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यूपी: पंचायत अध्यक्ष के चुनाव में 400 करोड़ की लगी बोली, 25 लाख तक बिके सदस्य

लखनऊ. सत्ता व धनबल के बूते प्रदेश में जिला पंचायत अध्यक्ष की सीटों पर कब्जे के लिए जोरआजमाइश तेज हो गई है। खुलेआम सदस्यों के 10 से 25 लाख रुपए में खरीद फरोख्त की कोशिश से उम्मीद लगाई जा रही है कि तकरीबन 400 करोड़ की ब्लैकमनी अध्यक्ष के निर्वाचन पर खर्च हो जाएगी। इस बीच मंगलवार को चार प्रत्याशियों के नामांकन पत्र वापस ले लेने व पूर्व में 18 सीटों पर मात्र एक एक उम्मीदवारों के पर्चा भरने के कारण अब मात्र 53 जिलों में 3 जुलाई को मतदान होगा।

ऐेसा माना जा रहा है कि पंचायत चुनाव में सत्ताधारी दल भाजपा के खराब प्रदर्शन के बाद अब वे अध्यक्ष की कुर्सी पर कब्जा जमाने में कोई कसर छोड़ना नहीं चाहती है।लोगों का मानना है कि सपा के कार्यकाल में भी ऐसे ही खेल खेले गए।भाजपा के अपनी हुकूमत में स्वच्छ राजनीतिक संस्कृति की मिशाल पेश करने के बजाए ये तिकड़म में और आगे निकल गई है।

आज नामांकन वापसी के समय चार जिलों में भाजपा के समर्थन में उम्मीदवारों ने नाम वापस ले लिए। पूर्व में एक-एक नामांकन पत्र दाखिल होने से 17 सीटों पर भाजपा व एक सीट पर सपा की जीत सुनिश्चित हो गई थी। शाहजहांपुर में सपा की जिला पंचायत अध्यक्ष पद की प्रत्याशी वीनू सिंह ने भाजपा की सदस्यता ले ली। भाजपा के पास अब पीलीभीत, शाहजहांपुर ,बहराइच के साथ सहारनपुर की सीट भी आ गई है।

जिला पंचायत अध्यक्ष सहारनपुर के चुनाव में अध्यक्ष पद के लिए नामांकन करने वाले बसपा समर्थित जॉनी कुमार जयवीर ने जिला निर्वाचन अधिकारी के समक्ष पहुंच कर अपना नामांकन पत्र वापस ले लिया। उनके नामांकन वापसी लेने के साथ ही जिला पंचायत में भाजपा के मांगेराम काबिज होंगे। 53 जिलों में से 37 जिलों में सिर्फ 2, 11 जिलों में 3, 4 जिलों में 4 और 1 जिले में 5 उम्मीदवारों ने नामांकन किया है।

ऐसे में जिन 38 जिलों में दो-दो उम्मीद वारों नें नामांकन किया है, उसमें मथुरा से रालोद, रायबरेली से कांग्रेस और अन्य सभी सीटों पर भाजपा की सपा से ही टक्कर होगी। अब भाजपा के 21 तथा समाजवादी पार्टी के एक निर्विरोध अध्यक्ष हो गए हैं। तीन जुलाई को 53 सीटों पर मतदान होगा।

उत्तर प्रदेश रिहाई मंच के महासचिव राजीव यादव कहते हैं कि यह चुनाव पुरी तरह खरीद फरोख्त पर आधारित है।इसमें जीत के लिए रकम लगानेवाला उससे सौगुना कमाने की उम्मीद रखता है।इसी लिहाज से पैसा लगाता है। पूर्व में भी यह खेल होते रहा है।

सपा ने जिस खेल को खेला उसी को भाजपा के राज में सवर्ण सामंती ताकतें सत्ता के सह पर कुछ और तेजी से कर रही है।इससे हमारा लोकतंत्र व लोकतांत्रिक संस्थाओं का अस्तित्व ही समाप्त हो जाता है।इसमें पहले आम मतदाता खरीदा जाता है।इसके बाद ये फिर खुद बिकते हैं।

सपा के लखीमपुर खिरी के पूर्व जिलाध्यक्ष क्रांति कुमार सिंह ने आरोप लगाया कि सत्ता के बल पर पुलिस के द्वारा मतदाताओं को धमकाया जा रहा है। अपनी पत्नी की हत्या के आरोप में लखीमपुर खिरी का भाजपा प्रत्याशाी ओमप्रकाश भार्गव 2 साल 9 माह बाद जमानत पर बाहर आया है।उसके संरक्षण में पुलिस लगी है।सपा के पक्ष में मतदान की घोषणा करने पर सीतापुर में जिला पंचायत सदस्य अर्जुनलाल के खिलाफ फर्जी मुकदमा कर भाजपा के पक्ष में वोट देने के लिए दबाव बनाया जा रहा है।

वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद गिरी ने कहा कि देवरिया में भाजपा व सपा के बीच मुकाबले में सदस्यों के खरीद फरोख्त जारी है।जिसमें दोनों पक्ष लगा हुआ है। उधर सपा नेता आरोप लगा रहे हैं कि सदस्यों को भाजपा के पक्ष में वोट देने के लिए पुलिस खुद दबाव बना रही है।सपा के पूर्व जिलाध्यक्ष के घर छापामारी व बेटे पर फर्जी मुकदमा दर्ज कर पुलिस प्रताड़ित करने की कोशिश कर रही है।इसका एकमात्र मकसद भाजपा के पक्ष में मतदान कराना है।

पंचायत प्रतिनिधि महासंघ के प्रदेश अध्यक्ष डा चतुरानन ओझा कहते हैं कि इन चुनावों में सपा जो सताबल व धनबल का खेल खेलती थी।उसके खिलाफ लोगों ने एक नए माहौल के लिए भाजपा को वोट दिया। लेकिन इस सरकार में सत्ता का यह खेल खुलेआम चल रहा है।सदस्यों के अपने पक्ष में मतदान कराने के लिए दस से पंद्रह लाख रूपयों के अलावा प्रलोभन के विभिन्न तरीके अपनाए जा रहे हैं।

जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव में एक अनुमान के मुताबिक सदस्यों के खरीद फरोख्त पर 400 करोड़ से अधिक की काली कमाई खर्च होने की उम्मीद है।ये आमतौर सदस्यों को वोट के लिए दस से 15 लाख की हो रही पेशकश के आधार पर गणना की जा रही है।हालांकि बहुत सारे स्थानों पर वोट के रिश्वत की रकम 25 लाख तक भी है।ऐसे में 400 करोड़ रूपये की खपत को जानकार अभी कम ही मान रहे हैं।

सत्ता बदली पर कुर्सी का खेल रहा बरकरार

1995 में पहली बार 73वां संविधान संशोधन लागू होने के बाद अध्यक्ष और प्रमुख के चुनाव हुए थे तो उस समय भी तत्कालीन सपा सरकार ने ताकत और सत्ता बल पर तीन चैथाई पदों पर कब्जा किया था। यह प्रक्रिया 2000 भाजपा सरकार, 2005 सपा सरकार, 2010 बसपा सरकार और 2015 में फिर सपा सरकार में जारी रहा। ऐसे में सत्ता बदलती रही व पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी पर कब्जा के लिए ये खेल निरंतर जारी रहा। आज सपा, भाजपा पर आरोप लगा रही है लेकिन सपा सरकार में भी 36 जिला पंचायत अध्यक्ष और 279 ब्लॉक प्रमुख निर्विरोध चुने गए थे। इन दोनों पदों पर सामान्यतया जिले का जो प्रभावशाली नेता होता है उसके परिवार के सदस्य रिश्तेदार या फिर डम्मी प्रत्याशी काबिज होते हैं।

इन दोनों पदों की खूबसूरती यह है कि सत्ता परिवर्तन के साथ ही जिला पंचायत अध्यक्ष और ब्लॉक प्रमुख सत्ता के साथ जुड़ जाते हैं और अगर नहीं जुड़ते तो नई सत्ता उन्हें अविश्वास प्रस्ताव के माध्यम से हटा करके अपने दल के किसी भी बाहुबली धनबली को अध्यक्ष और प्रमुख बना देती है। यह दोनों पद राजनीति के भ्रष्टतम चरित्र का सबसे बड़ा उदहारण है। पंचायती राज व्यवस्था की मंशा को सभी राजनीतिक दल बसपा, सपा, भाजपा, कांग्रेस ने मिलकर मटियामेट किया है।

सत्ता में आने पर किसी ने भी सीधे निर्वाचन पर नहीं दिया जोर

किसी राजनीतिक दल की हैसियत नहीं है कि वह जिला पंचायत अध्यक्ष और ब्लॉक प्रमुख का चुनाव शहरी निकायों के मेयर एवं नगर पालिका परिषद् और नगर पंचायत के अध्यक्षों की तरह सीधे करा सके। वर्तमान हालात में बसपा मुखिया ने चुनाव में अनियमितता के कारण लड़ने से मना कर दिया और अध्यक्ष और प्रमुख का पद सीधे जनता से चुनाव कराने का मांग कर रही हैं। ऐसी ही मांग सपा सरकार में अध्यक्ष और प्रमुख पदों पर जब सपाई कब्जा कर रहे थे तब भाजपा ने मांग की थी। योगी आदित्यनाथ सरकार में भी जिनका तीन चैथाई का बहुमत है उसी तर्ज का तांडव वैसी ही गुंडागर्दी, खरीद-फरोख्त का आचरण कर रही है जैसा पूर्व सरकारों में होता रहा है।

पंचायतें ग्राम पंचायत से लेकर क्षेत्र पंचायत जिला पंचायत सभी एक लूट का अड्डा बन गयी है। जो भी आता है प्रधान हो प्रमुख हो जिला पंचायत अध्यक्ष हो अपने अपने तरीके से लुटता है और फिर कार्यकाल पूरा होने पर नए चुनाव की तैयारी और लूटने की प्रत्याशा में गोटे बिछाना शुरू कर देता हैं। जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव में सत्ताबल, धनबल, बहुबल का प्रयोग हो रहा है ऐसा ही प्रयोग ब्लॉक प्रमुख चुनाव में होगा। दोनों पदों पर चुनाव के बाद विधानसभा के चुनाव होंगे और जो भी सरकार होगी उसके अनुसार इन पदों का समायोजन फिर से शुरू हो जायेगा।

योगी सरकार की तरह 2016 में जब दो तिहाई से अधिक पदों पर तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने अध्यक्ष और प्रमुख पदों पर कब्जा किया था तो इसे जनादेश बताते हुए 2017 में पूर्ण बहुमत सरकार बनाने के घोषणा की थी। लेकिन 2017 में सपा का हश्र क्या हुआ ? मात्र 47 सीटों पर सिमट गई। योगी आदित्यनाथ एवं भाजपा के नेताओं को भी इतिहास से सीखना चाहिए। जिला पंचायत अध्यक्ष और प्रमुख चुनाव की जीत को जनादेश नहीं मानना चाहिए क्योकि विधानसभा चुनाव का अध्यक्ष और प्रमुख चुनाव से कोई तुलना नहीं हो सकती है।

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