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श्मशान में आधी रात लगता था मेला, कोरोना ने रोक दी विचित्र परम्परा

श्रीगंगानगर :  कोरोना ने आम से खास तक सभी को प्रभावित और परेशान किया है। श्रीगंगानगर जिले में भी एक ऐसा विचित्र मेला लगता है जो हर किसी को हैरत में डाल देता है, लेकिन कोरोना ने इसे भी नहीं छोड़ा आधीरात को श्मशान भूमि में लगने वाले इस मेले का पिछले वर्ष आयोजन नहीं हो पाया। इस बार भी यदि हालात ठीक रहे तो ही आयोजन हो सकेगा। यह आयोजन प्रतिवर्ष भाद्रपद मास में गजसिंहपुर क्षेत्र के गांव एक एफएफबी चरनौली की श्मशान घाट में लगता है। आयोजन कबीरपंथी डाकौत समाज की ओर से करवाया जाता है।

पूरी रात होता है श्मशान में सत्संग
आयोजन के दौरान पूरी रात श्मशान घाट में सत्संग होता है। इस दौरान चौबीस घंटे तक लोगों के ठहरने, कुछ देर के लिए आराम करने और भोजन आदि के सभी कार्य इसी श्मशान घाट में होते हैं। मेले के लिए प्रतिवर्ष बड़ी संख्या में समाज के लोग एकत्र होते हैं।

श्रीगंगानगर जिले के चरनौली में स्थित श्मशान भूमि।

संत को करते हैं याद
मेला भाद्रपद महीने में चतुर्दशी और पूर्णिमा की रात को लगाया जाता है। शाम से ही लोग यहां एकत्र होने लगते हैं। फिर शुरू होता है सत्संग। कबीरपंथी डाकौत समाज के लोग बताते हैं कि समाज के संत चैलदास कई वर्ष पूर्व हुए थे। उनका मुख्य स्थान तो पंजाब में था लेकिन वे राजस्थान में आते-जाते थे। उनके अनुयायी दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, पंजाब सहित कई स्थानों पर हैं। उनकी पुण्यतिथि के दिन यह आयोजन उनकी समाधि पर करने की परम्परा है। ऐसे में संत की समाधि चरनौली के श्मशान घाट में होने के कारण यह मेला आधी रात को श्मशान घाट में लगाया जाता है।

डर किस बात का
आयोजन से जुड़े कबीरपंथी डाकौत समाज के मोहनदास बताते हैं कि आधी रात को श्मशान घाट में महिलाएं, बच्चे, बुजुर्ग सब एकत्र होते हैं। संत की समाधि है, ऐसे में किसी को कोई डर नहीं लगता। सभी का भोजन यहीं बनता है और सभी यहीं पर भोजन करते हैं। किसी को सोना हो तो श्मशान भूमि में ही कुछ देर के लिए आराम कर लेते हैं। वे बताते कि शुरू में तो यहां रोशनी भी नहीं होती थी। अब मेले के दौरान रोशनी की व्यवस्था के साथ एक शैड लगवाया गया है। पिछले वर्ष कोरोना के चलते यह आयोजन नहीं हो पाया था।

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