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CCP की बैठक में शामिल हुए येचुरी, देवराजन और राजा, आखिर क्या कहलाता है ये रिश्ता?

नई दिल्ली.  भारत के वामपंथी दलों के नेता 1 जुलाई को चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CPC) के 100वें स्थापना दिवस पर आयोजित कार्यक्रम में शामिल हुए। नई दिल्ली में चीनी दूतावास की तरफ से आयोजित ऑनलाइन प्रोग्राम में सीपीएम महासचिव सीताराम येचुरी, सीपीआई महासचिव डी राजा और फॉरवर्ड ब्लॉक के जी देवराजन के अलावा डीएमके सांसद डीएनवी सेंथिलकुमार ने भी हिस्सा लिया। चीनी राजदूत सुन विडोंग ने इसकी जानकारी दी। इस पर बीजेपी ने तीखी प्रतिक्रिया दी। पार्टी सांसद दिलीप घोष ने देश के प्रति वाम दलों की निष्ठा पर सवाल उठाते हुए कहा कि भारतीय परंपराओं और संस्कृति को खारिज करना कम्युनिस्ट पार्टियों की फितरत है। यहां तक कि चीन के साथ जंग में भी कम्युनिस्ट पार्टियां भारत के बजाय उसके साथ खड़ी थीं।

वाम दलों की निष्ठा पर पहले भी उठे हैं सवाल
दरअसल, वाम दलों पर इस तरह का आरोप पहली बार नहीं लगा है। पहले भी वामपंथी पार्टियों ने कुछ बड़े और निर्णायक मौकों पर अपने विरोधियों को ऐसे आरोप लगाने के अवसर दिए हैं। वाम दल ने देश के प्रति निष्ठा पर संदेह का सबसे बड़ा मौका 1962 में भारत-चीन युद्ध के वक्त दिया। तब कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (CPI) में इस बात पर अंदरूनी कलह हो गई थी कि पार्टी को भारत की जवाहरलाल नेहरू सरकार का साथ देना चाहिए या फिर चीन की साम्यवादी सरकार का जिसके विचारों को वह अपना आदर्श मानता है। इसी मतभेद ने पार्टी को दो टुकड़ों में बांट दिया और 1964 में चीनी समर्थक गुट ने सीपीआई से अलग होकर कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सिस्ट) यानी CPI(M) बना लिया था।

विरोधियों को मौका देती रही हैं वामपंथी पार्टियां
वैसे वाम दलों द्वारा देश और विचारधारा के बीच टकराव की स्थिति में देशहित को ठुकराने की यह पहली घटना नहीं थी। महात्मा गांधी ने द्वितीय विश्वयुद्ध में फंसी ब्रिटिश सरकार को घुटनों पर लाकर भारत की आजादी की मांग मनवाने के लिए सन 1942 में ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ का आह्वान किया था। बापू के नेतृत्व में देश के कोने-कोने से ‘अंग्रेजों, भारत छोड़ो’ का नारा बुलंद हो रहा था, उस वक्त भी कम्युनिस्ट पार्टी ने ब्रिटेन का साथ देने का फैसला किया और उस जनआंदोलन से खुद को अलग कर लिया जो भारतीय स्वाधीनता संग्राम की सबसे मजबूत कड़ियों में एक थी। फिर भी उनकी निष्ठा पर सवाल करने से पहले भारत में कम्युनिस्ट पार्टी के गठन से लेकर इसके महत्वपूर्ण पड़ावों से गुजरते हुए कम्युनिस्ट मूवमेंट के वैश्विक परिदृश्य पर एक नजर डालना जरूरी है। तब शायद इस सवाल का जवाब मिल सके कि आखिर देश के प्रति उनकी निष्ठा पर सवाल क्यों उठते रहते हैं।

गठन के वक्त ही सामने आया था देश बनाम विचारधारा का यक्ष प्रश्न

कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया यानी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) की शुरुआत 17, अक्टूबर 1920 को तत्कालीन सोवियत संघ के एक शहर और मौजूदा उज्बेकिस्तान की राजधानी ताशकंद में हुई थी। इसकी स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले मानवेंद्र नाथ राय (M. N. Roy) अमेरिकी कम्युनिस्ट थे जिन्होंने पहले सोशलिस्ट वर्कर्स पार्टी के नाम से मैक्सिको की कम्युनिस्ट पार्टी का गठन किया था। उनके एक सहयोगी अबानी मुखर्जी की महिला मित्र रोजा फिटिंगॉफ रूसी कम्युनिस्ट थीं।

बाद में जब पार्टी के संचालन में मुश्किलें आईं तो ताशकंद में बनी पार्टी की भारत में दोबारा स्थापना की दरकार महसूस हुई ताकि भारतीय कम्युनिस्टों को एकजुट किया जा सके। इसके लिए 26 दिसंबर, 1925 को कानपुर में एक बैठक हुई जिसके आयोजन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले नेता सत्यभक्त ने पार्टी का नाम ‘इंडियन कम्युनिस्ट पार्टी’ रखने का सुझाव दिया, लेकिन कन्वेंशन ऑफ इंटरनैशनल कम्युनिस्ट मूवमेंट की पॉलिसी कहती थी कि कम्युनिस्ट पार्टियों के नाम के बाद देश का नाम आना चाहिए। इस तरह, दूसरे नेताओं ने सत्यभक्त का सुझाव खारिज कर दिया और ‘कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया’ के नाम पर ही सहमति बनी।

जयप्रकाश नारायण भी हुए थे नाराज
ब्रिटिश सरकार ने सन 1934 में जब सीपीआई पर प्रतिबंध लगा दिया तो उसी वर्ष जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी के समाजवादी धड़े के रूप में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी (CSP) का गठन हुआ। कम्युनिस्टों को कांग्रेस की इस समाजवादी शाखा के जरिए अपनी राजनीति चलाते रहने का विकल्प सूझा। पार्टी की दक्षिणी भारत में अच्छी पकड़ थी, इसलिए कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी ने भी उसे अपने खेमे में जगह दे दी। लेकिन, मौका मिलते ही कम्युनिस्ट सीएसपी के अंदर अपनी विचारधारा फैलाने की जुगत में जुट गए। इस कारण जयप्रकाश नारायण समेत पार्टी के कई अन्य नेताओं के मन में कम्युनिस्टों के प्रति दुराव पैदा हो गया। नतीजतन, जयप्रकाश नारायण ने 1940 में कांग्रेस की रामगढ़ बैठक में कम्युनिस्टों को बाहर का दरवाजा दिखा दिया।

भारत छोड़ो आंदोलन का विरोध
जैसा कि ऊपर बताया जा चुका है कि कम्युनिस्ट पार्टी ने महात्मा गांधी के ‘अंग्रेजों, भारत छोड़ो’ के आह्वान के खिलाफ ब्रिटिश सरकार का साथ दिया था क्योंकि वो द्वितीय युद्ध में ब्रिटिश सरकार को कमजोर नहीं करना चाहते थे। ब्रिटेन, सोवियत संघ, फ्रांस और अमरीका के गुट में था जो जर्मनी, इटली और जापान के गुट से मोर्चा ले रहा था। एक तो ब्रिटेन का सोवियत संघ के खेमे में होना और दूसरी तरफ उनका जर्मनी की नाजी सेना के खिलाफ युद्ध करना, दोनों ही कम्युनिस्टों की विचारधारा के अनुकूल थे। इसलिए, उन्हें यह फैसला करने में थोड़ी भी उलझन नहीं हुई। उन्होंने द्वितीय विश्वयुद्ध को ‘जनता का युद्ध’ बताकर ब्रिटिश सरकार के समर्थन में भारत छोड़ो आंदोलन का विरोध किया।

चीनी क्रांति का भारत में वामपंथ पर प्रभाव

सन 1949 में माओ त्से तुंग ने चीन में सशस्त्र क्रांति करके दुनिया के सामने साम्यवादी आंदोलन का नया स्वरूप पेश किया। तब भारत की आजादी के महज दो वर्ष हुए थे। कम्युनिस्टों ने आजादी मिलते ही प्रस्ताव पास करके कहा था कि भारत के लोगों को आजादी नहीं मिली है, सिर्फ सत्ता ट्रांसफर हो गई है। तब सोवियत संघ नेहरू सरकार का समर्थन कर रहा था। ऐसे में 1947 की उपलब्धि को भारत की आजादी मानने से इनकार करने वाले कम्युनिस्ट धड़े को दो साल बाद ही माओवादी चीन के नेतृत्व से आस जग गई। माओवाद ने दुनियाभर के कम्युनिस्टों को भी प्रभावित किया और अंतरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट संस्था ने अपना नाम बदलकर कॉमइंटरनैशनल की जगह कॉमनीइन्फॉर्म रख लिया। नए रंग रोगन की संस्था का नेतृत्व चीनी समर्थकों के हाथों में जाने लगा तो भारत की कम्युनिस्ट पार्टी में भी यह बदलाव साफ महसूस किया जाने लगा।

जब रूस दौड़ पड़ते थे कम्युनिस्ट
चीनी क्रांति ने भारत के कम्युनिस्टों का सशस्त्र क्रांति में विश्वास मजबूत कर दिया। इस कारण, आजादी को छलावा मानने वाले कम्युनिस्ट नेताओं के गुट ने चीन की नीतियों को अपनाकर संघर्ष करने की ठानी। वो तेभागा और पुनप्पा-वलायर जैसे सशस्त्र किसान आंदोलनों की सफलता से कम्युनिस्ट फूले नहीं समा रहे थे। तेलंगाना में करीब तीन हजार गांवों को निजाम के अधिकार से मुक्त करा लिया गया। इस कारण कम्युनिस्टों को लगा कि इस तरह का आंदोलन पूरे देश में खड़ा हो जाए तो भारत में चीन जैसी सशस्त्र क्रांति होगी और यहां कम्युनिस्ट शासन का सपना पूरा हो जाएगा।

लेकिन, कम समय में ही उन्हें यह अहसास हो गया कि निजाम के चंगुल से मुक्ति दिलाने और भारतीय सेना का सामना करने में जमीन-आसमान का फर्क है। ऐसे में उनके सामने सशस्त्र क्रांति का भविष्य तय करने का बड़ा सवाल खड़ा हुआ और चार नेताओं, एम. बासवापुनैया, अजॉय घोष, एस.ए. डांगे और चंद्र राजेश्वर राव का एक गुट स्टालिन से सलाह लेने रूस पहुंच गया। ध्यान रहे कि 1920-21 में तुर्की पर ब्रिटिश आक्रमण का विरोध और खलीफा के शासन की वापसी की मांग के लिए भारत में खिलाफत आंदोलन चला था। उस वक्त मोहम्मद अली और मोहम्मद शफीक भी आंदलोन के लिए समर्थन जुटाने रूस गए थे।

चीन से नजदीकी का आरोप और इतिहास

बहरहाल, भारत के कम्युनिस्टों पर मोआवादी चीन का इतना असर हुआ कि पार्टी नेता यहां तक कहने लगे थे कि ‘चीन में पार्टी का चेयरमैन ही भारत में भी पार्टी का चेयरमैन’ है। 1957 में जब केरल में दुनिया की पहली चुनी हुई साम्यवादी सरकार का गठन हुआ तो भारत के कम्युनिस्ट ने नारा दिया- चीन की नीतियां हमारी नीतियां होंगी। अति तो तब हो गई जब 1962 में भारत का चीन के साथ युद्ध छिड़ गया और कम्युनिस्ट पार्टी का एक धड़ा चीन के साथ खड़ा हो गया। इसके नतीजा सीपीआई में विभाजन और सीपीएम के उदय के रूप में सामने आया।

कम्युनिस्ट पार्टी का पहला बंटवारा होने में भले ही करीब 40 वर्ष लग गए, लेकिन आगे बहुत जल्दी-जल्दी खेमे पर खेमे बनते गए और पार्टियों में विभाजन होता गया। इन सभी विभाजनों की जड़ में चीन की नीतियों से नजदीकियां थीं। जिसने भी खुद को चीन से ज्यादा नजदीक पाया, अलग राजनीतिक दल बना लिया और जिन्हें थोड़ी सी भी दूरी बर्दाश्त नहीं थी, उन्होंने हथियारबंद गुट बना लिए। चारू मजुमदार और कानू सान्याल के नेतृत्व में पश्चिम बंगाल में सिलिगुड़ी के पास नक्सलबाड़ी गांव में स्थानीय जमींदारों के खिलाफ हिंसक आंदोलन शुरू हो गया। तब चाइना डेली मॉर्निंग स्टार अखबार ने खुशी जताते हुए लिखा कि उम्मीद है, यह जल्दी ही पूरे भारत में फैल जाएगा। कहना न होगा कि भारत के कम्युनिस्ट इस उम्मीद पर बहुत हद तक खरे उतरे। देश के कई राज्यों में आग की तरह फैले नक्सलबाड़ी आंदोलन ने ऐसे-ऐसे भयावह रूप अख्तियार किए जिसने इंसानी खून की नदियां बहा दीं।

आरएसएस-बीजेपी हमेशा हमलावर

आप बेशक पूछ सकते हैं कि ‘भारत की कम्युनिस्ट पार्टियों की चीन के साथ का यह रिश्ता क्या कहलाता है?’ बीजेपी के तेज-तर्रार प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी भी कह चुके हैं कि यह इंडियन कम्युनिस्ट पार्टी नहीं, कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया है। यह नाम ही बताता है कि भारत का कोई राजनीतिक दल नहीं है बल्कि किसी विदेशी राजनीतिक दल की भारत में खुली एक शाखा है। स्वाभाविक है कि इसकी प्राथमिक निष्ठा भारत के प्रति नहीं हो सकती है।

उधर, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (RSS) के संस्थापक एम. एस. गोलवलकर ने भी अपनी पुस्तक ‘बंच ऑफ थॉट्स’ (हिंदी में ‘विचार नवनीत’) में भारत और भारतीयता पर तीन सबसे बड़े खतरों में एक, वामपंथ और वामपंथियों को ही बताया है। लेकिन इन सब आरोपों के बीच हमें यह ध्यान भी रखना होगा कि आजादी से 25 वर्ष पूर्व मद्रास के कम्युनिस्ट लीडर सिंगारावेल चेट्टियार ने 1922 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के गया अधिवेशन में संपूर्ण स्वराज की घोषणा की थी और अचानक चर्चा में आ गए थे। ब्रिटिश सरकार भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) की गतिविधियों से इतना तंग आ गई थी कि उसने पार्टी पर प्रतिबंध ही लगा दिया था जो 23 वर्ष कायम रहा था।

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