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WHO और बिग फार्मा ने Ivermectin के खिलाफ रची साजिश, कारण- इनका लालच

वैश्विक महामारी कोरोना के दौरान, एंटी-पैरासाइट ड्रग Ivermectin ने बहुत सुर्खियां बटोरी हैं। लेकिन अब वैज्ञानिकों का कहना है कि हाल ही में, एक अध्ययन के डेटा में व्यापक खामियों के चौंकाने वाले खुलासे सामने आए हैं। वहीं, इन खामियों को उजागर कर Ivermectin (इवरमेक्टिन) का दुष्प्रचार करने से पूर्व यह समझने की ज़रूरत है कि जिस Ivermectin (इवरमेक्टिन) ने अपने प्रभाव से विश्वभर में कोरोना की पहली और दूसरी लहर में संक्रमितों को बचाने का काम किया था, अचानक से इसके असर खतरनाक कैसे हो गए।

WHO के अनुसार, कोरोना की रोकथाम के उद्देश्य से दी जा रही Ivermectin के अब परिणाम नहीं दुष्परिणाम सामने आ रहे हैं, वहीं Pfizer को लेकर बिना कुछ कहे उसके उपयोग को बढ़ावा देने वाला WHO अपने स्वार्थ को सिद्ध करने में जुटा हुआ है। वास्तविकता तो यह है कि इवरमेक्टिन के उपयोग और सफल परीक्षण के बाद ही विश्वभर में इसका उपयोग कोरोना से बचाव के लिए किया जाने लगा।

दरअसल, एक षड्यंत्र के तहत पर्दे के पीछे से काम कर रहे WHO और BIG PHARMA, इवरमेक्टिन को अन्य सभी कोरोना रोधी Vaccines के मुक़ाबले सबसे ज़्यादा विफल इसलिए बता रही हैं, क्योंकि Pfizer जैसी Vaccine का उपयोग करने और उसे खरीदने से लगभग हर देश बचता आया है। इसका सरल और साफ कारण यह है कि वो कोरोना से लड़ने में अक्षम और अन्य Vaccines के मुकाबले सबसे कम कारगार साबित हुई थी।

यह दुर्भाग्य से कम नहीं है कि जब सभी देशों में सरकारें कोरोना से आम जन को बचाने की कवायद में जुटी हुई हैं तब बिग फार्मा जैसी संस्था यह साबित करने में लगी हुई हैं कि इवरमेक्टिन बीमारियों के प्रसव में सहायक है न कि कोरोना के बचाव में उपयोगी है़। ये सभी इवरमेक्टिन को अपराधी बनाने पर इसलिए आतुर हैं क्योंकि इनकी Vaccines की प्रामाणिकता और उसके असर पर चारों ओर सवाल उठ रहे हैं।

जिन सवालों के साथ इवरमेक्टिन को WHO ने BIG PHARMA की आड़ में कठघरे में खडा किया है, उसका ज़वाब भारत में इवरमेक्टिन से ठीक हुए सर्वाधिक जनसंख्या वाले प्रदेश ‘उत्तर प्रदेश’ से मिल जाता है़।

योगी आदित्यनाथ के प्रभावी नेतृत्व की सराहना करते हुए, ऑस्ट्रेलियाई सांसद क्रेग केली ने ट्वीट कर कहा था कि, राज्य प्रशासन ने सीएम योगी के आदेशानुसार राज्य के गंभीर कोविड -19 रोगियों के जीवन को बचाने के लिए प्रभावी ढंग से ‘इवरमेक्टिन’ प्रदान की थी। उन्होंने योगी आदित्यनाथ से ऑस्ट्रेलिया में नेतृत्व संभालने के लिए भी कहा ताकि वे Ivermectin द्वारा उस गड़बड़ी को सुलझा सकें जो ऑस्ट्रेलिया में कोविड के दौरान पैदा हुई हैं।

कहते हैं, प्रत्यक्ष को प्रमाण की कोई आवश्यकता नहीं होती है। कुछ ऐसा ही इवरमेक्टिन के साथ है, जहाँ इवरमेक्टिन के उपयोग से 20 करोड़ की आबादी वाला भारत का सबसे बडा प्रदेश कोरोना को मात देने में सफल रहा, WHO ने मनगढ़ंत कहानी बनाकर उसी जीवन दायक दवा इवरमेक्टिन को मात्र अपने स्वार्थ और शायद किसी संस्था से मिल रही Financial Aid को जीवित रखने के लक्ष्य से प्रभावहीन बता दिया। इससे यह सिद्ध होता है कि झूठ के पैर नहीं होते अर्थात् कोई कितना भी शक्तिशाली, बलवान या नामी क्यों न हो, सच्चाई छुप नहीं सकती छिपाने से। इससे न केवल विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की छवि और धूमिल होती है, बल्कि उसकी विश्वसनियता पर भी सवाल उठने लगे हैं।

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