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पति के दुर्भाग्य को सौभाग्य में बदल दी पत्नी, जरूर पढ़ें ये खास कहानी !

एक बार एक महान कवि माघ अपने घर में बैठे रचना लिखने में व्यस्त थे ! तभी एक बहुत गरीब ब्राह्मण आये और बोले ,” मैं आपके पास एक विनती लेकर आया हूँ , मेरी एक कन्या हैं जो विवाह योग्य हो गई हैं, मुझे अपनी कन्या के विवाह के लिए व्यवस्था करनी हैं ,परन्तु मेरे पास कुछ नही हैं ! मैंने आपके बारे में बहुत सुना है की आप बहुत ही उदार हो आपकी चर्चा दूर-दूर तक होती हैं ! अगर आप भी मेरे ऊपर थोड़ी दया करे तो मेरी कन्या का भाग्य बन सकता हैं !

परन्तु कवि माघस्वयं भी बहुत गरीब था ! और फिर वे सोचने लग गया की अब मैं क्या करूँ मेरे पास तो कुछ भी नहीं हैं देने के लिए !क्या अब मुझे इस ब्राह्मण को अपने दरवाजे से खाली हाथ भेजना होगा क्या ये सही होगा ? परन्तु अचानक ही माघ की दृष्टि अपनी पत्नी पर पड़ी जो किनारे पर सो रही थी ! उसकी पत्नी के हाथों में सोनें के कंगन चमक रहे थे !

उसके मन में आया की क्यूँ न मैं ये कंगन इस गरीब ब्राह्मण को दे दूँ,  ब्राह्मण को खाली हाथ नही भेजना पड़ेगा, परन्तु फिर वे सोचने  लगा की मेरे पास तो एक मात्र ये है जो पूंजी जमा की हैं ! फिर उसने कंगन देने का निर्णय किया और अपनी पत्नी को सोते हुए देख ही उसने सोचा की चुपचाप कंगन निकाल लिए जाये ये अवसर अच्छा हैं, क्या पता की पत्नी कंगन देने दे या नही ! जैसे ही उसने अपनी पत्नी के हाथों से कंगन निकलने की कोशिश की तो उसकी पत्नी की आँख खुल गई और पत्नी ने कहा की आप क्यूँ मेरे कंगन निकल रहे हो !

ये सुन कर माघ बोले की हमारे द्वार पर एक ब्राह्मण आया हैं, वो ब्राह्मण बहुत ही गरीब है, वे बहुत ही आशा ले कर हमारे द्वार पर आया हैं ! उसकी एक कन्या हैं जो विवाह योग्य हो गई हैं ! और घर पर कुछ नही था देने के लिए तो मैंने सोचा की ये कंगन दे     दूँ , तुम्हे इसलिए नही जगाया की कही तुम कंगन देने से इंकार न कर दो !”

ये बात सुन कर पत्नी बोली की आपको मेरे साथ रहते हुए इतने वर्ष हो गये आज तक आप मुझे नही जान पाए ! आप एक कंगन ले जाने को आये थे परन्तु आप चाहे तो मेरा सब कुछ ले ले, मैं तब भी प्रसन्न हूँ ! पत्नी का सबसे बड़ा सौभाग्य होता हैं की पति के साथ मानव कल्याण में अपने पति का साथ दे!

यह कह कर माघ की पत्नी ने अपने दोनों कंगन निकल कर ब्राह्मण को दे दिए ! ब्राह्मण माघ और उसकी पत्नी की उदारता को देख कर बहुत ही प्रभावित हुआ ! उसकी आँखों में आंसू आ गये और उसने जितना उनके बारे में  सुना था उसे कई ज्यादा देखा ! फिर वो ब्राह्मण ख़ुशी-ख़ुशी वहाँ से चला गया ! हाथों की शोभा दान देने में हैं न की कंगन से !

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