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पिता की मौत पर मां ने गिरवी रखी कंठी, वो भी चल बसी तो ग्रामीणों ने गहने छुड़वाकर बच्चों को सौंपे

जोधपुर : काेराेना की दूसरी लहर कई परिवारों के लिए सुनामी की तरह थी जो उन्हें जीवन भर का दर्द दे गई। ऐसा ही एक परिवार है शहर के नजदीकी गांव बिरड़ावास का। यहां चौकीदारों की ढाणी के एक घर में रहने वाले 12 साल के मुकेश और 10 साल के सुनील एक साल में अपने मां और पिता दोनों को गंवा चुके हैं। मुकेश ने बताया, एक साल पहले पिता की मौत हुई लेकिन मां जैसे-तैसे मेहनत मजदूरी कर हमें दाेनाें वक्त की राेटी खिला रही थी।

मां बीमार हुई तो हमें दो वक्त की रोटी के लाले पड़ गए। प्रधानमंत्री योजना में बनाए 2 कमरों में दोनों मासूम जीवन यापन कर रहे हैं। इधर-उधर से लकड़ियां लाकर चूल्हा जलाते हैं और खाना पकाते हैं। दोनों मिलजुल कर जैसे-तैसे खाना बनाने से लेकर घर के काम कर रहे हैं। बात करते ही उनकी रुलाई फूट पड़ती है।

मुकेश व सुनील ने कहा कि पापा के जाने के बाद मां हमारा सहारा थीं जो कर्ज लेकर भी हमें पढ़ा लिखा रही थी ताकि हम अच्छी जिंदगी जी सकेंगे लेकिन अब तो मां भी हमेंे छोड़कर चली गईं। अब हम कैसे पढ़ सकेंगे? कौन हमें पालेगा और खिलाएगा।

सर्जरी के दौरान हुई पिता की मौत
मुकेश के पिता भगाराम चौकीदार की मौत करीब एक साल पहले आंत के ऑपरेशन के दौरान हो गई थी। गरीबी से जूझ रहे परिवार को पालने के लिए मुकेश की मां झमुना देवी ने अपनी सोने की कंठी साहूकार के पास 20 हजार में गिरवी रखनी पड़ी। जैसे-तैसे दोनों बच्चों का पेट पाल रही थी कि कोरोना की दूसरी लहर ने उन्हें अपनी चपेट में ले लिया। इलाज के लिए एमडीएम अस्पताल ले गए पर एक महीने पहले वे भी दोनों बच्चों को अनाथ छोड़कर इस दुनिया से चली गईं।

72 लोग जुड़े, बच्चों के आंसू देख साहूकार से मां की आखिरी निशानी लाए
दो वक्त की रोटी के लिए भी तरसते इन बच्चों की मदद के लिए गांव के पांच युवकों ने सोशल मीडिया पर एक ग्रुप बनाया है। हनुमान छिणग, हनुमान थोरी, जितेंद्र छिणग, श्रवण छिणग व अमित सेन की इस पहल पर पहले ही दिन 10 हजार से ज्यादा रुपए एकत्र हो गए। ग्रुप में अब 72 लोग जुड़ चुके हैं और करीब 51 हजार रुपए एकत्र हो गए हैं।

जब ये युवा बच्चों से मिलने गए तो दोनो मासूमों के आंसू निकल पड़े। रोते-रोते इन्होंने मां की सोने की कंठी साहूकार के पास गिरवी पड़ी होने के बारे में बताया। इन युवकों ने 20 हजार साहूकार को देकर झमुना देवी की सोने की कंठी बच्चों को लौटाई।

मां की आखिरी निशानी देख दोनों ही मासूमों की रुलाई फूट पड़ी। इसी पैसे से इन पांचों युवकों ने समय-समय पर मुकेश व सुनील को खाना पहुंचाया और खाद्य सामग्री भी भिजवाई। अब गांव की किराणा की दुकान पर इनके लिए खाता खुलवा लिया है ताकि जरूरी सामान ले सकें।

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