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श्रीराम के लिए यज्ञ किया था रावण, खुद को पराजित करने का भी दिया आशीर्वाद

धर्मग्रथों के अनुसार रावण बड़ा ही विद्वान था। ऐसा माना जाता है की रावण के जैसा विद्वान और ज्ञानी व्यक्ति आज तक इस धरती पर नहीं हुआ। रामायण के कई कथाओं में रावण की महानता का भी पता चलता है। इस पोस्ट में राम और रावण की ऐसी महानता के विषय में बताएँगे जिसके बारे में बहुत कम ही लोग जानते हैं।

रावण कौन था ?

लंकाधिपति रावण के पिता का नाम विश्रवा था जो मुनि पुलस्त्य के पुत्र थे। पुलस्त्य सप्तऋषियों और ब्रह्मा के मानस पुत्रों में से एक थे। र्थात रावण ब्रह्मा के प्रपौत्र थे। किन्तु रावण ने उनके मार्ग पर न चलते हुए अधर्म का साथ दिया।हम सभी रावण की शिव जी के प्रति भक्ति भावना से भी परिचित हैं।हजारों वर्ष तक रावण ने शिव जी घोर तपस्या की थी। उसी क्रम में उसने अपना सिर धड़ से अलग कर दिया था। तब शिव जी ने उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर उसके सिर में पड़ी माला जो दस सिर दिखाई देते थे उसे  एक सिर बना दिया था। यह माला रावण को उसकी माँ ने दी थी। शिव जी द्वारा दिए गए 10 सिरों की वजह से ही  ही रावण को दशानन कहलाया।

रावण को यज्ञ के लिए आमंत्रण

रामायण के अनुसार भगवन राम ने जब रावण से युध्द करने के लिए समुद्र पर पुल का निर्माण शुरू किया तो उन्होंने  शिव जी की आराधना की।  क्यूंकि यह युद्ध राम के लिए बहुत महत्वपूर्ण था। और वो शिव जी का आशीर्वाद प्राप्त करके इस कार्य को आरम्भ करना चाहते थे। परन्तु शिव जी की आराधना करने के लिए एक यज्ञ संपन्न करना था। यह यज्ञ केवल सबसे विद्वान् पंडित के द्वारा ही संभव था।

राम जी यह जानते थे की रावण ब्राह्मण होने के साथ साथ बड़ा विद्वान भी है। तब राम जी ने रावण को यज्ञ करने के लिए निमंत्रण भेजा। चूँकि रावण स्वयं शिव जी का भक्त था इसलिए वह राम जी के निमंत्रण को ठुकरा ना सका। श्री राम के निमंत्रण पर वो यज्ञ करने के लिए रामेश्वरम पधारे और यज्ञ संपन्न किया। यज्ञ पूरा होने के पश्चात राम जी ने रावण से उसे युद्ध में हारने का आशीर्वाद माँगा। रावण ने महानता का परिचय देते हुआ उत्तर दिया “तथास्तु”.

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