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उस आग में एकसाथ जल रहे चीन और पाकिस्तान, जिसमें वो जलाना चाहते थे हिंदुस्तान

अफगानिस्तान में तालिबान का बढ़ता कब्ज़ा अब विश्व के लिए एक चुनौती बन चुका है। सबसे अधिक असर पाकिस्तान और चीन पर देखने को मिल रहा है। हैरानी की बात यह है कि चीन ने अफगानिस्तान में तालिबानी वर्चस्व को बढ़ता देख अब भारत के साथ भी status quo बनाये रखने की अपील की है। हालांकि, यह समझना आवश्यक है कि अफगानिस्तान में जिस तालिबान को चीन और पाकिस्तान ने अप्रत्यक्ष रूप से समर्थन कर भारत के प्रभाव को कम करने की कोशिश की, आज वही तालिबान उनके गले में अटकी सबसे बड़ी हड्डी बन चुका है।

दरअसल, SCO बैठक से अलग चीन के विदेश मंत्री और भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने बातचीत की जिसमें भारत और चीन के बॉर्डर पर चल रहे विवाद को सुलझाने के प्रयासों पर बातचीत हुई। चीन ने रुख को दोहराते हुए कहा कि वह चीन-भारत सीमा स्थिति के लिए जिम्मेदार नहीं था। हालांकि, वांग ने यह भी कहा कि “चीन उन मुद्दों के पारस्परिक रूप से स्वीकार्य समाधान की तलाश करने के लिए तैयार है, जिनके लिए भारतीय पक्ष के साथ बातचीत और परामर्श की तत्काल आवश्यकता है।”

चीन का यह बयान ऐसे समय में आया है जब अफगानिस्तान में तालिबान पूर्ण रूप से कब्ज़ा कर रहा है। अफगानिस्तान के तालिबान को देखते हुए पाकिस्तान तालिबान भी एक्टिव हो चुका है जिससे पाकिस्तान में चल रहे चीनी परियोजनाओं के लिए भी खतरा पैदा हो गया है। इस बात को लेकर चिंता बढ़ रही है कि उत्तर पश्चिमी चीन का शिनजियांग उइगर स्वायत्त क्षेत्र अफगानिस्तान की सीमा पर Wakhan (वाख़ान) कॉरिडोर से घुसपैठ कर आतंकवाद के पुनरुत्थान का सामना कर रहा है।

चीन अफगानिस्तान के साथ अपने अशांत शिनजियांग प्रांत में छोटी सीमा रेखा साझा करता है। ऐसी खबरें आ रही हैं कि तालिबान चीनी कम्युनिस्ट शासन का विरोध करने वाले उइगर मुस्लिम समूहों के प्रति सहानुभूति रखता है। चीन को डर है कि तालिबान, जो एक बार अफगानिस्तान में कब्ज़ा कर चुका है, पूर्वी तुर्किस्तान इस्लामिक मूवमेंट (ETIM) की मदद कर सकता है। ETIM शिनजियांग में एक अलगाववादी समूह है, जो चीन में उइगर मुसलमानों का घर है। शिनजियांग की सीमाएं अफगानिस्तान के बदख्शां प्रांत से लगती हैं जिसे तालिबान ने हाल ही में अफगान सरकारी बलों से जब्त कर लिया था।

यही नहीं टीटीपी चीन के खिलाफ बयान जारी कर चीन में उइगर मुसलमानों के उत्पीड़न की निंदा भी कर चुका है। ETIM (ईस्ट तुर्किस्तान इस्लामिक मूवमेंट) से जुड़े कई उइगर उग्रवादियों ने सीरिया से अब अफगानिस्तान के Badakshan प्रांत में आ चुके हैं जो शिनजियांग के बगल में ही है। Badakshan प्रांत चीन के साथ संकरे Wakhan corridor से जुड़ता है, जिसका उपयोग उइगर आतंकवादी शिनजियांग में प्रवेश के लिए कर सकते हैं। यही नहीं चीन के लिए पाकिस्तानी तालिबान भी खतरा पैदा कर रहा है।

बुधवार को उत्तर पश्चिमी पाकिस्तान में एक बस में हुए विस्फोट में मारे गए 13 लोगों में नौ चीनी नागरिक भी शामिल थे। यह बस खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में Dasu डैम निर्माण स्थल पर चीनी इंजीनियरों, सर्वेक्षकों और यांत्रिक कर्मचारियों को ले जा रही थी। इस हमले में 24 चीनी नागरिक घायल भी हुए। आशंका जताई जा रही है कि इस हमले के पीछे भी पाकिस्तानी तालिबान ही हो सकता है।

अप्रैल में, पाकिस्तानी तालिबान ने दक्षिण-पश्चिम बलूचिस्तान में चीनी राजदूत की मेजबानी करने वाले एक लक्जरी होटल में एक घातक आत्मघाती विस्फोट की जिम्मेदारी ली थी।

इस आतंकी समूह ने हाल ही में न केवल अफगानिस्तान सीमा पर पाकिस्तान के अशांत कबायली इलाकों में और राजधानी इस्लामाबाद सहित देश के शहरों में भी कई हमलों का दावा किया है। हाल के महीनों में इस बात के संकेत मिले हैं कि पाकिस्तान तालिबान अफगान सीमा पर फिर से संगठित हो रहा है, सुरक्षा अधिकारियों के साथ लगातार संघर्ष का दावा कर रहा है। बीजिंग ने हाल के वर्षों में देश के बुनियादी ढांचे को  बढ़ावा देने के लिए पाकिस्तान में अरबों डॉलर निवेश किये हैं, परन्तु अब उन्हीं परियोजनाओं को पाकिस्तानी तालिबान से खतरा पैदा हो चुका है।

तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान यानी TTP आतंकवादी वर्तमान में अफगान तालिबान को अफगानिस्तान पर त्वरित कब्जा हासिल करने में मदद कर रहे हैं और सत्ता में वापसी के बाद एहसान की उम्मीद करेंगे।

टीटीपी और अफगान तालिबान के इस पुनर्मिलन ने चीन की चिंताओं को भी बढ़ा दिया है, क्योंकि बाद में खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में जलविद्युत उत्पादन और बुनियादी ढांचे के विकास में कई परियोजनाओं को क्रियान्वित किया जा रहा है। टीटीपी ने खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान प्रांतों में कई चीनी नागरिकों का अपहरण और हत्या कर दी है।

पाकिस्तान और चीन अफगान तालिबान को समर्थन कर अफगानिस्तान में एक राजनीतिक एजेंडा चलाते हुए भारत को अस्थिर करने का प्रयास करते हैं। परन्तु टीटीपी, अल-कायदा, आईएस और अन्य शरिया-आधारित इस्लामिक राज्य की स्थापना के लिए अब पाकिस्तान और चीन जैसे देशों के लिए अब खतरा बन चुका है जो कई लोगों को पसंद नहीं आएगा।

पाकिस्तान के सीमावर्ती क्षेत्रों से टीटीपी को बाहर करने के लिए भविष्य में कोई भी सैन्य अभियान अब और अधिक कठिन होगा क्योंकि टीटीपी आतंकवादी आसानी से अफगानिस्तान में शरण लेने में सक्षम होते हैं तथा अब तो उनके ही बड़े भाई अफगान तालिबान का शासन होगा। देखा जाये तो यह कहना गलत नहीं होगा कि चीन और पाकिस्तान सचमुच उस आग में जल रहे हैं जिसमें वे भारत को खत्म करना चाहते थे।

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