरोध के साथ चुनाव आयोग के पास जाने वाले हैं, लेकिन क्या आयोग मान जाएगा? शायद नहीं, क्योंकि इसकी संभावनाएं बेहद कम हैं। ऐसे में ममता को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ सकता है, और ये ममता के लिए उनके राजनीतिक जीवन का सबसे बड़ा झटका हो सकता है।

ममता को अपनी गैर-मौजूदगी में किसी अन्य नेता को सीएम की कुर्सी देनी पड़ेगी और कुर्सी देने का यही खेल टीएमसी में फूट की वजह बन सकता है। इस मामले में सबसे पहला नाम सभी के मन में ममता के भतीजे अभिषेक बनर्जी का ही आएगा, लेकिन उनके साथ भी वही समस्या होगी जो कि तीरथ सिंह रावत के साथ थी; क्योंकि वो भी लोकसभा से सांसद हैं। ऐसे में उन्हें भी चुनाव तो लड़ना ही पड़ेगा,  इसलिए ममता को किसी अन्य नेता को मुख्यमंत्री बनाना पड़ेगा। ये ठीक वैसी ही स्थिति होगी, जैसी बिहार के सीएम नीतीश कुमार के साथ 2015 में हुई थी।

नीतीश कुमार ने एनडीए गठबंधन से अलग होने के बाद साल 2014 में दलित वोटों को साधने के लिए अपने सबसे भरोसेमंद जीतन राम मांझी को सीएम बनाया था, लेकिन जब नीतीश ने दोबारा सीएम बनना चाहा; तो मांझी ने नीतीश के लिए मुश्किलें खड़ी कर दीं और बगावत कर डाली। ऐसे में जेडीयू को भी नुकसान हुआ और नीतीश पर दलित विरोधी होने का टैग तक लग गया। अब यही इतिहास यदि बंगाल में दोहराया जाता है तो इसमें ममता की दिक्कतें बढ़ जाएंगी।

टीएमसी नेताओं को पता है कि जब तक ममता सक्रिय रहेंगी, तब तक वो किसी अन्य नेता को उत्तराधिकारी नहीं बनाएंगी। वहीं टीएमसी नेताओं को ये डर भी है कि ममता के बाद अभिषेक बनर्जी ही पार्टी अपने हाथ में ले लेंगे। यही कारण है कि ममता के सीएम पद से इस्तीफा देने के बाद टीएमसी के कई राजनीतिक महत्वाकांक्षा रखने वाले नेता सक्रिय हो सकते हैं जो पार्टी में होने के बावजूद ममता का दबे मुंह विरोध करते हैं।

यदि ममता के दबे विरोधी के पास बंगाल के सीएम पद की कमान जाती है; तो ये कहा जा सकता है कि पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की पार्टी में एक बड़ी टूट हो सकती है। टीएमसी की इस टूट के चलते पार्टी से एक नया जीतन राम मांझी बन सकता है, जैसे बिहार में मांझी के कारण नीतीश को दिक्कत हुई थी; ठीक वैसी ही समस्या ममता के साथ खड़ी हो सकती है।

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